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आलोक पुराणिक का व्यंग्य : गेट से विंडो प्लीज

मीडिया में विकट हल्ला मचा हुआ है- ललित-गेट, कुछ दिन पहले बीसीसीआई-गेट का हल्ला था।

आलोक पुराणिक का व्यंग्य  : गेट से विंडो प्लीज
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मीडिया में विकट हल्ला मचा हुआ है- ललित-गेट, कुछ दिन पहले बीसीसीआई-गेट का हल्ला था। हर विवाद घपले को गेट से साथ जोड़कर पेश करने का इतिहास है। सत्तर के दशक में अमेरिका में वाटर-गेट इलाके में एक बहुत बड़ा पॉलिटिकल घोटाला हुआ था, जिसे वाटर-गेट स्कैंडल नाम से जाना जाता है। उसके बाद लगभग हर घपले को अंग्रेजी मीडिया खास तौर पर गेट लगाकर पेश करता है। गेट की भारतीय परपंराएं दूसरी हैं।
गेट या दरवाजे भारत में आम तौर पर महानों के नाम पर बनते रहे हैं। मेरे शहर में छज्जू गेट था, जो एक वक्त में स्वतंत्रता सेनानी थे, बाद में विधायक होते ही महान हो गए, यद्यपि उनकी राशन की दुकान कई बार अनियमितताओं, गेहूं-चावल की कालाबाजारी में सील हुई पर छज्जूजी एक बार महान हो गए, तो महान बने ही रहे और गेट उन्हीं के नाम पर चलता रहा।
अपने अत्यधिक नौजवानी के दिनों में मैंने एक अभियान चलाया कि ऐसे बेईमान छज्जू के नाम को हम महान क्यों मानें, उनके नाम पर गेट क्यों बनाएं। मैंने एक अत्यधिक तेजस्वी समाज-सुधारक तेजस्वी नौजवान के नाम पर इस गेट को दोबारा नामकरण करने का प्रस्ताव किया। बुजुगरें ने मुझे समझाया-देखो, देर-सबेर सारे ही छज्जू जैसे हो जाने हैं।
तुम नाम बदलवाओगे, उस नए नौजवान का क्या ठिकाना। फिर तुम कहोगे, उसके नाम पर बने गेट को बदलवाओ। इस चक्कर में हमारे शहर की नई पीढ़ी वैरायटी-वैरायटी के नए-नए बदमाशों, बेईमानों से प्रेरित होगी। अभी सिर्फ एक ही बेईमान से प्रेरित होती है, उसके नाम पर लगे गेट को देखकर। शहर के सारे तेजस्वी समाज सुधारक कालांतर में छज्जू गति को प्राप्त हुए। मैं शर्मिंदा होता हूं अपने पुराने सुझाव पर।
अमेरिका में घपलों की रफ्तार वैसी नहीं है, जैसी इंडिया में है। इंडिया में लगभग हर महीने एक गेट बनकर तैयार हो जाता है। और कई घपलों के गेट तो ऐसे कि बुलंद दरवाजा उर्फ बुलंद-गेट शर्मा कर कह उठे-जी इस गेट के आगे मैं क्या गेट। मेरी चिंता बिल गेट्स के सम्मान को लेकर है। बिल गेट्स का नाम सुनकर भारत की नई पीढ़ी यह समझ सकती है कि घोटाले का मतलब गेट होता है, और बिल तो गेट्स हैं यानी कई गेट मिलाकर एक हैं। यानी बिल गेट्स बहु-घपलावान व्यक्तित्व हैं।
ऐसा ना हो जाए कि बिल गेट्स इंडिया आएं और नए बच्चे उनसे पूछ उठें-सर एक साथ बहुत सारे घपले सफलतापूर्वक कैसे किए जाएं। यह ना हो जाए कि किसी शहर में दिल्ली-गेट को देखकर कोई बच्चा पूछ उठे-इसमें कितने का घपला हुआ था। उसे बताया जाए कि यह गेट 1670 में बनवाया गया था, तब इसकी लागत 5 करोड़ रुपये आई थी। यह सुनकर बच्चा कह सकता है, तब यह गेट ना हुआ, छोटा था, इसे तो विंडोज कहना बेहतर होगा, मिनी, नन्हा-मुन्ना घोटाला।
तब बच्चे को समझाना पड़ेगा कि 1670 में 5 करोड़ रुपये उतने ही होते थे, जितने कलमाड़ी अंकल ने पूरे कामनवेल्थ गेम्स में खर्च कर मारे थे। खैर, बिल गेट्स का छुटकारा यहां भी नहीं है, विंडोज भी बिल गेट्स की कंपनी माइक्रोसॉफ्ट कंपनी का ही ब्रांड है। बिल गेट्स, विंडोज को भारत में बहुत करप्ट समझे जाने का खतरा है। हालांकि यह अलग बात है कि विंडोज करप्ट होती है बहुत, पर अलग तरीके से। पर भारत में इधर घोटाले इतने बड़े लेवल के हुए हैं कि आम पब्लिक की तरफ से तमाम नेताओं से निवेदन बनता है कि घोटालों के साइज गेट से छोटा करके विंडोज के लेवल पर कर दें। आइए, अपील करें, सभी नेताओं से कि प्लीज गेट से विंडोज पर आएं।
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