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शंभू भद्रा का लेख: कृषि का होगा कायापलट

आर्थिक पैकेज किसानों को केवल फौरी राहत के लिए ही नहीं है, बल्कि कृषि अर्थव्यवस्था की नींव खड़ा करने के लिए है। इससे जहां कृषि लाभकारी बनेगी, इस क्षेत्र में लाखों रोजगार के अवसर बनेंगे, वहीं किसानों की आय भी सुधरेगी। कुल मिलाकर हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी तो लोगों को उनके क्षेत्र में ही रोजगार मिलेगा, इससे पलायन रुकेगा व शहरों पर दबाव कम होगा। तीसरा ब्रेक अप निश्चित रूप से कृषि व संबद्ध क्षेत्र के कायापलट का ब्लू प्रिंट है।

शंभू भद्रा का लेख: कृषि का होगा कायापलट

शंभू भद्रा

बीस लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज के तीसरे ब्लू प्रिंट में सरकार ने एक बार फिर कृषि क्षेत्र पर नजरें इनायत कीं हैं। इस ब्रेक अप में सरकार ने कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर, फूड प्रोसेसिंग, कृषि से जुड़े अन्य क्षेत्र और कृषिगत प्रशासनिक सुधार के लिए 11 ऐलान किए। पहले दिन के ऐलान में केंद्र सरकार ने प्रमुख तौर पर मध्यम, लघु एवं सूक्ष्म उद्योगों के लिए ऐलान किया था। दूसरे दिन सरकार ने प्रवासी मजदूरों, छोटे और सीमांत किसानों, वन नेशन वन राशन कार्ड, छोटे दुकानदारों व गरीबों के लिए घोषणाएं कीं। पिछले दोनों ब्रेक अप से तीसरा ब्रेक अप एक्शन ब्लू प्रिंट के हिसाब से अधिक प्रभावी है। यूं तो दूसरे ब्रेक अप में भी छोटे किसानों के लिए ऐलान किया गया था, लेकिन तीसरे में सरकार ने कृषि व संबद्ध क्षेत्र को देश की अर्थव्यवस्था के मुख्य केंद्र में ला दिया है। बजट में जिस बलू प्रिंट की कमी दिखती है, वह कमी इस पैकेज के एलान में बिल्कुल नहीं है। सरकार देश की आर्थिक सेहत में सुधार लाने के लिए फोकस दिख रही है। कृषि व संबंद्ध क्षेत्र और फूड प्रोसेसिंग की रीढ़ उनके आधारभूत ढांचे की कमी से देश लगातार जूझ रहा है, जिसके चलते इन क्षेत्र का व्यापक लाभ आवाम को नहीं मिल पाता है। अकेले कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए एक लाख करोड़ का ऐलान किया गया है। दुग्ध उत्पादन, फूड प्रोसेसिंग, मछली पालन, बागवानी, औषधीय पौधे की खेती आदि के बुनियादी ढांचे के लिए भी करीब 73 हजार करोड़ रुपये की घोषणा की गई है। छोटे और मझोले किसानों के पास 85 फीसदी खेती है। इसलिए इन्हें अधिक मदद की जरूरत है। तीनों ब्रेकअप में देश के 100 करोड़ से अधिक लोगों की आर्थिक सेहत सुधारने की कार्य योजना है।

दरअसल, उदारीकरण के दौर से उपेक्षित कृषि क्षेत्र अपने कायापलट की बाट जोह रहा है। कृषि व संबद्ध क्षेत्र में भारत की तकदीर बदलने की ताकत है। इस क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ 70 फीसदी आबादी के लिए रोजगार सृजन की क्षमता है। 90 के दशक में शुरू आर्थिक उदारीकरण की आंधी में हमारी कृषि कहीं दब सी गई और लगातार सरकारी नीतियों में उपेक्षित होती रही। लेकिन 2014 में जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, उसके बाद राष्ट्रीय नीति में एक पॉलिसी शिफ्टिंग देखी गई। उद्योग जगत से दबाव के बावजूद मोदी सरकार ने बजट दर बजट कृषि व संबद्ध क्षेत्र के उन्नयन के लिए आवंटन में बढ़ोत्तरी की। फसल बीमा, किसान निधि व स्वायल हेल्थ जैसी योजनाएं लागू कीं। 60 के दशक में हरित क्रांति के बाद भारत कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हुआ, 90 का दशक आते-आते देश चावल, गेहूं, जूट, मोटे अनाज, दुग्ध, सब्जियों, केले आदि के उत्पादन में अग्रणी बन गया। यदि उदारीकरण के दौरान भी सरकार उद्योग के साथ-साथ कृषि व संबद्ध क्षेत्र पर संतुलित ध्यान देती तो आज 21वीं सदी के दूसरे दशक में किसानों की दशा इतनी खराब नहीं हो जाती। आज किसान कर्ज में डूबे हैं, खेती करना लाभकारी नहीं रहा। अन्नदाता सरकारी मदद के लिए मोहताज बन गए हैं। दूसरी तरफ अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन व यूरोपीय-अमेरिकी समर्थित जिस आर्थिक नीतियों को भारत सरकार ने आंखमूंद कर पालन किया, उनसे भारत संतुलित व समावेशी विकास की नई गाथा नहीं लिख सका, चाहे समृद्धि की बात हो या रोजगार सृजन की बात हो, दोनों ही मोर्चे पर देश लक्ष्य हासिल नहीं कर सका। देश असमान विकास का नमूना बन गया। आज के दिन बेरोजगारी देश की बड़ी समस्या बन चुकी है। औद्योगिक क्षेत्र सबको रोजगार देने में सफल नहीं हो पा रहा है। कोरोना संकट में उद्योग क्षेत्र की कमजोरियां देखने को मिली। दो माह भी संकट नहीं झेल सका। विश्व भर में उद्योग आधारित कॉरपोरेट पूंजीवाद की पोल खुल गई। यह एक बार फिर सिद्ध हो रहा है कि कृषि क्षेत्र में ही अधिक से अधिक श्रम को खपाने और सबके पेट भरने की क्षमता है। हमें अगर तमाम झांझावातों के दौरान टिके रहना है, देश को उधार की बुलबुली अर्थव्यवस्था से बचाकर रखना है, नई पीढ़ियों को आत्मनिर्भर बनाना है तो कृषि जैसी कोर अर्थव्यवस्था को विकास नीति के मुख्य केंद्र में लाना ही होगा। उद्योग व सेवा क्षेत्र कृषि व संबद्ध क्षेत्र के सहयोगी बने, इसके उलट स्थिति न हो।

तीसरे आर्थिक ब्रेक अप पर गौर करें तो कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 1 लाख करोड़ रुपये दिए जाएंगे। जिनसे कोल्ड स्टोर चेन, अनाज भंडारण, फसल कटाई के बाद प्रबंधन, स्टोरेज सेंटर जैसी 'फार्म गेट' सुविधाएं मजबूत किए जाएंगे। एग्रीकल्चरल इन्फ्रास्ट्रक्चर, प्राइमरी एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव सोसयटी और खेती से जुड़े स्टार्टअप्स को यह मदद दी जाएगी। ऐसे ही माइक्रो फूड एंटरप्राइज को 10 हजार करोड़ रुपये की मदद दी जाएगी ताकि वे फूड गुणवत्तओं का ध्यान रखते हुए ब्रांडिंग और मार्केटिंग कर सकें। ऐसी 2 लाख यूनिटों को इसका फायदा मिलेगा। राज्यों को एग्री कलस्टर हब बनाया जाएगा। पशुपालन के इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए 15 हजार करोड़ रुपये का फंड दिया जाएगा। पशुओं को रखने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर बनेगा। हर्बल खेती के लिए 4 हजार करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। अगले दो साल में 10 लाख हेक्टेयर जमीन पर हर्बल खेती होगी। गंगा के किनारे 800 हेक्टेयर भूमि पर हर्बल प्रॉडक्ट्स के लिए कॉरिडोर बनाया जाएगा। 2 लाख मधुमक्खी पालकों के लिए 500 करोड़ रुपये की योजना पेश की गई है। ऑपरेशन ग्रीन के तहत टीओपी यानी टमाटर, आलू, प्याज योजना में बाकी सब्जियों को भी लाया गया है। इस योजना के लिए 500 करोड़ का प्रावधान किया है। एग्रीकल्चर मार्केटिंग रिफॉर्म किया जाएगा। इसके लिए एक केंद्रीय कानून बनेगा ताकि किसानों के पास अच्छी कीमतों पर उपज बेचने का मौका रहे। इसका लाभ उन किसानों को मिलेगा, जो अब तक लाइसेंस रखने वाली एग्रीकल्चर प्रोड्यूसर मार्केट कमेटी में ही अपनी उपज बेच पाते थे। वे ई-ट्रेडिंग भी कर सकेंगे। किसानों को आमदनी की गारंटी देने के लिए सरकार कानून में बदलाव कर ऐसी व्यवस्था बनाएगी जिसके तहत फूड प्रोसेसर, एग्रीगेटर्स, रिटेलर्स और एक्सपोर्टर्स के साथ किसान अपनी उपज का दाम पहले ही तय कर सकेगा।

तीसरे चरण की सभी घोषणाओं का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि सरकार कृषि व इससे जुड़े क्षेत्र के इन्फ्रास्ट्रक्चर के जरिये व्यापक स्तर पर पूंजी निर्माण करना चाहती है। यह आर्थिक पैकेज केवल फौरी राहत के लिए ही नहीं है, बल्कि कृषि अर्थव्यवस्था की नींव खड़ा करने के लिए है। इससे जहां कृषि लाभकारी बनेगा, इस क्षेत्र में लाखों रोजगार के अवसर बनेंगे, वहीं किसानों की आय भी सुधरेगी। कुल मिलाकर हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी तो लोगों को उनके क्षेत्र में ही रोजगार मिलेगा, इससे पलायन रुकेगा व शहरों पर दबाव कम होगा। तीसरा ब्रेक अप निश्चित रूप से कृषि व संबद्ध क्षेत्र के कायापलट का ब्लू प्रिंट है।

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