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निरंकार सिंह का लेख: आदिशंकराचार्य के संदेश

आदि शंकराचार्य ने आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना की थी। पीढि़यां आईं और गईं। साम्राज्यों का उदय तथा पतन हुआ, परन्तु शंकराचार्य का साम्राज्य आज भी विद्यमान है। अपने इस आध्यात्मिक साम्राज्य की रक्षा तथा देख-रेख के लिए देश के चारों कोनों में चार बड़े-बड़े मठ स्थापित किए। इसके अतिरिक्त काशी में उन्होंने मुमेरू मठ की स्थापना की। विज्ञान इसका शरीर है। सत्य और ज्ञान उसके दो पद है। वर्तमान शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती आज भी धर्मोपदेश देते हैं।

निरंकार सिंह का लेख: आदिशंकराचार्य के संदेश

आदि शंकराचार्य देश के उन महानतम व्यक्तियों में से एक हैं, जिनका महत्व सर्वकालिक है, वे सर्वव्यापी कहे जा सकते हैं। वे विद्वान, ऋषि, रहस्यवादी तथा धर्म सुधारक थे। वे कर्मयोगी, भक्तयोगी तथा ज्ञान योगी थे, हर श्रेणी में अग्रणी थे। कर्म के आधार पर उन्होंने दूसरों की भांति ही सांसारिक कार्यों में ख्याति अर्जित की। उन्होंने ऐसा धर्म प्रस्तुत किया जिसके मूल में सर्भी धर्म स्थित है। वे अनन्त आस्था और श्रद्धा वाले व्यक्ति थे। उन्होंने उपनिषदों, वेदांत तथा भागवत्ा गीता का गहन अध्ययन किया था।

यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि किस वर्ष में उनका जन्म और मृत्यु हुई थी, पर मैक्स मूलर का विश्वास था कि उनका जन्म केरल के कालन्दी गांव में सन्ा 788 में वैशाख शुक्ल पंचमी 28 अप्रैल के दिन एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जब वह तीन वर्ष के हुए तब उनका मुंडन हुआ, किन्तु इसके बाद ही उनके पिता इस संसार से चले गए। इस छोटी सी अवस्था में शंकराचार्य अनाथ हो गए। इसके बाद वह पढ़ने के लिए गुरुकुल चले गए। वह केवल दो वर्ष ही गुरुकुल में रहे, किन्तु इस अवधि में उन्होंने वेद, वेदान्त और वेदांगों की पढ़ाई पूरी कर ली। उस समय उनकी आयु लगभग सात-आठ वर्ष की थी। उनकी विद्वता और योग्यता की धूम चारों ओर फैल रही थी। उन्हें मलाबार के राजा अपने यहं राज पंडित बनाना चाहते थे, पर उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अपनी माता से संन्यास लेने की अनुमति मांगी पर वह तैयार नहीं हुई। काफी मान मनव्वल के बाद अन्त में वह संन्यासी बन गए। वह घर से निकलकर नर्मदा नदी के तट पर पहुंचे। वहां स्वामी गोविन्द भगवत्पाद से उन्होंने संन्यास की दीक्षा ली। इसके बाद शंकराचार्य ने गुरु के बताए हुए तरीके से साधना आरम्भ कर दी। कुछ ही समय में उन्होंने योग में सिद्धि प्राप्त कर ली और साथ ही अद्वैतवाद का गंभीर अध्ययन किया। गुरु ने प्रसन्न होकर आदेश दिया कि वे काशी जाकर वेदान्त सूत्र का भाग्य लिखें।

इसके बाद शंकराचार्य काशी पहुंच गए। काशी में वह गंगा स्नान करने जा रहे थे कि उनके रास्ते में एक चांडाल अपने चार कुत्तों के साथ खड़ा मिला। उसे देखते ही शंकराचार्य ने ऊंचे स्वर में कहा, दूर हटो, दूर हटो। उनकी बात सुनकर चांडाल ने कहा, हे विद्वान आपने यह कहा कि दूर हटो तो इससे आप देह से हटाना चाहते है अथवा देही से। यह शरीर तो अन्नमय कोश से बना है। ऐसी दशा में एक अन्नमय शरीर दूसरे से अन्नमय शरीर से भिन्न कैसे है? प्रत्येक शरीर में स्थित साक्षी और दृष्टा आत्मा एक ही है। हे मुनिवर, इन दोनों में आप किसे हटाने की इच्छा करते है? आप शास्त्रज्ञ संन्यासी हैं, देवताओं और विद्वानों द्वारा पूजनीय और वंदनीय है फिर भी आपके साथ यह झमेला लगा हुआ हैं कि मैं पवित्र ब्राह्मण हूं और तुम चांडाल हो। अत: दूर हटो। यह आपका मिथ्या आग्रह कैसा? आप समस्त शरीरों में स्थित एवं अशरीरी पुराण पुरुष की अवहेलना कर रहे हैंं। ऐसा कहकर चांडाल चुप हो गया। अब शंकराचार्य संदेह में पड़ गए कि यह चांडाल है अथवा चांडाल के वेष में कोई अन्य महान पुरुष? उन्होंने उससे कहा, हे प्राणियों में श्रेष्ठ आपके वचन तर्कसंगत और सारगर्भित हैं। आपका कथन सर्वथा सत्य है। जिसकी ऐसी बुद्धि और ऐसी निष्ठा है कि वह चैतन्य मैं हूं यह दृश्य जगत नहीं, वह चांडाल भले ही हो, पर वह मेरा गुरु है। संसार के विविध विषयों के अनुभव करते समय, जहां ज्ञान उत्पन्न होता है, वहां समस्त उपाधियों से रहित मैं ही विद्यमान हूं। मुझसे भिन्न कोई पदार्थ नहीं है, ऐसी जिसकी बुद्धि है वह पुरुष मेरा गुरु है। इस प्रकार शंकराचार्य को काशी में आकर तत्व ज्ञान चांडाल से प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि चांडाल के वेष में भगवान शिव ने ही शंकराचार्य की परीक्षा ली थी।

यह आश्चर्यजनक है कि वैज्ञानिक जिन निष्कर्षों पर पहुंचे हैं, वे आदि शंकराचार्य की िशक्षा के कितने समीप हंै, मनुष्य की आत्मा केवल ध्यान तथा आत्म निरीक्षण के द्वारा तत्व ज्ञान प्राप्त कर सकती है, जिसे समझने के लिए शताब्दियों तक शोध कार्य करना पड़ेगा। सर जेस्म जीन्स, सर आर्थर एडिंगटन, एलबर्ट आइंस्टीन तथा मैक्स प्लांक जैसे आधुनिक वैज्ञानिकों का मुख्य संदेश यह है कि यद्यपि बह्मांड का अस्तित्व है, परन्तु वह प्रकट रूप से वास्तविकता से भिन्न है। सत्य ज्ञान तत्व केवल आत्मा है। आत्मा अनंत है। डा. रामा स्वामी अय्यर का विश्वास है कि बीसवीं शताब्दी में प्रतिपादित सापेक्षिता के सिद्धान्त का प्राचीन भारत को 3000 वर्ष पूर्व ज्ञान प्राप्त हो चुका था। कई लेखकों ने उनके विषय में लिखते हुए कहा है कि उनकी मुख्य देन है सभी धर्मों को परस्पर जोड़ना। भारत के प्रत्येक भाग में मठ स्थापित करने का उनका उद्देश्य यही था।

पूर्वी तथा पश्िचमी विचारकों ने चार तत्व बताए हैं। उनका पहला संदेश था कि तुम्हें शाश्वत और क्षणिक में अवश्य भेद करना चाहिए। एक का अस्तित्व है पर अनेक परिवर्तित होते रहते हैं। तो जो वस्तु गुजर जाती हो या बदल जाती हो उसके साथ सम्बन्ध न रखों। शाश्वत के साथ जुड़ जाओ क्योंकि वह परम्ा ज्ञान है। यद्यपि वह पारिवारिक जीवन के विरुद्ध नहीं थे, पर उनका संदेश था कि याद रखों कि जो कुछ तुम्हारे चारों ओर है, चाहे धन हो अथवा परिवार वह सब क्षणभंगुर है। इनके साथ अत्यधिक लगाव अनादि से हटाकर क्षणभंंगुरता की ओर उन्मुख करता है।

आदि शंकराचार्य ने आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना की थी। पीढि़यां आईं और गईं। साम्राज्यों का उदय तथा पतन हुआ, परन्तु शंकराचार्य का साम्राज्य आज भी विद्यमान है। अपने इस आध्यात्मिक साम्राज्य की रक्षा तथा देख-रेख के लिए देश के चारों कोनों में चार बड़े-बड़े मठ स्थापित किए। इसके अतिरिक्त काशी में उन्होंने मुमेरू मठ की स्थापना की। विज्ञान इसका शरीर है। सत्य और ज्ञान उसके दो पद है। इसका नाम श्ोषाम्नाय या ऊध्र्वाम्ननाय भी है। जहां उनके प्रतिनिधि के रूप में वर्तमान शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती आज भी धर्मोपदेश देते हैं। भारत मेें धार्मिक और सांस्कृतिक एकता को लाने में इन मठों का बहुत बड़ा योगदान है। बद्रीनाथ, द्वारिकापुरी, जगन्नाथपुरी और मैसूर में आदि शंकराचार्य ने एक एक मठ बनाकर अपना एक एक िशष्य वहां रख दिया, जो गुरु िशष्य परम्परा के अनुसार आज भी चल रहे हैं। इन मठों के शंकराचार्य अब अपने को जगतगुरु भी कहते हैं। आदि शंकराचार्य के कार्य की सीमा यहीं पर समाप्त नहीं होती। उन्होंने संस्कृत में अनेक ग्रंथ लिखे हैं। इन ग्रंथों में ब्रह्मसूत्र भाष्प, ईश, केन, मठ आदि लगभग 12 उपनिषदों का प्रमाणित भाष्य, गीता भाष्य, सर्ववेदान्त– सिद्धान्त संग्रह, विवेक चूड़ामणि, प्रबोध सुधाकर बहुत विख्यात हैं। ये सारे कार्य उन्होंने 32 वर्ष में ही पूरे कर डाले। इसके बाद उनकी जीवन लीला समाप्त हो गई।

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