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‘आप’ को सीख लेने की जरूरत, आंतरिक कलह से करोड़ों सर्मथकों को पीड़ा

आम आदमी पार्टी (आप) की आंतरिक कलह से उसके करोड़ों सर्मथकों को पीड़ा पहुंची है और हजारों कार्यकर्ता निराश हैं।

‘आप’ को सीख लेने की जरूरत, आंतरिक कलह से करोड़ों सर्मथकों को पीड़ा
आम आदमी पार्टी (आप) की आंतरिक कलह से उसके करोड़ों सर्मथकों को पीड़ा पहुंची है और हजारों कार्यकर्ता निराश हैं। हाल ही में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी को भारी बहुमत मिला था। उसने ने सत्तर में से 67 सीट जीती। इस चुनाव में केजरीवाल पार्टी का चेहरा थे, लेकिन विजय का र्शेय अकेले उन्हें नहीं जाता। इस जीत का आधार सैकड़ों कार्यकर्ताओं की दिन-रात की कड़ी मेहनत और जनता की वैकल्पिक राजनीति की प्रबल इच्छा है। केजरीवाल सर्मथक धड़े ने अपने व्यवहार से इस आधार को आहत किया है। ईमानदार राजनीति का दावा करने वाली जमात पर आंख मूंदकर विश्वास करने वाले लोग क्षुब्ध हैं।
आप का जन्म अण्णा आन्दोलन की कोख से हुआ था। जब जन लोकपाल के गठन को लेकर चल रहा आन्दोलन अपने चरम पर था तब स्थापित राजनीतिक दलों ने अण्णा सर्मथकों को पार्टी बनाने की चुनौती दी थी। अण्णा ने राजनीति में न आने की भीष्म प्रतिज्ञा के चलते चुनौती नकार दी। अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव आदि उनके सर्मथकों ने इसे स्वीकार किया। मिलकर आम आदमी पार्टी का गठन किया। देश भर के सैकड़ों आदर्शवादी युवा पार्टी से जुड़ गए। दिसम्बर 2013 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी ने धमाकेदार जीत दर्ज की। 49 दिन की सरकार भी बनाई। इसके बाद गत माह हुए चुनाव में पार्टी भारी बहुमत पाकर फिर सत्ता में आई है।
केजरीवाल फिर मुख्यमंत्री बन गए लेकिन जीत का जश्न ठंडा पड़ने से पहले ही दरार दिख रही हैं। दिल्ली की ऐतिहासिक जीत के बाद पार्टी के आला नेता आपस में उलझे हुए हैं। इसका कारण है वैचारिक स्पष्टता का अभाव और घोषित सिद्धांतों से समझौता है। कहने को पार्टी संविधान में एक व्यक्ति एक पद, पूर्ण पारदर्शिता और सामूहिक नेतृत्व की बात की गई है लेकिन कुछ लोग अब इन सिद्धांतों से समझौता करना चाहते हैं। आरोप तो यह भी है कि दिल्ली चुनाव में प्रत्याशियों के चयन और चंदे को लेकर सैद्धांतिक समझौता किया गया है। प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव ने पार्टी में ये मुद्दे उठाए तो उन्हें राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से बाहर कर दिया। अरविन्द केजरीवाल पार्टी के संयोजक हैं। दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद कायदे से उन्हें पद छोड़ देना चाहिए था, लेकिन उनके नजदीकी नेता इस बात पर राजी नहीं हैं। प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव आप के संस्थापक सदस्य हैं।
उनकी ईमानदारी, बुद्धिमता और राजनीतिक समझ का लोहा पार्टी के मामूली कार्यकर्ता भी मानते हैं। इतिहास गवाह है कि बिना वैचारिक प्रतिबद्धता के किसी पार्टी का लम्बे समय तक जिन्दा रहना कठिन होता है। योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण इस बात को बखूबी समझते हैं इसीलिए वे पार्टी को एक वैचारिक जामा पहनाने के प्रयास में हैं। लेकिन केजरीवाल और उनके सर्मथक न तो पार्टी को सैद्धांतिक सान पर कसना चाहते हैं और न ही दिल्ली से बाहर पैर फैलाने में फिलहाल उनकी रुचि है। ऐसे में पार्टी का एक व्यक्ति (केजरीवाल) के इर्द-गिर्द सिमटकर रह जाने का खतरा है।
केजरीवाल और उनकी गणेश परिक्रमा करने वाले नेता दिल्ली की सफलता से मानो बौखला गए हैं। तभी उन्होंने प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को किनारे करने का आत्मघाती निर्णय लिया हैं। इस फैसले के खिलाफ पार्टी की कई इकाइयों में विद्रोह की आग सुलग रही है। इसे रोकने के लिए साफ वैचारिक समझ, खुला संवाद तथा आतंरिक लोकतंत्र जरुरी है। आशा है अरविंद केजरीवाल इस बात को समझते होंगे?
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