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लाभ पद मामला: आम आदमी पार्टी के 20 विधायक आयोग, राजनीति में नैतिकता की बहस शुरू

अलग तरह की राजनीति करने का दंभ भरने वाली आम आदमी पार्टी के 20 विधायक चुनाव आयोग द्वारा अयोग्य ठहराए जाने के बाद एक बार फिर से राजनीति में नैतिकता की बहस शुरू हो गई है।

लाभ पद मामला: आम आदमी पार्टी के 20 विधायक आयोग, राजनीति में नैतिकता की बहस शुरू

अलग तरह की राजनीति करने का दंभ भरने वाली आम आदमी पार्टी के 20 विधायक चुनाव आयोग द्वारा अयोग्य ठहराए जाने के बाद एक बार फिर से राजनीति में नैतिकता की बहस शुरू हो गई है। आज आम आदमी पार्टी उसी कतार में खड़ी दिख रही है, जिसके लिए वह दूसरी राजनीतिक पार्टियों को कोसा करती थी। राजनीति में शुचिता और नैतिकता की बात करने वाली पार्टी आप हर उस धतकरम में शामिल दिख रही है, जिसके लिए दूसरी बड़ी पार्टियां बदनाम रही हैं।

आज आप के 20 विधायक अयोग्य घोषित हो गए हैं, उनके 12 विधायकों पर अपराधिक मामले हैं, उनके मंत्री पर अनेक आरोप हैं, सरकार में आने के बाद आप नेताओं को जेल जाना पड़ा है। अण्णा आंदोलन के बाद जब आम आदमी पार्टी का गठन हुआ था, तब कहा गया था कि वह राजनीति में गंदगियों की सफाई करने के लिए आई है। इसलिए सिंबॉल भी उसने झाड़ू चुना था।

लेकिन आप जब से सत्ता में आई है, ठीक उसी तरह राजनीतिक बर्ताव कर रही है, जैसी दूसरी पार्टियां करती रही हैं। भाजपा-कांग्रेस समेत लगभग सभी पार्टियां सरकार में रहने पर विधायकों को संसदीय सचिव बनाती रही हैं, लेकिन दिल्ली में आप ने सभी को पीछे छोड़ते हुए एक ही बार में अपने 21 विधायकों को वर्ष 2015 के मार्च में संसदीय सचिव बना दिया था। जब भाजपा व कांग्रेस ने विरोध किया और कानूनी पेंच फंसा तब उसी वर्ष आप सरकार ने कानून में संशोधन कर विधेयक जून में विधानसभा से पास करवाया।

दिल्ली सरकार ने दिल्ली असेंबली रिमूवल ऑफ डिस्क्वॉलिफिकेशन एक्ट-1997 में संशोधन किया था। इस विधेयक का मकसद संसदीय सचिव के पद को लाभ के पद से छूट दिलाना था, जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने नामंजूर कर दिया था। यानी आप सरकार ने पहले संसदीय सचिव बनाया फिर कानून में संशोधन पास किया। प्रशांत पटेल नामक शख्स ने राष्ट्रपति के पास याचिका लगाकर आरोप लगाया था कि ये 21 विधायक लाभ के पद पर हैं, इसलिए इनकी सदस्यता रद होनी चाहिए।

राष्ट्रपति की ओर से इस मामले में चुनाव आयोग को जांच कर रिपोर्ट देने को कहा था। अब चुनाव आयोग ने 21 में से 20 विधायकों को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का लाभार्थी मानते हुए अयोग्य करार देते हुए इनकी सदस्यता रद करने की अनुशंसा की है। एक विधायक जरनैल सिंह पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं। अंतिम फैसला राष्ट्रपति को करना है। ऑफिस ऑफ प्रॉफिट यानी लाभ का पद के बारे में संविधान में स्पष्ट व्याख्या है।

संविधान के अनुच्छेद 102 (1) ए के तहत सांसद या विधायक ऐसे किसी अन्य पद पर नहीं हो सकते जहां वेतन, भत्ते या अन्य दूसरी तरह के फायदे मिलते हों। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 191 (1) (ए) और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 9 (ए) के तहत भी सांसदों और विधायकों को अन्य पद लेने से रोकने का प्रावधान है। ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के इस नियम के तहत ही 2006 में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और सपा नेता जया बच्चन को इस्तीफा देना पड़ा था।

सांसद होने के साथ सोनिया को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का चेयरमैन बनाए जाने से लाभ के पद का मामला बन गया था। तब सोनिया ने लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर रायबरेली से दोबारा चुनाव लड़ा था। इसी तरह जया बच्चन पर भी आरोप लगा कि वह राज्यसभा सांसद होने के साथ-साथ यूपी फिल्म विकास निगम की चेयरमैन भी हैं। इसे लाभ का पद माना गया और चुनाव आयोग्य ने जया बच्चन को अयोग्य ठहरा दिया।

जया बच्चन ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। यहां भी उन्हें राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अगर किसी सांसद या विधायक ने लाभ का पद लिया है तो उसकी सदस्यता जाएगी चाहे उसने वेतन या दूसरे भत्ते लिए हों या नहीं। इस हिसाब से अगर राष्ट्रपति आप विधायकों को अयोग्य ठहरा देते हैं, तो अदालत से राहत मिलने की उम्मीद कम है।

अच्छा है कि चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनाव के बाद आप के 20 विधायकों को अयोग्य ठहराया है, वरना अगर पहले ठहराता, तो आप केंद्र सरकार व भाजपा पर यही आरोप लगा रही होती कि एक राज्यसभा सीट को रोकने के लिए उसने चुनाव आयोग का इस्तेमाल किया।

यह सही है कि 20 विधायकों के अयोग्य हो जाने से दिल्ली की आप सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। 70 सीटों वाली दिल्ली विस में आप का बहुमत बरकरार रहेगा। लेकिन आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल को जनता को जवाब देना ही होगा कि कथनी और करनी में इतना फर्क क्यों है? इसके बाद कम से कम अब केजरीवाल राजनीतिक नैतिकता की दुहाई नहीं दे सकेंगे।

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