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डोभाल की चीन यात्रा से तनाव में कमी की उम्मीद

चीनी विश्लेषकों को पूरा भरोसा है कि डोभाल की चीन यात्रा से दोनों देशों क तनाव में कमी आएगी।

डोभाल की चीन यात्रा से तनाव में कमी की उम्मीद

सिक्किम सीमा पर डोकलाम क्षेत्र को लेकर भारत और चीन के बीच जारी तनातनी में कमी लाने के लिए कूटनीतिक प्रयास के रंग लाने की उम्मीद दिखाई दे रही है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ब्रिक्स देशों के एनएसए की बैठक में भाग लेने बीजिंग जा रहे हैं। वे 27-28 जुलाई को चीन में रहेंगे।

डोभाल की बीजिंग यात्रा को जितनी उत्सुकता से चीन देख रहा है, उतनी ही जिजीविषा से भारत भी देख रहा है। चीनी विश्लेषकों को पूरा भरोसा है कि डोभाल की चीन यात्रा से दोनों देशों क तनाव में कमी आएगी। दोनों देश शांति की राह तलाशेंगे।

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जबसे चीन ने डोकलाम विवाद शुरू किया है तबसे चीन की सेना और उसका सरकारी मीडिया लगातार भारत को उकसा रहे हैं। भारत को 1962 याद दिला रहे हैं तो युद्ध होने पर फिर से हारने की धमकी भी दे रहे हैं। चीन की इन गीदड़भभकियों का भारत पर कोई असर नहीं पड़ा है और डोकलाम में भारतीय सेना डटी हुई है।

चीन को यही खल रहा है। डोकलाम भूटान का क्षेत्र है, इसलिए चीन को लगा कि इसमें भारत नहीं कूदेगा। लेकिन भूटान सीमा की रक्षा संबंधी करार का पालन करते हुए भारत डोकलाम को चीनी कब्जे से बचाने में जुटा हुआ है। डोकलाम भारत के लिए भी सामरिक दृष्टि से अहम है।

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चीन ने ही डोकलाम पर लगातार भारत के साथ तनाव को बढ़ाया है। वह धौंस से भारत को झुकाने की मंशा पाले हुए है, इसलिए वह इस मसले के हल के लिए कूटनीतिक प्रयास पर अधिक जोर नहीं दे रहा है, बल्कि अपनी कूटनीति का इस्तेमाल खुद को पीड़ित बताते हुए भारत के खिलाफ कर रहा है।

भारत को डराने के लिए कभी तिब्बत के पाठार पर अपना सैन्य प्रदर्शन कर रहा है तो कभी दक्षिण चीन सागर में रूस के साथ मिलकर नौसैन्य अभ्यास कर रहा है। हालांकि चीन का कोई भी पैंतरा भारत को डरा नहीं पा रहा है। उल्टे भारत और मुखर हो रहा है। विश्व जनमत भी भारत के ही पक्ष में है। चीन की विस्तारवादी नीति से विश्व के सभी देश वाकिफ हैं।

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अपने सीमावर्ती क्षेत्र हड़पने की लगातार चेष्टा करने की चीन की प्रवृत्ति के चलते लगभग 14 सीमाई देशों से बोर्डर पर चीनी सेना का विवाद है। दक्षिण चीन सागर में भी चीन अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा है।

हालांकि डोकलाम पर चीन की चाल सफल होती नहीं दिखी तो अब वह भी किसी कूटनीतिक समाधान तलाशने लगा है। इसलिए वह डोभाल की बीजिंग यात्रा को उत्साह से देख रहा है। थिंकटैंक चाइना रिफॉर्म फोरम के एक रिसर्च फेलो मा जियाली के मुताबिक डोभाल का दौरा भारत तथा चीन के बीच तनाव कम करने का एक अवसर बन सकता है।

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डोकलाम विवाद से पहले भारत और चीन के एनएसए सीमा विवाद के हल के लिए अब तक 19 दौर की वार्ता कर चुके हैं। डोकलाम पर भी भारत चाहता है कि चीन के साथ कोई कूटनीतिक समाधान निकले। इस समय चाहकर भी चीन भारत के साथ युद्ध नहीं करना चाहेगा।

सीमित सैन्य कार्रवाई के बारे में सोच सकता है, लेकिन इसकी संभावना भी कम है क्योंकि चीन समझ रहा है कि इसकी कोई गारंटी नहीं है कि वह जीत ही जाएगा। इस इलाके में भारत ऊंचाई वाले इलाक़े पर काबिज़ है, जोकि पहाड़ के युद्ध में बहुत अहम बात होती है।

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उसे यह भी डर है कि सीमित हमला अगर एक लंबी लड़ाई में खिंच जाएगा तो मंदी से जूझ रही उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था संकट में फंस जाएगी। साथ ही भारत भी कूटनीतिक व सामरिक स्तर पर हर मुकाबले के लिए तैयार है।

भारत चीन सीमा पर अपने क्षेत्र में 73 सड़कें बना रहा है। चीन के ओबीओआर और सीपेक की काट के लिए एशिया-अफ्रीका गलियारा, चाबहार जैसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। भारत ने ऑस्ट्रेलिया ग्रुप, वासेनार के रूप में एनएसजी की काट भी ढूंढ़ लिया है।

चीन विश्व में भारत की बढ़ती आर्थिक और सामरिक ताकत से भी परेशान महसूस करता है। इसलिए हो सकता है कि एक चाल के तहत वह अरुणाचल के तवांग, सिक्किम सीमा पर डोकलाम और कश्मीर में अशांति के बहाने भारत को उलझाना चाहता है। जो भी हो डोभाल की चीन यात्रा से कूटनीतिक हल की उम्मीद बनी हुई है।

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