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अब जनता जनार्दन के दरवाजे पर दस्तक देने में ही भलाई

दिल्ली विधानसभा की 20 सीटों पर उप चुनाव होना अब लगभग तय है। चुनाव आयोग द्वारा आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों को अयोग्य करार दिये जाने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी गई है।

अब जनता जनार्दन के दरवाजे पर दस्तक देने में ही भलाई

दिल्ली में एक बार फिर चुनावी चौसर बिछ गई है। विधानसभा की 20 सीटों पर उप चुनाव होना अब लगभग तय है। चुनाव आयोग द्वारा आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों को अयोग्य करार दिये जाने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी गई है। अब करीब करीब तय मानिये कि चुनाव आयोग की सिफारिश पर राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति प्रदान कर देंगे।

इस सूरत में 2019 में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव और 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले पूरे देश की निगाह एक बार फिर से दिल्ली पर होंगी। अगर कोर्ट से आम आदमी पार्टी को राहत नहीं मिली तो अगले चार-पांच महीने में इन 20 सीटों पर उपचुनाव का बिगुल बज जायेगा। संसदीय सचिव के पद पर इन विधायकों की नियुक्ति लाभ के पद के दायरे में थी या नहीं इस पर अब कोर्ट के भीतर और बाहर बहस होगी ही पर चुनाव हुए तो जनता-जनार्दन का वोट पाना ही राजनैतिक दलों के लिये एकमात्र कसौटी होगा।

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भाजपा और कांग्रेस से ज्यादा ये अरविंद केजरीवाल के लिये परीक्षा की घड़ी है। दिल्ली सरकार की तमाम योजनाओं के साथ वे लगातार ये दावा करते रहे हैं कि आम लोगों के लिये उनकी सरकार ऐतिहासिक कार्य कर रही है। दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य का विषय हो या फिर बिजली-पानी से जुड़े फैसले, उनका ये कहना रहा है कि हमारी सरकार वास्तव में आम आदमी की सरकार है। जबकि दूसरी तरफ भाजपा और कांग्रेस आज भी अनेक ऐसे चुनावी वादे केजरीवाल को जबतब याद दिलाते रहते हैं जो तीन साल बीत जाने के बाद भी पूरे नहीं हुए हैं।

केजरीवाल बहुत से कार्याें के अधूरे रहने का ठीकरा वाया उपराज्यपाल भाजपा और मोदी सरकार के सिर फोड़ते रहते हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर भी केजरीवाल सरकार के मंत्रियों को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है। हाल ही में राज्यसभा चुनाव को लेकर आप के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आये। आप के कई विधायक मुख्यमंत्री की कार्यशैली से नाराज चल रहे हैं। तमाम मसले हैं जो दिल्ली की राजनीति को गर्म किये रहते हैं। केजरीवाल की धवल छवि को लेकर अब विरोधी पार्टी के साथ-साथ उनके कट्टर समर्थक ही शंका जताने लगे हैं। जाहिर है ऐसी स्थिति में उपचुनाव में कौन कितने पानी में रहेगा कहना आसान नहीं होगा।

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2015 के विधानसभा चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से 70 सीटों में 67 सीटों पर जीत हासिल कर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली पर कब्जा किया था। उनकी यह जीत इस मायने में भी महत्त्वपूर्ण थी कि 2014 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सभी 7 सीटों पर भाजपा का कमल खिला था। कुछ महीने के अंतराल के बाद आम आदमी पार्टी ने भाजपा को जबरदस्त पटकनी दी थी। ताे क्या केजरीवाल फिर से विधानसभा की 20 सीटों पर अवश्यभावी उपचुनाव में अपनी पार्टी को जीत दिला पायेंगे ? क्या भाजपा केजरीवाल की पार्टी को पटकनी दे पायेगी ? क्या कांग्रेस 2015 के शून्य को दूसरे अंकों के साथ जीत में बदल पायेगी ? ये सवाल अब राजनीति में रूचि रखने वाले हर शख्स की जुबान पर होंगे।

चुनावी जीत-हार को लेकर कयासों का दौर जब शुरू होता है तो अतीत के सहारे आंकलन लगाया जाता है। दिल्ली का मूड काफी कुछ चौंकाने वाला रहता है। 2017 में जब नगर निगम चुनाव हुए तो राजनैतिक विश्लेष्कों को भाजपा की एकतरफा जीत की उम्मीद नहीं थी। आम आदमी पार्टी तीनों नगर निगम में महज कुछ सीटों पर सिमटी जायेगी, ऐसा केजरीवाल के धुर विरोधी भी सहज रूप से मानने को तैयार नहीं थे। लेकिन जब नतीजे आये तो भाजपा तीनों निगमों में अपना कब्जा शानदार ढंग से बरकरार रखने में सफल रही।

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2017 में ही नगर निगम चुनाव की जीत के बाद जब भाजपा बवाना विधानसभा सीट पर उपचुनाव में उतरी तो केजरीवाल खुद अपनी पार्टी की जीत को लेकर आश्वस्त नहीं थे। लेकिन भाजपा द्वारा आप के पूर्व विधायक को टिकट दिये जाने की गलती केजरीवाल के लिये जीत का तोहफा साबित हुई। कहने का तात्पर्य यह है कि सरकार के कामकाज के अलावा उम्मीदवारों और मुद्दों का सही चयन भी गेम चेंजर साबित होगा।

जब केजरीवाल सत्ता में आये तो वे शीला दीक्षित सरकार के खिलाफ बने जनमत के कांधे पर बैठे हुए थे। अब तीन साल से वे सरकार चला रहे हैं तो जवाबदेही के कठघरे में वे खुद खड़े हैं। अगर उपचुनाव में वे भाजपा और कांग्रेस को रोक पाने में कामयाब रहे तो 2019 और 2020 में उनकी पार्टी दिल्ली में आत्मविश्वास से लबरेज होगी। लेकिन वे 20 सीटों की लड़ाई में सीटें गंवा बैठे तो भविष्य की राह मुश्किल रहेगी ये तय मानिये।

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