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संस्मरण - डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम

मां का स्पर्श अद्वितीय था

संस्मरण - डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम
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मां का स्पर्श अद्वितीय था

कोई सामान्य व्यक्ति हो या महान हस्ती, उसके जीवन को संवारने में उसकी मां की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। वह स्वयं तमाम तकलीफें सह लेती है लेकिन अपने बच्चे के हित और उसकी खुशी में कोई कमी नहीं आने देती है। अपनी मां से जुड़ीं कुछ ऐसी ही मार्मिक स्मृतियां भारत के पूर्व राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी पुस्तक ‘मेरी जीवन यात्रा’ में संजोयी हैं। प्रस्तुत है, उसका एक संपादित अंश।

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कई वर्ष पहले मैंने एक कविता लिखी थी, जिसकी शुरूआत में ये पंक्तियां थीं-
‘सागर की लहरें, सुनहरी रेत, यात्रियों की आस्था,
रामेश्वरम की मसजिद वाली गली,
सब आपस में मिलकर एक हो जाती हैं
वह है मेरी मां!’
अगर मैं अपने बचपन की बात करूं, मेरी याद में रामेश्वरम के घर की यादें ही उभारकर आती हैं। खासतौर से दो व्यक्ति, जिनके इर्द-गिर्द मेरा जीवन बीता। वे हैं मेरे पिताजी व मेरी मां, जो मेरे जीवन के केंद्रबिंदु थे। हमारा परिवार एक मध्यम वर्गीय परिवार था। मेरे पिता मसजिद के इमाम थे। उनका छोटा सा कारोबार था। मेरी मां का नाम आशियम्मा था। उनके परिवार के एक सदस्य को ब्रिटिश सरकार से ‘बहादुर’ की उपाधि मिली थी और उनका समाज में अच्छा सम्मान था।
मेरी मां स•य एवं साधारण जीवन जीने वाली तथा हर समय विनम्र रहती थीं। उनके मन में कभी अभिमान नहीं आया था। वह मेरे पिता की तरह एक धार्मिक तथा समर्पित मुस्लिम स्त्री थीं। मेरे दिमाग में अभी भी उनकी छवि बनी हुई है, जो दिन में पांच बार नमाज पढ़ती थीं। वे झुककर पूरे विश्वास से नमाज पढ़ती थीं। उनके चेहरे पर हर समय शांति का भाव बना रहता था। उनका मुख्य काम सारे परिवार की जिम्मेदारी संभालना था। वे अपने उस कार्य में ही पूरी तरह से जुड़ी रहती थीं।
हमारे परिवार में मैं, मेरे छोटे भाई-बहन तथा कई रिश्तेदार थे, जिनमें मेरे दादा-दादी एवं चाचा शामिल थे। हम सब मिलकर एक ही घर में रहते थे। हर किसी की जरूरतों को पूरा करना एक मुश्किल काम तथा चिंता का विषय था। हम सबके लिए सीमित साधन थे। हमें अपनी जरूरतों को उसी के अनुसार पूरा करना होता था। हमारे परिवार का निर्वाह मेरे पिता के नारियल के बागों के कारोबार तथा ‘फेरी’ के व्यापार से ही होता था। इस आमदनी से सिर्फ हमारी जरूरतें पूरी होती थीं। इसके अलावा हम विलासिता तथा आराम के साधनों पर खर्च नहीं करते थे।
ऐसी स्थिति में मेरी मां मेरे पिताजी की आदर्श पत्नी थीं। वे परिवार के लिए जरूरत के अनुसार बचत करती थीं तथा दिन के छोटे-छोटे खर्चों में कमी बरतती थीं, लेकिन उनके चेहरे पर कभी क्रोध व खीज का भाव नहीं आता था। रोज घर के सभी सदस्यों को खाना परोसा जाता था और सभी की पूरी देखभाल की जाती थी।
अकसर हमारे घर में कई मेहमान आ जाते थे, जिन्हें खाना खाए बिना वापस नहीं जाने दिया जाता था। मैं आज सोचता हूं कि परिवार के सभी सदस्यों के साथ वे मेहमानों के लिए सभी इंतजाम कर लेती थीं! हमारे घर में यह रोज की बात थी और इसको साधारण रूप से लिया जाता था तथा इस पर किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं की जाती थी। यह भारत के आतिथ्य की भावना थी, जो किसी समय पूरे समाज में पाई जाती थी, जिस पर गर्व किया जाता है।
मेरा परिवार प्रसन्नचित्त रहने वाला परिवार था। मेरी यादों में आज भी मां के साथ खाया जाने वाला भोजन बसा है, जिसे रसोई में फर्श पर बैठकर खाते थे। केले के पत्तों को बिछाकर चावल, खुशबूवाला सांभर, घर की बनी हुई चटनी तथा अचार रखा होता था। वे व्यंजन सबको बहुत स्वाद वाले लगते थे। मां का खाना साधारण ही होता था लेकिन मैंने आज तक मां के हाथ जैसा बना सांभर नहीं खाया, जिसमें सभी तरह के मसाले स्वाद के अनुसार संतुलित रूप से डाले जाते थे। इसी तरह से, मेरे खाने से जुड़ी एक कहानी है, जो मेरे बचपन की यादों की तरह आज भी ताजा बनी हुई है।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान राशन का कोटा तय कर दिया गया था, क्योंकि उस समय वस्तुओं की भारी कमी हो गई थी। मेरी मां तथा दादी ने ऐसे हालात में इस बड़े परिवार को बांधकर रखा था। वे पूरी कोशिश करती थीं कि किसी तरह से पूरे परिवार का निर्वाह हो सके और कोई भी वस्तु बेकार न हो। वे अकसर अपने खाने में बचत कर, बच्चों को पूरा खाना देती थीं, ताकि बच्चों के खाने में कोई कमी न रह जाए।
एक दिन मेरी मां ने चावल न बनाकर रोटियां बनाई थीं। मैं रसोई में अपनी जगह पर बैठ गया तथा स्वाद लेकर रोटियां खा रहा था। वे गरम-गरम रोटियां एक-एक कर मुझे देती जा रही थीं और मैं स्वाद से खाना खाता जा रहा था। मैं एक भूखा छोटा बच्चा था।जब मेरा पेट पूरी तरह से भर गया तो मैंने अपने केले के पत्ते को उठाया तथा बाहर फेंकने गया। इसके बाद मैंने अपने हाथ धोए। बाद में रात को मेरे बड़े भाई ने मुझे एक कोने में ले जाकर पहली बार बुरी तरह से डांटा और कहा, ‘तुम कैसे अपनी आंखें बंद कर यह सब कर रहे थे?’
पहले-पहल तो मुझे अंदाजा ही नहीं हो रहा था कि मेरे भाई मुझे क्यों डांट रहे थे। मैं अपने भाई के गुस्से के कारण नहीं जान पा रहा था और उनकी तरफ एकटक होकर देख रहा था। इसके बाद वे शांत हो गए और मुझसे कहने लगे, ‘क्या तुम जानते हो कि हम सबको राशन का सीमित कोटा मिलता है? हर किसी के हिस्से में दो-तीन रोटियां ही आती हैं? अगर तुम अम्मा से और खाने को मांगोगे तो वे मना नहीं करेंगी, क्योंकि वे बना रही थीं और तुम खाते जा रहे थे। लेकिन वह बीती रात भूखी ही रह गर्इं, क्योंकि उनके लिए खाने को कुछ भी नहीं बचा था।’
वह क्षण मेरे लिए शर्मसार करने वाला था, जिसने मेरे दिल को पूरी तरह से तोड़ दिया था। मुझे अपनी प्यारी मां का ख्याल आ रहा था, जो मेहनत करके, बहुत कमजोर हो चुकी थीं। मैंने अब तक अपनी मां जैसी अन्य कोई ऐसी परिश्रमी औरत नहीं देखी थी। इस चिंता ने मेरे दिल को पूरी तरह से तोड़ दिया था। मैं मन ही मन बहुत दु:खी हो रहा था और लगभग रो रहा था।
मैं किसी को अपना चेहरा दिखाने के काबिल नहीं था। इसके बाद मैं कुछ दिनों तक अपनी मां के सामने नहीं जा सका।मैं उनसे आंखें मिलाकर बात नहीं कर सकता था।
मेरे लिए यह एक खास नसीहत थी-अपने से जुड़े लोगों की जरूरतों पर ज्यादा ध्यान दें। उनके प्यार ने मेरे साथ अपना भोजन बांटने के लिए एक पल भी नहीं लगाया और उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना खाना मुझे दे दिया था। मेरे भाई ने मुझे यह नसीहत दी कि मैं कुछ सभी खाने से पहले अपने से जुड़े लोगों के बारे में सोचूं, ‘क्या उनके पास सभी मेरे बाद कुछ खाने को बचा है, विशेषकर अपनी दादी व अम्मा के बारे में यह सुनिश्चित कर लूं।’
मैं अकसर घर सुबह जल्दी ही छोड़ देता था, क्योंकि मुझे अपनी उच्च शिक्षा के लिए बड़े शहरों में जाना था। मैं अपने दोस्तों की तरह हर समय अपनी मां से जुड़ा नहीं रहता था और एक छोटा बच्चा बनकर नहीं रहना चाहता था। उनकी सज्जनता तथा अपने निकटस्थ लोगों की देखभाल करने का भाव हर समय मेरे साथ जुड़ा रहता था और वह मेरे दिल में घर कर चुका था।दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब मैं केवल 8 वर्ष का था, मैंने पहले भी इसके बारे में बताया है कि कैसे मैंने अखबार बांटने का काम शुरू किया था।
मैं सुबह होने से पहले ही जाग जाता था और फिर ट्यूशन जाता था, फिर ‘कुरान’ पढ़ने जाता था, बाद में अखबार बांटने का कार्य करता था। इसके बाद मैं स्कूल जाता था और शाम के बाद घर लौटकर आता था। अब मुझे अगले दिन की पढ़ाई की तैयारी करनी होती थी। मेरी इस दिनचर्या में मेरी मां हमेशा मेरा साथ देती थीं। सुबह वे मुझसे भी पहले उठ जाती थीं, मेरे नहाने के लिए पानी लाती थीं और मुझे नहाने के लिए कहती थीं। मेरी मां मुझे विदा करती थीं और उत्सुकता से मेरे आने का इंतजार करती थीं। फिर मैं अपने पिताजी के साथ ‘कुरान’ पढ़ने जाता था।
यह पढ़ाई अरबी स्कूल द्वारा कराई जाती थी। मुझे जगह-जगह घूमना पड़ता था, इसलिए मां जल्दी से खाना खाने को देती थीं। मैं जानता था कि कभी-कभी वे मुझे अपना खाने का हिस्सा भी देती थीं, ताकि मुझे पूरा खाना मिल सके। एक बार मैंने इस बारे में पूछा, जिसके जवाब में उन्होंने मुझसे कहा, ‘तुम बढ़ते बच्चे हो, तुम्हें दिन में कई जगह घूमकर कई काम करने होते हैं।’
ऐसा अधिकतर हर मां का सोचना होता है और वे कहती हैं, ‘मेरी चिंता न करो।’ शाम को जब मैं घर आता था तो बुरी तरह से थका होता था और मुझे बहुत भूख लगी होती। वे मेरी भरपूर मदद करती थीं, ताकि मैं अगले दिन के लिए तैयार रहूं।
अपने सभी भाई-बहनों में मुझे ज्यादा तवज्जो दी जाती थी। एक बार, मुझे याद है, मैं मां की गोद में सिर रखकर आराम से सो गया। वे शांत भाव से बैठी रहीं। उनके हाथ धीमे से मेरे बालों को तथा मेरे गालों को सहला रहे थे। उनका वह स्पर्श मेरे लिए अद्वितीय था, जिससे मेरी सारी थकान मिट चुकी थी। मन-ही-मन मेरे अंदर कुछ ऐसे भाव आए, जिससे अचानक ही मैं अंदर-ही-अंदर रोने लगा तथा मेरी आंखें आंसुओं से भर गर्इं।इससे पहले कि मैं उनको अपने काबू में रखता, वे बहने शुरू हो गए। मेरी आंखें बंद थीं, परंतु आंसू निरंतर बह रहे थे। अब मेरे आंसू मेरे मुड़े घुटनों तक पहुंच चुके थे और वे मेरी मां की साड़ी को भी भिगो रहे थे, लेकिन उन्होंने पूर्ववत अपना दुलार देना जारी रखा।
वे जानती थीं कि आंसुओं की यह झड़ी उनके बेटे की थकावट थी, जो चरम सीमा तक आ चुकी थी और वह एक व्यक्ति की सोच में बदल रही थी। उनकी अंगुलियां धीरे-धीरे मेरे बालों को सहलाती रहीं, जिससे मुझे आराम मिल रहा था और मेरे शरीर की थकान दूर हो रही थी तथा वे मुझे समझ पा रही थीं।मेरी मां का जन्म एक दक्षिण भारतीय परिवार में हुआ था। वे एक साधारण महिला थीं, जो अन्य स्त्रियों की तरह अपने घर की जिम्मेदारियां तक ही सीमित थीं। वे घर से बाहर नहीं निकलती थीं तथा शहर की गतिविधियों से प्राय: अनभिज्ञ ही रहती थीं।
आज की नारी की तरह उनका दायरा दफ्तर आदि से नहीं जुड़ा था। उनकी दुनिया अपने घर व परिवार तक ही सीमित थी। घर में वे सभी की जरूरतों को पूरा करती थीं और खुदा से पूरे दिल से जुड़ी रहकर उसकी इबादत में लीन रहती थीं। मैंने अपनी अम्मा के जीवन से यह शिक्षा प्राप्त की थी, ‘यह जरूरी नहीं कि आप कितने बड़े व छोटे कार्य से जुड़े रहते हैं, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि उस कार्य के प्रति आप में कितना समपर्ण भाव है तथा आप में अपनी जिम्मेदारी निभाने की कितनी क्षमता व सामर्थ्य है।’
मेरे पिताजी 102 वर्ष तक जीवित रहे। अपनी मौत के बाद वे अपने पीछे एक बड़ा परिवार छोड़कर गए थे। उनकी मौत से मैं बहुत व्यथित हुआ था।
मैं थुंबा से अपने घर को लौटा था, जहां मैं अपनी मां के निकट काफी देर तक बैठा रहा। जब मैं वहां से जाने लगा, मेरी मां ने भारी आवाज में मुझे आशीर्वाद दिया। मैं उस समय एसएलवी-3 रॉकेट बनाने से जुड़ा हुआ था और वहां मुझे अपने काम पर दोबारा से लौटना था। मेरी मां ने एक बार भी मुझे रुकने को नहीं कहा। अब मैं सोचता हूं कि क्या मुझे अपनी मां के पास नहीं रुकना चाहिए था? क्या मुझे अपने कार्य को इतना महत्व देना चाहिए था? क्या अपनी मां को कुछ और समय नहीं देना चाहिए था? क्योंकि उसके बाद मैं उनसे कभी नहीं मिल सका।
मैं अपने आपसे कई बार यह पूछता हूं, पर मुझे इसका कोई जवाब नहीं मिलता। मेरी मां भी मेरे पिता के देहांत के बाद जल्दी ही चल बसी थीं। वह मेरे पिता के साथ पूरी तरह से जुड़ी हुई थीं तथा 80 वर्षों तक उन्होंने उनका साथ दिया था। अब वे उनकी जुदाई बर्दाश्त नहीं कर सकती थीं।मां की मौत की खबर सुनकर मैं उनकी यादों में डूब गया था। मैं तुरंत ही रामेश्वरम पहुंचा। दो व्यक्तित्व, जिन्होंने मेरी परवरिश ही नहीं की थी बल्कि मेरे व्यक्तित्व व मेरे जीवन को नया मोड़ भी दिया था और मुझे नई सोच प्रदान की थी, वे दोनों ही इस संसार में नहीं थे। अब मुझे अपनी बाकी की जिंदगी उनके बिना ही गुजारनी थी।
मैं अपनी बाकी की जिंदगी उनकी देख-रेख के बिना ही गुजारूंगा। मैं जानता था कि एक के बिना दूसरा ज्यादा देर नहीं जी सकता था। इसी सोच ने मुझे कुछ शांति व सांत्वना दी थी। मैं उसी मस्जिद में गया, जहां मेरे पिताजी मुझे अपने साथ लेकर जाते थे।
इस मस्जिद की अजान हम सबको इकट्ठा करती थी। हमारे माता-पिता हम सबको इस दुआ में लेकर जाते थे। बचपन की यादें अभी भी ताजा हैं- हम सबकी मीठी यादें, हमारी भावनाएं, जो पूरे परिवार से जुड़ी थीं। वह मां, जो अपने बेटे की भावनाओं को समझ सकती थीं तथा उन भावनाओं की कद्र करती थीं, वे यादें आज भी मेरे दिलो-दिमाग में बसी हुई हैं।
(प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक से साभार)
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