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आधार से निजता का हनन

आधार कार्ड बनाने की प्रक्रिया में अपनाई जाने वाली वैज्ञानिक तकनीक से देश की ज्यादातर आबादी बिल्कुल बेखबर है

आधार से निजता का हनन

टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की निजी जानकारी आधार कार्ड बनाने वाली एजेंसी ने सोशल नेटवर्किंग साइट पर लीक कर दी। जानकारी लीक होने पर क्रिकेटर की पत्नी साक्षी धोनी ने ट्वीट करके केंद्रीय आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद और सीएससी से इसकी शिकायत की कि क्या किसी तरह की प्राइवेसी बची है।

आधार कार्ड से जुड़ी जानकारी यहां तक कि आवेदन फार्म तक को सार्वजनिक कर दिया गया। इसके बाद कार्रवाई करते हुए जानकारी लीक करने वाली एजेंसी को 10 साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। अब सवाल यह नहीं है कि इस मामले में कार्रवाई हुई या नहीं बल्कि मुख्य सवाल यह है कि आधार कार्ड की वजह से देश के करोड़ों लोगों की निजता खतरे में है।

आधार कार्ड का पूरा डाटाबेस कभी भी कोई भी अपने फायदे के लिए प्रयोग कर सकता है या उसकी जानकारी किसी भी प्लेटफार्म पर लीक कर सकता है। क्या आधार कार्ड से लोगों की निजता का उल्लंघन होगा यह सवाल बार-बार किया जा रहा है। एक ओर जहां आधार कार्ड जटिल कानूनों में उलझा हुआ है, वहीं निगरानी और निजता को लेकर इस पर विवाद शुरू हो गया है।

यह सच है कि आधार कार्ड बनाने की प्रक्रिया में अपनाई जाने वाली वैज्ञानिक तकनीक से देश की ज्यादातर आबादी बिल्कुल बेखबर है, लेकिन निजता पर हमले की आशंका के जवाब में सरकार का सुप्रीम कोर्ट में कोई ठोस तर्क न दे पाना इशारा करता है कि यह मामला जल्द सुलझने वाला नहीं है।

आधार कार्ड वह प्रामाणिक आधार बन सकता है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में दोहरा और फर्जी लाभ लेने वालों पर अंकुश लगे और सरकारी खजाने पर सेंधमारी भी रुके, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि यह निजता पर खतरा कैसे नहीं है, सरकार इसे स्पष्ट करे।

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में सरकार के उस विचार को खारिज कर दिया है जिसके तहत आधार कार्ड को सभी सरकारी योजनाओं के लिए अनिवार्य बनाया जाना था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने एलपीजी एवं पीडीएस योजना में आधार कार्ड के इस्तेमाल को अपनी अनुमति प्रदान कर दी है।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अब तक 90 करोड़ से ज्यादा भारतीयों का आधार कार्ड बन चुका है। आधार परियोजना का सवाल इतना जरूरी क्यों है। ये समझने के लिए हमें पहले ये जानना होगा कि आधार परियोजना और निजता के अधिकार का आपस में क्या संबंध है।

इस परियोजना के तहत अलग-अलग निजी और सरकारी डेटाबेस; रेलवे यात्रा, वोटर आईडीकार्ड, पैन कार्ड, बैंक अकाउंट, मोबाइल नंबर और पीडीएस आदि में हर व्यक्ति का आधार नंबर जोड़ने का प्रस्ताव है। जब ये काम पूरा हो जाएगा, तो किसी व्यक्ति का प्रोफ़ाइल तैयार करना काफ़ी आसान हो जाएगा। उस व्यक्ति ने कब और कैसे यात्रा की, किसे फ़ोन किया, किसके साथ पैसे की लेन-देन किया।

ये जानकारियां पाना किसी के लिए बहुत आसान हो जाएगा। यानी आधार परियोजना आम लोगों की निगरानी करने का सबसे बड़ा तरीका बन सकती है। निगरानी और निजता का मुद्दा आपस में जुड़ा हुआ है। चिंताजनक बात ये है कि भारत में निजता संबंधी कोई क़ानून नहीं है।

यानी आधार परियोजना एक तरह के क़ानूनी निर्वात या वैक्युम में काम कर रही है। आधार का इस्तेमाल किस लिए हो सकता है। इससे जुड़ी जानकारी कौन और किन परिस्थितियों में मांग सकता है। इन सवालों को लेकर नियम या दिशा-निर्देश नहीं हैं।

कई लोगों को लगता है कि निजता का सवाल केवल अमीर और प्रभावशाली लोगों के लिए चिंता का विषय है, लेकिन ये सही नहीं है। हम सबकी निजता की सीमाएं होती हैं और हम नहीं चाहते कि दूसरे उसका उल्लंघन करें। गरीब लोग केवल सिर पर छत के लिए घर नहीं बनाते, बल्कि उन्हें निजता भी चाहिए होती है। वो अपने बैंक अकाउंट की जानकारी गोपनीय रखना चाहते हैं।

हम सब अपने ईमेल और बैंक अकाउंट को पासवर्ड से सुरक्षित रखते हैं। अपनी निजता को बचाने के लिए हम ऐसे कई दूसरे उपाय करते हैं। सरकार पहले भी आधार कार्ड के मामले पर घिरी हुई है। सरकार की तरफ से लगभग हर चीज के लिए आधार कार्ड जरूरी किया जा रहा है।

पिछले दिनों ही ये मुद्दा राज्य सभा में भी उठाया गया था। जहां कम्युनिस्ट नेता सीताराम येचुरी ने सरकार पर आरोप लगाया था कि वह आधार के जरिए लोगों पर नजर रखना चाहती है। येचुरी ने यह भी कहा था कि अगर सरकार उसको जरूरी करना ही चाहती है तो एक बिल लेकर आए।

आधार स्कीम के खिलाफ लाखों शिकायतें हैं। उन्होंने यह भी पूछा कि आधार का डाटा कैसे सुरक्षित रखा जाता है जिससे कोई प्राइवेट कंपनी उसका गलत इस्तेमाल नहीं कर सके। सच्चाई यह है कि 2011 में महज एक आदेश पर शुरू इस योजना के लिए तब न तो कोई विधिक और न ही संवैधानिक प्रावधान किए गए थे।

बाद में जो भी किया गया, एक तरह से आधा-अधूरा था क्योंकि तब भी इसके आंकड़ों के दुरुपयोग को रोकने और निजता के उल्लंघन से निपटने का ध्यान ही नहीं था। सुप्रीम कोर्ट में भी बहस के दौरान सरकार का तर्क यही था कि निजता मूल अधिकार नहीं है।

संवैधानिक रूप से यह सच भी हो लेकिन क्या सूचना क्रांति के इस युग में आने वाले खतरों का विषय नहीं। यह कहना भी ठीक नहीं कि भारत में लोगों के पास कोई पहचान-पत्र नहीं है। बहुतों के पास एक से ज्यादा हैं। 1985 में देश के 10 राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में पब्लिक इवेल्यूएशन ऑफ एन्टाइटलमेंट प्रोग्राम के सर्वे से पता चला था कि 85.6 प्रतिशत लोगों के पास तब भी मतदाता पहचान-पत्र, राशन कार्ड या राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना कार्ड था।

इसमें एक मजेदार तथ्य आया, लगभग 76 प्रतिशत लोगों के पास तीनों पहचान-पत्र थे। मतलब पहचान-पत्र के बावजूद लोग सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाते हैं। इसका यह मतलब भी नहीं कि जिन गरीबों के पास आधार कार्ड है, सभी को अनिवार्य रूप से सब्सिडी वाला राशन और सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिल रही हो। वहीं ऐसे लोगों की भी खासी संख्या है जो बिना आधार ही सरकारी योजनाओं का फायदा ले रहे हैं।

सरकार के दावे के मुताबिक ये आधार कार्ड सुरक्षित हैं और इसकी जानकारी केवल सरकार और आपके पास होती है, लेकिन जिस तरह से इन दिनों आधार कार्ड से संबंधित जानकारी लीक होने के मामले सामने आ रहे हैं वह केंद्र पर सवाल उठा रहे हैं। आधार कार्ड बनाने वाली कई एजेंसियां गैर कानूनी रूप से काम कर रही हैं, इसलिए सरकार ने चेतावनी दी है कि अगर आप रुपये देकर प्लास्टिक कार्ड बनवा रहे हैं तो सावधान हो जाएं।

कुल मिलाकर आधार कार्ड व्यक्तिगत विशिष्ट पहचान का वैज्ञानिक तरीका हो सकता है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट प्रावधान हों, सर्वसम्मत सहमति बने और कई पहचान पत्रों से मुक्ति मिले, लेकिन यदि निजी क्रिया-कलापों का प्रोफाइल बनाकर सार्वजनिक मंच से जोड़ा जाएगा तो निजता पर हमले की बात तो लगती है।

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