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प्रभात कुमार रॉय का लेख : खतरनाक मोड़ पर अफगानिस्तान

शंघाई कॉरपोरेशन आर्गेनाइजेशन के सेक्रेटरी जनरल और उजबेकिस्तान के पूर्व विदेशमंत्री नोरोव ने कहा कि आईएस के जेहादी लड़ाके अब सीरिया से उत्तरी अफगानिस्तान में अपना बेस स्थापित करने में जुटे हुए हैं। जेहादियों की अफगानिस्तान में निरंतर बढ़ती जाती शक्ति से मध्य एशिया, भारत और चीन के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है। अमेरिका चाहता तो मध्य एशिया के देशों, भारत और चीन को एकजुट करने की कोशिश कर सकता था किंतु वह अधर में छोड़कर भाग खड़ा हुआ। भारत अब ये पहल सकता है कि एशिया में जेहादियों का खात्मा कर सकने वाली ताकतों को एकजुट करे।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : खतरनाक मोड़ पर अफगानिस्तान
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज़ का पलायन एक मई से बाकायदा शुरू हो चुका है। अमेरिका को अपना फौज का पलायन 11 सितंबर तक पूरा करना है। एक से 5 मई तक तालिबान जेहादियों ने अफ़गानिस्तान के विभिन्न प्रांतों में अफगानिस्तान के सुरक्षा बलों पर ताबड़तोड़ आक्रमण किए। इन तालिबानी आक्रमणों में अफ़गान सुरक्षा बलों के पचास जवान हलाक़ हो गए, साथ ही बड़ी तादाद में अफगान नागरिक भी मारे गए। विगत पांच दिनों के बर्बर आक्रमण तालिबान के खतरनाक इरादों की तरफ साफ इशारा कर रहे हैं। कतर की राजधानी दोहा में करीब दो वर्षों तक चलने वाली बैठकों के बाद अमेरिका के साथ भले ही तालिबान मुल्लाओं ने एक राजनीतिक समझौता किया है, किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि तालिबान नेतृत्व अफ़गान हुकूमत के साथ कोई समझौता करने के लिए तत्पर नहीं है। दोहा वार्ता में अफ़गान हुकूमत को शामिल नहीं किया गया और अमेरिका ने एक तरफा समझौता तालिबान के साथ अंजाम दे दिया। अतः अफगानिस्तान में निकट भविष्य में गृहयुद्ध की समाप्ति की कतई कोई संभावना नहीं है।

एक आधिकारिक अनुमान के तहत अफ़गानिस्तान की सरजमीं पर साठ हजार से अधिक तालिबान जेहादी लड़ाके सक्रिय हैं। दूसरी तरफ अफ़गानिस्तान की फौज़ में तीन लाख पचास हजार सैनिक विद्यमान है। तालिबान के पास अपने वित्तीय संसाधन रहे हैं, जिनमें ड्रग्स के व्यापार से होने वाली कमाई सबसे बड़ा संसाधन है। तालिबान के आधिपत्य वाले इलाकों में विशाल पैमाने पर अफीम की खेती की जाती है और उससे प्रोसेस की गई हेरोइन की तस्करी से बड़ी आमदनी होती रही है। खदानों में कार्यरत कंपनियों से अवैध वसूली से तालिबान को बड़ी कमाई है। खुले और छुपे तौर पर पेट्रो डालर तालिबान को सदैव ही प्राप्त होते रहे हैं। सोवियत रूस बनाम अफ़गान जेहादी युद्ध में अमेरिका द्वारा प्रदान किया गया आधुनिक असस्त्र शस्त्रों का विशाल ज़खीरा तालिबान के पास मौजूद है। अकूत संपदा के दमखम पर तालिबान अंतरराष्ट्रीय तस्करी के माध्यम से हथियार हासिल करते रहते हैं। पाकिस्तान की प्रत्क्षय और परोक्ष मदद तालिबान को सदैव हासिल रही है। जेहादियों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए जो मदद अमेरिका ने पाकिस्तान को प्रदान की, उसकी वित्तीय मदद का दुरुपयोग पाक़ हुकूमत द्वारा कश्मीर और अफ़गानिस्तान के जेहादियों की परवरिश और परिपोषण करने के लिए किया। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने स्पष्ट तौर पर पाक़ हुकूमत और फौज पर आरोप लगाया गया कि अमेरिका को धोखा दिया है। यहां तक 9-11 आक्रमण के सरगना ओसामा बिन लादेन को पाक फौज ने वर्षों तक अपने संरक्षण में छुपाकर रखा गया।

अफगानिस्तान का गृहयुद्ध संभवत: विश्व इतिहास में सबसे लंबे काल तक चलने वाले गृहयुद्धों की श्रेणी में शुमार किया जाएगा। वर्ष 1978 में अफगानिस्तान में साम्यवादी हुकूमत कायम हुई थी, तभी से कट्टरपंथी मुल्लाओं द्वारा हुकूमत के विरुद्ध जेहादी युद्ध प्रारम्भ कर दिया गया। अमेरिका और पाकिस्तान ने सोवियत रूस बनाम जेहादी जंग में विशिष्ट किरदार अदा किया। पाक़ के सरहदी इलाकों को आधार क्षेत्र बनाकर समस्त जेहादी युद्ध संचालित किया गया। वर्ष 1990 में अफगानिस्तान की सरजमीं से सोवियत रूस की फौजों की वापसी के बाद इस दस वर्षों तक चलने वाले युद्ध का अंत हुआ। अफ़गानिस्तान में सोवियत फौज के विरुद्ध एकजुट हुए विभिन्न ज़ेहादी गुट उसकी वापसी के बाद परस्पर युद्ध में उलझ गए आखिरकार पाक़ फौज़ की सक्रिय सहायता से अफ़गानिस्तान में मुल्ला उमर की कयादत में तालिबान हुकूमत की बाकायदा स्थापना कर डाली। अफगानिस्तान के शासक मुल्ला उमर का प्रेरक था ओसामा बिन लादेन जिसकी तंजीम अलकायदा ने न्यूयार्क वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर जेहादी आक्रमण अंजाम दिया था। अमेरिका के नेतृत्व में नॉटो फौज़ द्वारा काबुल पर वर्ष 2001 के दिसंबर माह में हमला करके आधिपत्य स्थापित कर लिया गया तभी से नॉटो फौज़ की उपस्थिति निरंतर अफगानिस्तान में बनी हुई है। एक युद्ध के ऐतिहासिक दौर में तो एक लाख दस हजार नॉटो फौज़ अफ़गानिस्तान में तैनात रही। अमेरिका को अफगानिस्तान में विगत बीस वर्ष के दौरान 145 बिलियन डॉलर खर्च करने पड़े हैं जिसमें से 88 बिलियन डॉलर अफ़गान हुकूमत की सेना को खड़ा करने के लिए खर्च करना पड़े। 20 वर्ष की जंग में जहां अमेरिका को अपने 2500 सैनिकों का बलिदान देना पड़ा वहीं अफ़गानिस्तान के करीब 65 हजार सैनिक हताहत हुए हैं। अफगानिस्तान के एक लाख से अधिक नागरिकों को भी युद्ध में अपनी जान गंवानी पड़ी है। अपने सैन्य इतिहास का सबसे लंबा युद्ध अमेरिका को अफगानिस्तान में लड़ना पड़ा जो वियतनाम युद्ध से कहीं लंबा खीच गया। इस सबके बावजूद अमेरिका इस युद्ध में निर्णायक तौर पर तालिबान के परास्त नहीं कर सका है। क्या अब अफ़गान फौज को अकेले ही तालिबान जेहादियों से निपटना पड़ेगा जिनका सफाया करने में अमेरिकी फौज भी नाकाम रही। जेहादी आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है और अफ़गान हुकूमत इसको अकेले परास्त नहीं कर सकती है। अफगानिस्तान में आईएस और अलकायदा आदि जेहादी तंजीमें भी विद्यमान है।

शंघाई कॉरपोरेशन आर्गेनाइजेशन के सेक्रेटरी जनरल और उजबेकिस्तान के पूर्व विदेशमंत्री नोरोव फरमाते हैं कि आईएस के जेहादी लड़ाके अब सीरिया से उत्तरी अफगानिस्तान में अपना बेस स्थापित करने में जुटे हुए हैं। जेहादियों की अफगानिस्तान में निरंतर बढ़ती जाती शक्ति से मध्य एशिया, भारत और चीन के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है। अमेरिका चाहता तो मध्य एशिया के देशों, भारत और चीन को एकजुट करने की कोशिश कर सकता था किंतु वह अधर में छोड़कर भाग खड़ा हुआ। भारत अब ये पहल सकता है कि एशिया में जेहादियों का खात्मा कर सकने वाली ताकतों को एकजुट करे। रूस भारत और चीन अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साझीदार है। तालिबान अफगानिस्तान पर आधिपत्य स्थापित की कोशिश करेगा। ऐसे विकट हालात में भारत,रूस मध्य एशिया के अन्य देशों जॉर्जिया उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान के साथ एकजुट होकर अफगानिस्तान हुकूमत को ताकतवर बनाए, अभी तक अशरफ गनी की अफ़गान हुकूमत ने दृढ़ता का प्रदर्शन किया है और अमेरिकी दबाव के बावजूद तालिबान कैदियों के रिहा करने से साफ इनकार किया है। अफ़गानिस्तान में यथा शीघ्र शांति की स्थापना होनी चाहिए, किंतु यह तब तक मुमकिन नहीं जब तक कि जेहादी शक्तियां अफ़गान सरकार के साथ शांति वार्ता करने के लिए तैयार न हो जाए। अफगानिस्तान, इराक और सीरिया आदि देशों का तजुर्बा बताता है कि जेहादी केवल शस्त्र बल से सत्ता हथियाना चाहते हैं और केवल हिंसा की भाषा समझते रहे हैं।

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