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अमिताभ कांत व अमित कपूर का लेख : मूलभूत जरूरतों तक पहुंच ही सही विकास

एक पैमाने के रूप में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) देश के विकास का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन यह उन महत्वपूर्ण तत्वों को समाहित नहीं करता है, जो नागरिकों के कल्याण को प्रभावित करते हैं। दुनियाभर के विशेषज्ञ मानते हैं कि बुनियादी जरूरतों को सुनिश्चित करना ही विकास की गारंटी के रूप में अहम है। स्थायी विकास के अन्य महत्वपूर्ण कारक हैं- बेहतर आर्थिक अवसरों को मजबूत करना और आवागमन में आसानी। यह ठीक वैसा ही है, जैसे लोगों के कल्याण के लिए अधिकारों की रक्षा करना। वित्तीय समावेशन, पर्यावरणीय गुणवत्ता और सतत विकास को ध्यान में रखते हुए कल्याण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

अमिताभ कांत व अमित कपूर का लेख : मूलभूत जरूरतों तक पहुंच ही सही विकास
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अमिताभ कांत व अमित कपूर

अमिताभ कांत व अमित कपूर

भारत के विकास कार्यों के सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्यों में से एक, नागरिकों के जीवन को आसान बनाना है। एक पैमाने के रूप में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) देश के विकास का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन यह उन महत्वपूर्ण तत्वों को समाहित नहीं करता है, जो नागरिकों के कल्याण को प्रभावित करते हैं। आवास, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच में सुधार, लोगों के जीवन को आसान बनाता है और उत्पादकता, आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है, जो लम्बे समय तक लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक होते हैं। दुनियाभर के विशेषज्ञ मानते हैं कि बुनियादी जरूरतों को सुनिश्चित करना ही विकास की गारंटी के रूप में अहम है। यह बात, इस व्यापक चिंता का परिणाम है कि देश का आर्थिक विकास, लोगों की मूलभूत जरूरतों तक आसान पहुंच सुनिश्चित नहीं करता है। स्थायी विकास के अन्य महत्वपूर्ण कारक हैं- बेहतर आर्थिक अवसरों को मजबूत करना और आवागमन में आसानी। यह ठीक वैसा ही है, जैसे लोगों के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है- उनके अधिकारों की रक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करना।

वित्तीय समावेशन, बेहतर पर्यावरणीय गुणवत्ता और सतत विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सभी के लिए व्यक्तिगत कल्याण सुनिश्चित किया जाना चाहिए। पिछले पांच वर्षों में, भारत ने जल तथा स्वच्छता से लेकर ई-प्रशासन और डिजिटल अवसंरचना प्रावधानों तक- सभी क्षेत्रों में अपने प्रदर्शन में सुधार किया है। प्रति 100 व्यक्तियों पर इंटरनेट ग्राहकों की औसत हिस्सेदारी 2015 (मार्च) में 27.95 से बढ़कर 2020 (मार्च) में 61.57 हो गई है। इंटरनेट कनेक्टिविटी की सुविधा वाले ग्राम पंचायतों की औसत हिस्सेदारी भी 2016 में 11.37 से बढ़कर 2020 में 77.01 हो गई है। पेयजल का प्रमुख स्रोत (प्रति 100 की तुलना में) भी 2012 में 32.4 से बढ़कर 2018 में 40.0 हो गया है। देश के समग्र विकास की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार ने अपने नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के प्रयास किए हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना, दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन, स्वच्छ भारत मिशन-शहरी और ग्रामीण दोनों, जल जीवन मिशन, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, महात्मा गांधी रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 (मनरेगा) जैसे कार्यक्रमों ने भारत को विकास मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ाया है। संयोग से, ये कार्यक्रम सतत विकास लक्ष्य के तहत 169 लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को भी अभिव्यक्त करते हैं। चूंकि किसी भी देश में मौजूद जीवन की गुणवत्ता और तरक्की को समझने के लिए माप की कोई एक निश्चित इकाई नहीं हो सकती है, इसलिए ये बहुत जरूरी है कि ऐसा तंत्र विकसित किया जाए, जो जीवन स्तर और विकास के बेहतर मूल्यांकन को सुनिश्चित कर सके।

ऐसा मूल्यांकन, आर्थिक विकास के मूल्यों को नकारता नहीं है, बल्कि ये एक ऐसा मूल्यांकन विकसित करने की कोशिश करता है, जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक प्रगति पर भी ध्यान देता है। भारत के लोगों के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए, नीति आयोग 'ईज़ ऑफ लिविंग: स्टेट एंड डिस्िट्रक्ट लेवल असेसमेंट' शुरू कर रहा है, जिसे भारत के इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पिटेटिवनेस द्वारा विकसित और विश्लेषित किया गया है। ये मूल्यांकन राज्य और जिला स्तर पर नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता की जांच करते हुए सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद की भावना को रेखांकित करते हैं। वास्तव में, ये मूल्यांकन जीडीपी वृद्धि के जरिये किसी देश की तरक्की के आकलन के नए तरीकों को अपनाना चाहते हैं। ये माप का ऐसा मानक है, जो व्यापक दायरा और दृष्टिकोण मुहैया कराता है। जिन तत्वों को हम मापने के लिए चुनते हैं, वे नीतियों को डिजाइन करने, तैयार करने और लागू करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भारत सरकार ने देश में 'ईज़ ऑफ लिविंग' यानी जीवन में सुगमता लाने के लिए कई प्रयास किए हैं। सरकार ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत करीब 80 मिलियन गैस सिलेंडर वितरित किए। योजना को घरेलू और परिवेश जनित वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मृत्यु दर कम करने के लिए लागू किया था। इस योजना की शुरुआत से पहले भारत विश्व स्तर पर दूसरे स्थान पर था।

उजाला योजना के तहत पूरे देश में 350 मिलियन एलईडी बल्ब भी वितरित किए हैं, नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन जीवन स्तर को बेहतर बनाने पर भी ध्यान देती है। एक अवधारणा के तौर पर ईज़ ऑफ लिविंग को बहुआयामी प्रणाली के रूप में पारिभाषित किया जा सकता है, जो अपने सभी निवासियों के शारीरिक, सामाजिक और मानसिक कल्याण में योगदान करती है। ये नागरिकों के वर्तमान जीवन स्तर और प्रमुख अनुकूल परिवेश, दोनों की जांच करता है, जो जीवन स्तर को बढ़ावा देने के अवसर प्रदान करते हैं। बेहतर जीवन स्तर देने के लिए महत्वपूर्ण मानकों के आधार पर राज्यों व जिलों का प्रदर्शन मापना अनिवार्य है। इसलिए 28 राज्यों और 9 केंद्र शासित प्रदेशों में और जिला स्तर पर 712 जिलों में इसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए, जीवन स्तर की जांच करना और डेटा आधारित आकलन के मद्देनजर नीतिगत निर्णय लागू करना आवश्यक है। आकार की दृष्टि से राजस्थान जर्मनी जितना बड़ा है, तो जनसंख्या के मामले में, उत्तर प्रदेश की रूस की आबादी से अधिक हैं। जीवन की सुगमता को समझने के लिए एक ऐसे विश्लेषण की आवश्यकता है, जो क्षेत्रीय और जनसांख्यिकीय असमानताओं के पहलुओं पर विचार करे।

क्षेत्रीय असमानता अक्सर राज्यों में होती है। असम में मातृ मृत्यु अनुपात 237 है, जो अधिक है जबकि केरल में 46 है, जिसे संतोषजनक कहा जा सकता है। एक ही क्षेत्र के राज्यों में भी विभिन्न अंतर दिखाई देते हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि विकास संबंधी मुद्दों को हल करने के लिए नीतिगत निर्णय एक सर्व-समावेशी दृष्टिकोण के रूप में हमेशा केंद्र सरकार द्वारा नहीं लिए जा सकते हैं। राष्ट्रीय या राज्य-स्तरीय निर्णय, मांगों और जरूरतों के संदर्भ में क्षेत्र-विशिष्ट चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते हैं इसलिए, जिला-स्तरीय अध्ययन जमीनी स्तर पर प्रगति को आगे बढ़ा सकता है। यह स्थानीय सरकारों को अपनी ताकत और कमजोरियों की पहचान करने तथा विशिष्ट क्षेत्रों में चुनौतियों का समाधान के लिए महत्व वाले क्षेत्रों की पहचान करने में सक्षम बनाएगा। ऐसे में जब देश विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, जीवन की सुगमता जैसे निर्धारक तत्व; डेटा आधारित नीतिगत निर्णयों के माध्यम से बदलाव को दिशा देने में मदद करेंगे। यह सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय क्षेत्रों में बेहतर विकास परिणामों को बढ़ाने के लिए क्या महत्वपूर्ण है, इस पर आम सहमति बनाएगा। इस तरह के प्रयास यह सुनिश्चित करेंगे कि भारत की आर्थिक प्रगति, जमीनी स्तर तक नागरिकों के जीवन-यापन की आसानी को बेहतर बनाने में हुई प्रगति के साथ मेल खाती हो।

( अमिताभ कांत नीति आयोग के सीईओ हैं व अमित कपूर इंस्टीट्यूट फोर कॉम्पिटिटिवनेस, इंडिया के चेयरमैन और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में विजिटिंग स्कॉलर हैं, ये लेखकद्वय के अपने विचार हैं। )

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