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नई राजनीति करने के सारे दावे तार-तार

क्या आम आदमी पार्टी मौजूदा पारंपरिक राजनीतिक दलों की तरह ही हो गई है?

नई राजनीति करने के सारे दावे तार-तार
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क्या आम आदमी पार्टी मौजूदा पारंपरिक राजनीतिक दलों की तरह ही हो गई है? क्या पार्टी वन मैन शो यानी अरविंद केजरीवाल केंद्रित हो गई है, जहां वही होता है जो वह चाहते हैं? क्या इस पार्टी में भी आंतरिक लोकतंत्र, स्वराज, पारदर्शिता और नैतिकता मात्र दिखावे के ही रह गए हैं? योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फे्रंस में जो बातें कही हैं उससे तो यही लगता है। उनकी बातों से साफ हो गया है कि जिन सिद्धांतों और उम्मीदों के साथ इस पार्टी का गठन हुआ था उससे यह भटक गई है। जो लोग इस भटकाव को रोकना चाहते हैं उन्हें केजरीवाल के समर्थकों द्वारा पार्टी विरोधी ठहरा दिया जा रहा है।
कितने दुख की बात हैकि आम आदमी पार्टी के जो नेता हाल तक भारतीय राजनीति में आई इन्हीं बुनियादी समस्याओं को लेकर दूसरे दलों की आलोचना करते थे, अब वे ही तमाम नियमों-कायदों को ताक पर रखकर सुविधाजनक फैसले ले रहे हैं। इससे यही जाहिर होता है कि देश में एक नई और साफ सुथरी राजनीति के वादे के साथ वजूद में आई आप उन्हीं बुराइयां में जकड़ रही है, जिसका वह विरोध करती रही है। यह दिल्ली के मतदाताओं के साथ एक तरह से छलावा है क्योंकि उसने एक नई तरह की राजनीति करने के दावे के साथ आई पार्टी को पिछले चुनावों में हाथों हाथ लिया था। पार्टी नेताओं के बीच जिस तरह से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है उससे साफ है कि उनके निजी हित सिद्धांतों पर भारी पड़ रहा है। नेताओं की निजी महत्वाकांक्षाएं, अहम और गुटबाजी ने पार्टी के अंदर गहरा विभाजन पैदा कर दिया है।
प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और अरविंद केजरीवाल के बीच पार्टी के कामकाज के तौर-तरीकों और विस्तार के मुद्दे पर गहरे मतभेद हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा समय में अरविंद केजरीवाल ही आप का सबसे बड़ा चेहरा हैं, लेकिन उन दोनों ने भी वाजिब सवाल उठाए हैं। आप की बुनियाद इन्हीं मुद्दों पर टिकी है। इसी के दम पर वह खुद को दूसरों से अलग होने का दावा करती रही है। दरअसल, आप जिस नई राजनीति की बात करती है, उसमें उससे आंतरिक लोकतंत्र और स्वराज की ज्यादा उम्मीद की जाती है। आप के प्रवक्ता संजय सिंह सहित उसके अधिकांश नेताओं की मानें तो केजरीवाल को पार्टी का हाईकमान मान लेने में कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि मतदाताओं को आकर्षित करने की उनमें क्षमता है। पार्टी ने दिल्ली का चुनाव उन्हीं के नाम पर लड़ा था। आम भारतीय संस्कृति भी यही कहती है।
ज्यादातर दलों में व्यक्तिवाद भी इसी वजह से पैदा हुआ कि लोग वोट लोकप्रिय नेता के नाम पर देते हैं। सत्ता वोट से ही मिलती है न कि आंतरिक लोकतंत्र, स्वच्छ व पारदर्शी व्यवहार या एक व्यक्ति-एक पद जैसे सिद्धांतों से। यदि केजरीवाल पार्टी का वन मैन चेहरा बन गए हैं तो यह भारतीय राजनीति की स्वाभाविक घटना ही है। मौजूदा घटनाक्रम से साफ है कि जो लोग इस सच्चाई से समझौता करेंगे उनकी ही आप में जगह है। बहरहाल, जिन लोगों ने आप को नई राजनीति का वाहक मान लिया था उनके लिए मौजूदा विवाद निराशाजनक है। ऐसे में कहा जा सकता है कि दूसरी आम राजनीतिक पार्टियों की सूची में एक और दल का नाम जुड़ गया है।
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