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प्रभात कुमार रॉय का लेख : आतंक का नया गढ़ बन रहा अफ्रीका

सर्वविदित है कि जेहादी आतंकवाद एक विश्वव्यापी समस्या रही है, जिसका निर्णायक निदान भी सारी दुनिया को संयुक्त तौर पर एकजुट होकर ही करना है। अफ्रीका में जेहादी आतंकवाद का कहर हो अथवा अफगानिस्तान में, उसकी फितरत एक जैसी रही है। अपने राष्ट्रीय हितों तक सीमित रहकर दुनिया के देश वैश्विक जेहादी आंतकवाद को निर्णायक शिकस्त नहीं दे सकेंगे। जेहादी आतंकवाद का मुकम्मल खात्मा करने के लिए दुनिया के देशों को एकजुट होकर पाकिस्तान सहित उन तमाम देशों का आर्थिक बॉयकाट करना होगा, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर जेहादियों की परवरिश करते रहे हैं।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : आतंक का नया गढ़ बन रहा अफ्रीका
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

विश्वपटल पर एशिया के पश्चात अफ्रीका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है, जिसको अंध महाद्वीप भी कहा जाता है। अफ्रीका एक पठारी महाद्वीप भी है। विश्व का सबसे विशाल सहारा नामक मरुस्थल इसी महाद्वीप में है। अफ्रीका महाद्वीप में 54 देश विद्यमान हैं। आजकल महाद्वीप अफ्रीका के 22 देशों में इस्लामिक जेहादियों का आतंकवादी कहर बरपा है। खासतौर पर उत्तर पश्चिमी अफ्रीका के देशों की सरजमीं पर कहर बरपाने वाले इस्लामिक आतंकवाद को लंबे वक्त तक अमेरिका, रूस और पश्चिम के देश नजरअंदाज करते रहे। इसका नतीजा हुआ कि सूडान, अल्जीरिया और नाइजीरिया से प्रारंभ हुआ आतंकवादी जेहाद अफ्रीका के 22 मुल्कों को अपनी नृशंस चपेट में ले चुका है। यूं तो 1996 से अफ्रीका में जेहादी आतंकवाद का इतिहास शुरू हुआ, जबकि जेहाद के सबसे कुख्यात सरगना ओसामा बिन लादेन ने सूडान में अपना ठिकाना बनाया, किंतु कुछ वक्त के बाद ओसामा बिन लादेन अपनी खूंखार जेहादी तंजीम अल कायदा के कुछ सरगनाओं को छोड़कर अफ़गानिस्तान वापस लौट आया। सूडान और अल्जीरिया के पश्चात इस्लामिक जेहाद का नृशंस केंद्र बनकर उभरा नाइजीरिया। 2002 में नाइजीरिया में इस्लामिक जेहादी मौहम्मद यूसूफ ने बोको हराम नामक एक बर्बर आतंकवादी जेहादी तंजीम की बुनियाद रखी।

2009 में मोहम्मद यूसूफ के हलाक़ हो जाने के पश्चात अबू बकर शेखू ने बोको हराम की कमान संभाली। बोको हराम का जेहादी सरगाना अबू बकर शेखू वस्तुतः मोहम्मद यूसूफ से भी अधिक नृशंस होकर उभरा। अभी तक बोको हराम द्वारा हजारों की तादाद में बेगुनाह इंसानों को कत्ल किया गया और करीब 10 लाख नागरिकों को नाइजीरिया से बेदखल किया गया। 2014 में बोको हराम ने एक स्कूल से 269 बालिकाओं का अपहरण किया, क्योंकि बोको हराम पश्चिमी तौर तरीकों की तालीम का दुश्मन है। 2012 में बोको हराम ने इस्लामिक स्टेट के साथ जुलगबंदी कर ली। बोको हराम और इस्लामिक स्टेट ने मिलकर सहारा मरुथल से सटे हुए देशों में जिन्हें सालेह देश कहा जाता है, अपने आतंकवादी कहर का विस्तार किया। सालेह देशों में तकरीबन पचास हजार स्कवॉयर किलोमीटर इलाके में माली, चाड, सोमालिया, नाइजर, केमरुन, बुरकिना फासो, मारुतानिया आदि देश विद्यमान हैं। सीरिया और इराक में निर्णायक शिकस्त के बाद इस्लामिक स्टेट के जेहादियों ने उत्तरी अफ्रीका और अफ़गानिस्तान में अपने नए ठिकाने बना लिए और इन स्थानों पर पहले से ही सक्रिय जेहादी तंजीमों से साथ हाथ मिला लिया। अफ्रीका सरजमीं पर बोको हराम के अतिरिक्त अल शबाब भी काफी नृशंस रही। अल शबाब का पूरा नाम है हरकत अल शबाब अल मुजाहिदीन। अल शबाब ने अलकायदा के साथ हाथ मिला लिया। अल शबाब और अल कायदा ने मिलकर केन्या में भी अनेक जेहादी आक्रमण किए हैं। अल्जीरिया में अलकायदा तंजीम का कहर रहा है। यहां पर इस्लामिक स्टेट के जेहादियों ने अल कायदा से हाथ मिला लिया है।

संयुक्त राष्ट्र ने बहुत देरी से सही आखिरकार अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में 2002 से जारी जेहादी आतंकवाद की तरफ निगाह डाली। वस्तु स्थिति है कि सालेह क्षेत्र के देशों की सेनाएं जेहादियों से सशस्त्र मुकाबला करने में अक्षम सिद्ध होती रहीं। संयुक्त राष्ट्र की पहल पर फ्रांस, इंग्लैंड और जर्मन सैन्य ब्रिगेड उत्तरी अफ्रीका के सालेह देशों में तैनात की गईं। वस्तुतः इन देशों की सैन्य ब्रिगेड सालेह इलाके के देशों की फौजों की मदद करने के लिए संघर्षरत हैं। अफ्रीका के अनेक देशों में चीन ने बड़े पैमाने पूंजी निवेश किया है। विडंबना है कि अफ्रीका की सरजमीं से जेहादी आतंकवाद को खत्म करने चीन कोई सक्रिय किरदार निभाना नहीं चाहता। वैसे भी जेहादी आतंकवाद के प्रश्न पर चीन ने सदैव दोहरा पाखंडी रवैया अपनाया है। अपने झिंगयांग प्रदेश में जेहादी आंतकवाद के विरुद्ध अत्यंत निर्मम सैन्य कार्यवाही अंजाम देने वाले चीन ने पाकिस्तान में परिपोषित और प्रशिक्षित जेहादियों को समर्थन दिया। जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर को ग्लोब्ल आतंकवादी घोषित करने के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव को चार दफा वीटो किया। सीरिया में इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर बम बरसाने वाले रूस ने भी अभी तक अफ्रीका में बर्बर जुल्मों सितम ढाने वाले जेहादियों के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही में रुचि नहीं दिखाई है। अफगानिस्तान में जेहादी आतंकवाद के विरुद्ध करीब 21 वर्षों तक निरंतर सैन्य संघर्ष करने वाले अमेरिका ने भी अफ्रीका में जेहादी आतंकवाद के विरुद्ध जारी किसी सैन्य कार्यवाही में शिरकत नहीं की है। केवल यूरोप के कुछ देशों ने जिनमें फ्रांस अग्रणी रहा है, इंग्लैंड और जर्मनी के साथ मिलकर अफ्रीका में जेहादी आतंकवाद का सफाया करने में किरदार निभाया है।

यक्षप्रश्न है कि आखिरकार अफ्रीका की सरजमीं पर जेहादी अपना बर्बर कहर बरपाने में क्यों कामयाब हो गए। अफ्रीका में करीब 35 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो बेहद गरीब है और करीब तीन चौथाई अनपढ़ है। अफ्रीका के अधिकतर देशों में एक मेहनतकश इंसान की आमदनी प्रतिदिन एक डॉलर से कम है। धन संपदा पर मुठ्ठी भर घरानों का आधिपत्य है। अफ्रीका में नौजवानों में बेरोजगारी का बड़ा विकट आलम है। अफ्रीका में युवाओं में 23 फीसदी बेरोजगारी की दर कायम है। अफ्रीका में ईसाइयों के हालात मुस्लिमों के मुकाबले में काफी कुछ बेहतर है। कबीलाई संस्कृति से सराबोर अफ्रीका महाद्वीप वस्तुतः प्रायः मुखतलिफ कबीलों के खूनी संघर्षों और द्वंदों में भी उलझा रहता है। ऐसे विकट हालात में जेहादियों को अपने बर्बर पांव जमाने का अवसर अफ्रीका के अनेक देशों में हासिल हो गया। बेराजगार मुस्लिम नौजवानों की पांतों से जेहादी तंजीमों को नए रिकरूट प्राप्त होते ही रहते हैं। सर्वविदित है कि जेहादी आतंकवाद एक विश्वव्यापी समस्या रही है, जिसका निर्णायक निदान भी सारी दुनिया को संयुक्त तौर पर एकजुट होकर ही करना है। अफ्रीका में जेहादी आतंकवाद का कहर हो अथवा अफगानिस्तान में, उसकी फितरत एक जैसी रही है। अपने राष्ट्रीय हितों तक सीमित रहकर दुनिया के देश वैश्विक जेहादी आंतकवाद को निर्णायक शिकस्त नहीं दे सकेंगे। जेहादी आतंकवाद का मुकम्मल खात्मा करने के लिए दुनिया के देशों को एकजुट होकर पाकिस्तान सहित उन तमाम देशों का आर्थिक बॉयकाट करना होगा, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर जेहादियों की परवरिश करते रहे हैं। चीन सरीखे देशों को बेनकाब करना होगा जो जेहादी आतंकवाद पर दोहरा पाखंडपूर्ण रवैया अख्त्यार करते हैं। जेहादी आतंकवाद के प्रश्न पर परस्पर दुश्मनी और प्रतिद्वंदिता को बरतरफ करके यूरोप के साथ अमेरिका और रूस को एकजुट होना पड़ेगा, अन्यथा विश्वपटल जेहादी आतंकवाद काे निर्णायक शिकस्त नहीं दी जा सकेगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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