Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

संपादकीय लेख: कचरा के लिए जिम्मेदार कंपनियों पर कार्रवाई हो

यह प्लास्टिक शहरों में जलभराव के लिए जिम्मेदार तो है ही, इसे सेहत के लिए बेहद खतनाक माना जाता है। कई प्रयासों के बावजूद सिंगल यूज प्लास्टिक को बाजार से नहीं हटाया जा सका है। आज भी सिंगल यूज प्लास्टिक हमारे जीवन का अहम हिस्सा बना हुआ है।

संपादकीय लेख:  कचरा के लिए जिम्मेदार कंपनियों पर कार्रवाई हो
X

संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : आज जब दुनिया कोरोना महामारी का सामना कर रही है और भारत नई बीमारी ब्लैक फंगस से जूझ रहा है, इस बीच प्रदूषण पर एक शोध ने विश्व का ध्यान खींचा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक बीसेक पेट्रोकेमिकल कंपनियों से दुनिया में 55 फीसदी प्रदूषण होता है और 90 फीसदी प्लास्टिक कचरे के लिए सिर्फ 100 कंपनियां जिम्मेदार हैं। पेरिस क्लाइमेट करार के मुताबिक सभी सदस्य देश प्रदूषण कम करने पर सहमत हैं।

ग्रीन क्लाइमेट के लिए भारत समेत विश्व के अनेक देश सिंगल यूज प्लास्टिक के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। चूंकि दैनिक उपयोग में आने वाली ज्यादातर चीजें प्लास्टिक के पैकेट में आ रही हैं। जिससे हम एक बार इस्तेमाल करने के बाद फेंक देते हैं उसे हम सिंगल यूज प्लास्टिक कहते हैंसिंगल यूज प्लास्टिक से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। यह प्लास्टिक शहरों में जलभराव के लिए जिम्मेदार तो है ही, इसे सेहत के लिए बेहद खतनाक माना जाता है। कई प्रयासों के बावजूद सिंगल यूज प्लास्टिक को बाजार से नहीं हटाया जा सका है। आज भी सिंगल यूज प्लास्टिक हमारे जीवन का अहम हिस्सा बना हुआ है। चौंकाने वाली बात है कि इसमें दुनिया के कई बड़े देश भी शामिल हैं। बड़े देशों की ओर से प्लास्टिक बनाने वाली कंपनियों को आर्थिक मदद भी पहुंचाई जाती है। विश्व भर में निकलने वाले इस तरह के सिंगल यूज प्लास्टिक कचरे का 90 फीसदी सिर्फ 100 कंपनियां पैदा कर रही हैं।

दुनिया का आधे से ज्यादा प्लास्टिक कचरा सिर्फ 20 कंपनियां पैदा कर रही हैं और ये सभी पेट्रोकेमिकल से जुड़ी हैं। ये कंपनियां अमेरिका, चीन, ब्रिटेन आदि देशों की भी हैं। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, स्टॉकहोम एनवायरनमेंट इंस्टीट्यूट और मिंडेरू फाउंडेशन ने रिसर्च के दौरान सिंगल यूज प्लास्टिक के पीछे काम कर रहे कॉरपोरेट नेटवर्क की तहकीकात की। इसके लिए दुनिया भर में सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को कच्चा माल सप्लाई करने वाली एक हजार से ज्यादा कंपनियों का अध्ययन किया गया, जिनका इस्तेमाल पैकेजिंग, फूड रैपर्स, प्लास्टिक बॉटल और बैग्स बनाने में होता है, जिन्हें हम इस्तेमाल के बाद फेंक देते हैं, जो बाद में समुद्र तक पहुंच जाते हैं। इस अध्ययन का दूसरा चौंकाने वाला खुलासा यह है कि बीस वित्तीय संस्थान सिंगल यूज प्लास्टिक बनाने कंपनियों को 60 फीसदी वित्तीय सहायता दे रहे हैं। बार्कले, एचएसबीसी, बैंक ऑफ अमेरिका जैसे दिग्गज वित्तीय संस्थान प्लास्टिक बनाने वाली कंपनियों को आर्थिक मदद दे रहे हैं। केवल ये तीन संस्थान ही प्लास्टिक बनाने वाली कंपनियों को ढाई लाख करोड़ रुपये दे चुके हैं।

सवाल है कि इस तरह की अनदेखी से सिंगल यूज प्लास्टिक से विश्व को निजात कैसे मिलेगी? क्लाइमेट करार का मकसद कैसे पूरा होगा। प्रदूषण मुक्त विश्व की ओर हम कैसे बढ़ेंगे? हम अपने पर्यावरण को शुद्ध कैसे बनाएंगे? ऐसे अनेक सवाल हैं, जो विश्व के विकसित व विकासशील देशों के नीति नियंताओं के सामने हैं। विकसित देशों का दोहरा रवैया विकासशील देशों व विश्व पर भारी पड़ता है। अगर हमें अपने पर्यावरण को स्वच्छ रखना है, विश्व को प्रदूषण से बचाना है, सिंग यूज प्लास्टिक के दुष्प्रभाव से धरती-सागर व जीव को बचाना है, तो हमें इसके निर्माताओं को रोकना होगा, ऐसी कंपनियों के वित्तीय स्रोत को सूखाने होंगे, उन पर काठोर कार्रवाई करनी होगी, तभी विश्व प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्त हो सकेगा।

Next Story