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आलोक पुराणिक का व्यंग्य : थोड़ा सा किसान हो जाएं

इस किसान के सर्मथकों ने बवाल काटा-नहीं ऐसा नहीं हो सकता किसान की जमीन ली ही ना जा सकती।

आलोक पुराणिक का व्यंग्य : थोड़ा सा किसान हो जाएं

कुछ किसान-कथाएं इस प्रकार हैं- किसान टू किसान। एक बार की बात है, एक किसान था, जिसका नाम था रॉबर्ड वाड्रा। किसान बहुत मेहनती था। बहुत लगन से खेती-फसल का काम करता था। मौका-मुकाम देखकर बीज डालता था और बहुत भारी फसल बटोर लेता था। इस किसान ने सोचा कि डेवेलपमेंट का सारा हक उद्योगपतियों को ही क्यों हो। किसान का भी कुछ हक बनता है ना। इस किसान ने दूसरे छोटे किसानों की जमीन ले ली।

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कुछ समय बाद दूसरी सरकार आई, उसने प्रस्ताव किया कि अगर जरूरी हुई, तो किसानों की जमीन अस्पताल, स्कूल बनाने को ली जाएगी। इस किसान के सर्मथकों ने बवाल काटा-नहीं ऐसा नहीं हो सकता किसान की जमीन ली ही ना जा सकती।इस किसान के विरोधी बोले-आप किसानों की जमीन खरीदकर कारोबार करो, तो सब ठीक। राबर्ट वाड्रा नामक किसान ने सबको यह कह कर निरुत्तर कर दिया- सरकार किसान से जमीन ले, तो वह किसान विरोधी हो जाती है पर किसान ही किसान से जमीन ले, तो किसान-विरोध ना होता। मैं भी किसान हूं, एक किसान दूसरे किसान से जमीन ले सकता है। इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि आज का किसान कित्ता स्मार्ट हो गया है।

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मुझसे वड्डा किसान कौन। केजरीवालजी मुख्यमंत्री हैं, पर उन्होंने कहा कि उनसे बड़ा किसान कौन। बताओ पॉलिटिक्स में किसने इतने कम टाइम में इतनी फसल काटी। प्रति वर्ष उत्पादकता के हिसाब से देखो, तो मुझसे बड़ा किसान कौन। मेरे रास्ते में आ रहे खर-पतवार को पहचान कर उन्हें जड़ से ठिकाने लगाने में मुझसे बेहतर कौन। मेरी किसानी खेती की तरकीब बहुत साफ है मैं पहले बताता हूं कि सौ टन फसल दूंगा। दो महीने में खुद ही कहना शुरू कर देता हूं कि जी चालीस-पचास टन हो जाए, तो बहुत है जी। केजरीवालजी अभी राज्य स्तर के किसान हुए हैं, इन्हीं तरकीबों से एक दिन राष्ट्रीय स्तर के किसान भी हो जाएंगे। इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि खेती-किसानी की बहुत नई तरकीबें विकसित हो गई हैं।

फार्म-हाऊस वाले किसान। किसान फैशन में हैं। कई रेस्टोरेंटों ने अपने यहां किसान थीम पर काम करना शुरू किया है। रेस्टोंरेंट का लुक खेत का करने की कोशिश की जा रही है। ये रेस्टोरेंट उन मंझोले लेवल के किसानों के हैं, जो विधायक वगैरह बन गए हैं। विधायक इसलिए बने कि किसान थे, पर नॉन-किसानी से बहुत कमाई हो रही है। सो रेस्टोरेंट डाल लिया। फाइव स्टार होटल जिनके हैं, उनमें से कई वो फार्म-हाऊस वाले किसान हैं। यहां हमें खेत वाले किसान और फार्महाऊस वाले किसान के अंतर को समझना होगा। खेतवाला हल चलाकर खेत जोतता है। फार्महाऊस वाले किसान को हल पुरातत्व का आइटम लगता है। वह हल को ड्राइंग रूम में रखता है, एथनिक आइटम है साहब। इंप्रेशन पड़ता है। फार्म हाऊस वाले किसान का ताल्लुक खेती-किसानी से सिर्फ इतना है कि वह फार्म-हाऊस रखता है।
खेतवाला किसान एक खेत की कमाई से दूसरा खेत मुश्किल से खरीद पाता है, पर फार्म-हाऊस पर हुई सौदों की खेती में इतना कट-कमीशन-दलाली निकलती है कि बंदा एक क्या सैकड़ों फार्म-हाऊस खरीद ले। इस मुल्क में फार्म-हाऊस वाला किसान कभी कोई शिकायत नहीं करता। वो अपनी पार्टियों में तमाम पार्टियों से सौदे सेटकर रकम की फसल काटता है। इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि फार्म-हाऊस वाली किसानी अगर सध जाए, तो फिर पूरी लाइफ में कोई प्रॉबलम नहीं ना होने की।
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