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इस अमेरिकी हमले के होंगे दूरगामी परिणाम

लाखों सीरियाई और इराकी जान बचाने के लिए अपनी मातृभूमि छोड़ने को विवश कर दिए गए हैं, जो तुर्की और दूसरे देशों के जल मार्ग से होते हुए यूरोपीय देशों में शरण मांगने के लिए मजबूर हो गए हैं।

इस अमेरिकी हमले के होंगे दूरगामी परिणाम

अफगानिस्तान के नंगरहार प्रांत में इस्लामिक स्टेट (आईएस) के आतंकियों के छिपने के ठिकाने पर अमेरिका ने सबसे बड़े और असरकारक गैर परमाणु बम से जो हमला किया है, उसका असर केवल उन गुफाओं तक सीमित नहीं रहा है, जहां छत्तीस आतंकियों के मारे जाने की पुष्टि अफगान अधिकारियों ने की है।

इस बम की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी है और अगले कई महीने तक सुनाई देती रहेगी। इराक और सीरिया के गृहयुद्ध में ही आईएस ने खून खराबा नहीं किया है, उसकी हरकतों और कार्रवाइयों के चलते खाड़ी के बाकी देशों के साथ-साथ यूरोपीय देशों, अमेरिका और एशियाई देशों पर भी परोक्ष-प्रत्यक्ष असर देखने को मिला है।

लाखों सीरियाई और इराकी जान बचाने के लिए अपनी मातृभूमि छोड़ने को विवश कर दिए गए हैं, जो तुर्की और दूसरे देशों के जल मार्ग से होते हुए यूरोपीय देशों में शरण मांगने के लिए मजबूर हो गए हैं। इनमें से हजारों स्त्री-पुरुष और बच्चे समुद्र में समा गए। भूख और बीमारी से मर गए तो कुछ नस्लीय भेदभाव का शिकार भी हुए हैं।

आईएस के कारण इराक, सीरिया, जोर्डन सहित कई दूसरे देश भीषण त्रासदी के शिकार हुए हैं। लाखों लोगों का रोजगार ही नहीं छिना, उनके घर-बार, संपत्ति और उम्मीदें सब कुछ छिन चुका है। पिछले छह साल से शायद ही कोई ऐसा दिन जाता है, जब वहां से बुरी खबर नहीं आती हो।

अमेरिका, कई यूरोपीय देशों सहित नाटो की फौजें वहां बमबारी और जमीनी कार्रवाई कर आईएस और उसके लड़ाकों को खत्म करने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि रूस का आरोप रहा है कि अमेरिका सीरिया के राष्ट्रपति असद के प्रति दुर्भावना रखते हुए कुछ विद्रोही गुटों को शह देता रहा है,

जिसके चलते आईएस पर जिस तरह की निर्णायक कार्रवाई होनी चाहिए थी, उसे अंजाम नहीं दिया जा सका। यही वजह रही कि रूस भी आईएस के खात्मे के लिए जंग-ए-मैदान में कूद पड़ा। उसने उसके कई ठिकानों पर जबरदस्त प्रहार किए। हालत यह हो गई है कि सीरिया के बहुत से इलाके आईएस के कब्जे से मुक्त हो चुके हैं।

बगदादी के गुर्कों में भगदड़ मची हुई है। छिपने के लिए वे आसरा तलाश रहे हैं। जिस पहाड़ी गुफा को अमेरिकी सेना ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली बम से हमला बोला है, वहां से आईएस और दूसरे आतंकी संगठन सीरिया समेत कई एशियाई देशों में आतंकी हमलों की रणनीति तैयार करते रहे हैं।

वहां से निरंतर ऐसी सूचनाएं आती रही हैं कि यहां की दुर्गम पहाड़ियां विभिन्न आतंकी संगठनों की प्रश्रय स्थली बनी हुई हैं। वहां से उन्हें खदेड़ना या मार गिराना आसान नहीं है। कई मायने में अमेरिका की यह कार्रवाई बहुत अहम है। इससे इस्लामिक स्टेट की कमर और टूटेगी। उसका खौफ और कम होगा।

सीरिया और इराक के आम अमन पसंद लोगों को सामान्य दिन लौटने की उम्मीद बंधेगी, लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो इसे अमेरिका की सामंतवादी और वर्चस्ववादी कार्रवाई बताकर कड़ी आलोचना कर रहे हैं। अमेरिका पर यह आरोप भी है कि जब उस पर कोई चोट करता है,

तब वह बौखलाहट में इस तरह के हमले करने पर उतर आता है। इसके विपरीत यदि दुनिया के दूसरे देश पर वैसे ही आक्रमण होते हैं तो वह चुप्पी साध लेता है। यह अमेरिका का दोहरा रवैया तो है ही, आतंकवाद जैसी समस्या से निपटने की रणनीति पर सवाल भी खड़े करता है।

अमेरिका चाहता है कि सभी विकसित और विकासशील देश, संगठन आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट कार्रवाई करें, परंतु अक्सर वह खुद आतंक-आतंक में भेदभाव की नीति अपनाता नजर आता है। लोग पूछ रहे हैं कि हाल ही में यदि अफगानिस्तान में उसका सैन्य कमांडर नहीं मारा गया होता तो भी क्या अमेरिका इतनी बड़ी कार्रवाई को अंजाम देता? संभवत: नहीं।

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