Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

नीलम महाजन सिंह का लेख : कृषि कानून वापसी प्रोगेसिव निर्णय

तीनों कृषि कानूनों की वापसी सरकार का एक बोल्ड और प्रोगेसिव निर्णय है। किसान आंदोलन की आड़ में साल भर से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सीमाओं के ब्लॉकेज से अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही थी और सरकार की छवि किसान विरोधी बनती जा रही थी। हालांकि सरकार तीनों कृषि कानून कृषि क्षेत्र में व्यापक बदलाव के लिए लेकर आई थी। लेकिन कहने में कोई दो राय नहीं कि तीनों नए कानून राजनीति के शिकार हो गए। यद्यपि कि निर्णय राजनीतिक हों या सामाजिक, उसका प्रभाव सभी पर पड़ता है। सरकार को एमएसपी कानून बनाने व लागू करने पर विचार करना चाहिए।

नीलम महाजन सिंह का लेख : कृषि कानून वापसी प्रोगेसिव निर्णय
X

नीलम महाजन सिंह 

नीलम महाजन सिंह

तीनों कृषि कानूनों की वापसी सरकार का एक बोल्ड और प्रोगेसिव निर्णय है। किसान आंदोलन की आड़ में साल भर से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सीमाओं के ब्लॉकेज से अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही थी और सरकार की छवि किसान विरोधी बनती जा रही थी। हालांकि सरकार इन तीनों कृषि कानूनों को कृषि क्षेत्र में व्यापक बदलाव के लिए लेकर आई थी, लेकिन यह कहने में कोई दो राय नहीं है कि ये तीनों कानून राजनीति के शिकार हो गए। भाजपा को भी लगा कि कानूनों की ज़िद से उनका जनाधार दरक सकता है। तीनों कृषि कानूनों की वापसी का प्रभाव और कृषि क्षेत्र की दशा के साथ अब आगे सरकार के पास क्या विकल्प हैं, इस पर अब गंभीरता से विचार जरूरी है। ऐसा क्यों होता है कि उच्चतम कार्यालयों में, इतनी बाबूगिरी होने के उपरांत भी गलत निर्णय लिए जा रहे हैं? यह आवश्यक है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में बुद्धिमान सलाहकार हों।

प्रोफेशनल्स को पी.एम.ओ में रहने की ज़रूरत है। प्रधानमंत्री कार्यालय में वास्तविक व उचित प्रतिक्रिया नहीं मिलती है, जो ज़मीनी परिस्थितियों और लोगों की भावनाओं को अवगत करवाने में सक्षम हो पा रही हो। एक साल के किसान आंदोलन में अपव्यय, टकराव और किसानों का साथ त्यागने से आपसी विश्वास में कमी आई है। तीन फार्म कानूनों द्वारा पूंजीवाद लाभान्वित होगा, ऐसी धारणा बन गई थी। किसानों तथा कृषि समूहों द्वारा इन बिलों का घोर विरोध किया गया। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल नींव है। इसे जारी रखना देश के लिए आवश्यक है। डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने एम.एस.पी. के सिद्धांत द्वारा, किसानों को दो-तिहाई लाभ का न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रतिपादित किया था। हालांकि इसे कभी भी वास्तविकता नहीं दी गई। यह सत्य है कि यह किसानों को दिलासा देने वाला विचार केंद्र और राज्य सरकारें समय-समय पर लागू कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में किसानों को आर्थिक राहत नहीं मिली है। कृषि क्षेत्र को प्रभावित करने के लिए आर्थिक मंदी के कारण; किसान को कठिनाइयों को झेलना पड़ रहा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह, पर्दे के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह समझाने में कामयाब रहे कि तीनों फॉर्म बिल वापस ले लिया जाने चाहिए। वह केंद्र व किसानों के समक्ष प्रमुख वार्ताकार थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पेटेंट शैली में, देश के लिए एक निश्चित संदेश टीवी चैनलों पर आया। प्रधान मंत्री ने फार्म बिलों को वापस लेने की घोषणा की। अब कैबिनेट ने 3 फार्म बिलों को वापस लेने की भी मंजूरी दे दी है। संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में इन्हें निरस्त कर दिया जाएगा। वास्तव में यह दुखदायी है कि पिछला एक साल, भारत में कोविड -19 आपदा से जूझते हुए चला गया। किसान आंदोलन भी अग्रसर हो गया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 700 किसान भाइयों की निर्मम मौत हो गई। लाल किले पर झंडा फहराने से अराजक तत्वों द्वारा, भारतवासियों में चिंता और गुस्सा आया। किसान, मज़दूर, श्रमिक का मुद्दा बुनियादी है, जिन्हें हम नज़रअंदाज नहीं कर सकते, क्योंकि इस पर समाजवाद की नींव बनाई जाती है। भारत एक सामाजिक, लोकतांत्रिक देश है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद से हमारी आज़ादी के 75 साल बाद भी एक कल्याणकारी राज्य को पूर्ण स्वरूप नहीं मिला। क्या हम एक राष्ट्र के रूप में यूनाइटेड हैं? क्या रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा में हम आत्मनिर्भर हैं?

सरकारों पर जनसंख्या विस्फोट के कारण, विकास में विलंब, एक बड़ा खतरा रहा है। आकांक्षी भारतीय युवाओं में बेरोज़गारी में निरंतर वृद्धि के परिणामस्वरूप निराशा और लाचारी हुई है, जिससे युवाओं में कई भावनात्मक व मानसिक समस्याएं हैं। पंजाब में किसान आंदोलन का गहरा प्रभाव हुआ है। 2021 के मध्य में मैंने कई महीने पंजाब में गुज़ारे थे। नगर-पालिका और पंचायत चुनावों के दौरान किसानों में घृणा की गहरी जड़ें जम गई थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अब कांग्रेस लोकमत पार्टी बनाई है। भाजपा का आधार पंजाब में मजबूत नहीं है क्योंकि जब तक उनका अकाली दल से गठबंधन था तो उन्हें राजनीतिक लाभ प्राप्त होता था। अब कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ गठबंधन द्वारा 2022 के के चुनावों में भाजपा हिस्सा लेगी। इन सब पर किसान आंदोलन का बहुत प्रभाव पड़ेगा। यह तो सच है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पंजाब के किसानों के लिए हमेशा आवाज़ उठाई है और किसी प्रकार से भी किसानों को प्रताड़ित करने पर अपना रोष प्रकट किया। जिन दिनों में किसानों को दिल्ली आने से रोका जा रहा था तो हरियाणा सरकार द्वारा हर प्रकार के कठिन प्रशासनिक निर्णयों के कारण अनेक किसानों के ऊपर प्रहार किया गया। देश की आस्था में किसान 'अन्नदाता' हैं। जय जवान जय किसान का नारा, मन में छाया हुआ है। फिर किसान बिल पॉलिटिकल ब्लंडर थे, जिसके दूरगामी परिणाम होने स्वभाविक ही थे।

इस सबको देखकर लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विश्वसनीय एवं प्रोफेशन सलाहकारों की आवश्यकता है। इससे पहले साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को फजीहत झेलनी पड़ी थी। ये मौका था भूमि अधिग्रहण कानून का और उस वक्त अंत में विधेयक वापस लेना पड़ा था। यह विधेयक भी किसानों से जुड़ा हुआ था और उस वक्त भी किसानों में उबाल था और पूरे देश में विधेयक को लेकर विरोध किया गया। उस दौरान भी पीएम मोदी को 'मन की बात' कार्यक्रम में यह कहना पड़ा कि वे भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस ले रहे हैं। बार बार किसानों पर प्रहार करना बहुत निंदनीय हैं। केंद्र सरकार ने संशोधित भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर चार बार अध्यादेश जारी किए थे, लेकिन संसद से बिल को मंजूरी नहीं मिल पाई। अंत में यह वापस ही लेना पड़ा। हुआ यूं था कि 2014 में सरकार में आते ही नरेंद्र मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास में उचित मुआवज़ा नहीं दे पाई। भूमि अधिग्रहण कानून,1994 के बदले में था जो कई वर्षों से चला आ रहा था। यूपीए का कानून लागू होने के लगभग एक साल बाद यानी कि 31 दिसंबर 2014 को एनडीए सरकार ने इस कानून में संशोधन का अध्यादेश पारित कर दिया।

यूपीए सरकार में तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को भी किसान व कृषि क़नूनों पर विशेष ध्यान केंद्रित करना पड़ा। कृषक कानून पर मूल अर्थव्यव्स्था पर प्रभाव पड़ता है। क्या किसान आंदोलन समाप्त हो गया है? वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फार्म कानूनों को वापस लेना एक साहसी व सार्थक निर्णय है। यद्यपि कि निर्णय राजनीतिक हों या सामाजिक, उसका प्रभाव सभी पर पड़ता है। अभी किसान संगठनों का यह कहना है कि सरकार एमएसपी को लागू करे! मेरा जुड़ाव किसान आंदोलन व कृषि उत्पादन से है। परंतु यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि एम. एस. स्वामीनाथन द्वारा प्रतिपादित एम.एस.पी. पर कानून पारित नहीं हुआ। फिर मोदी सरकार को इस पर गंभीर रूप से सोचना होगा। हमारे किसान समृद्ध और सहर्षित रहें, यही केंद्र से आग्रह है।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं ।

Next Story