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आप भी दूसरे राजनीतिक दलों जैसे ही निकले

आम आदमी पार्टी की सरकार दूसरी सरकारों से भी कमतर मालूम पड़ रही है।

आप भी दूसरे राजनीतिक दलों जैसे ही निकले
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करीब दस महीने पहले दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी यानी आप को उसके देश में नई राजनीति स्थापित करने के दावे पर भरोसा कर विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक बहुमत दिया था, लेकिन अब कहा जाने लगा है कि आम आदमी पार्टी और दूसरी परंपरागत पार्टियों में कोई अंतर नहीं है।
सत्ता में आने से पूर्व आम आदमी पार्टी की ओर से बड़े-बड़े वादे जरूर किए गए थे, लेकिन अब यह भी उसी ढर्रे पर राजकाज चलाती दिख रही है, जैसे कि किसी सामान्य राजनीतिक दल से उम्मीद होती है। हालांकि अनुभवहीन होने के कारण कई मामलों में तो आम आदमी पार्टी की सरकार दूसरी सरकारों से भी कमतर मालूम पड़ रही है। सत्ता में आने के बाद से ही मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल केंद्र के साथ टकराव के रास्ते पर चल रहे हैं।
जबकि चुनाव के दौरान प्रदेश की जनता को उम्मीद थी कि सत्ता में आने के बाद उनकी सरकार केंद्र सरकार से सहयोग स्थापित करते हुए न सिर्फ विकास की ऊंचाइयों को प्राप्त करेगी, बल्कि देश में नई राजनीतिक परंपरा भी कायम करेगी। आरंभ में बिजली-पानी को सब्सिडी के जरिए सस्ता करने के लोकप्रिय फैसले से लगा था कि अरविंद केजरीवाल एक-एक कर सभी वादों पर बल देंगे, लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा है लोगों में निराशा छा रही है।
उन्होंने वादा किया था कि वे और उनके विधायक सादगी बरतेंगे। सरकारी तामझाम लेने से बचेंगे। वीआईपी कल्चर खत्म करेंगे। पार्टी के अंदर भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेंगे। हर फैसले से पूर्व जनता से पूछेंगे इसके लिए सर्वे कराएंगे, लेकिन अब वे धीरे-धीरे इन सबसे किनारा करते दिख रहे हैं। उनकी सरकार ने दिल्ली के विधायकों की सैलरी बढ़ाने का फैसला किया है। माना जा रहा है कि अब उनको देश के किसी भी विधायक से अधिक वेतन मिलेगा।
सवाल यह नहीं है कि विधायकों का वेतन बढ़ाया जाना जरूरी है या नहीं, बल्कि प्रश्न यह पूछा जा रहा है कि आप के सरकारी सेवाओं का कम से कम उपयोग करने के वादे का क्या हुआ? पार्टी के करीब डेढ़ दर्जन विधायकों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं जिनमें से कुछ जेल की यात्रा तक कर आए हैं, लेकिन अरविंद केजरीवाल उन पर लगे आरोपों पर चुप हैं।
यहां तक कि जिस लालू यादव को भ्रष्ट सांसदों की र्शेणी में रख चुके हैं, उनसे अब मंच साझा करने व गले मिलने से परहेज नहीं है। ऐसे में लोग उनकी नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। जनता से पूछकर हर फैसला करने के वादे से सरकार पहले ही पलटी मार चुकी है। अरविंद केजरीवाल और उनके कुछ विश्वासपात्र लोग सारे फैसले लेते हुए देखे जा सकते हैं। इससे पार्टीमें आंतरिक लोकतंत्र की भावना कमजोर हुई है।
पार्टी के संस्थापकों में शामिल रहे योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को सिर्फ इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि उन्होंने अरविंद केजरीवाल के कुछ फैसलों पर सवाल उठाए थे। जाहिर है, भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा आंदोलन की कोख से निकली आप अब अपने उसूलों से दूर जाती हुई नजर आ रही है। ऐसा कर वह न सिर्फ ऐतिहासिक जनादेश के संदेश को नजरअंदाज कर रही है, बल्कि आगे से देश में किसी बड़े आंदोलन की राह भी मुश्किल कर रही है।
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