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एडवोकेट रघुबीर सिंह दहिया का लेख: एक क्रांतिकारी जिसने फांसी पर चढने से पहले तक किया था व्यायाम

राजेंद्र नाथ लाहडी का जन्म 29 जून 1901 को बंगाल के पबना जिले के गांव मोहनपुर में हुआ था। अब ये बांग्लादेश में है। उनके पिता का नाम क्षितिमोहन लाहिडी और मां का नाम बसंत कुमारी था। उनके पिता ने बंग-भंग आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया था और अनुशीलन दल के क्रांतिकारियों को खुले दिल से धन देते थे।

एडवोकेट रघुबीर सिंह दहिया का लेख: एक क्रांतिकारी जिसने फांसी पर चढने से पहले तक किया था व्यायाम
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देश की गुलामी की पीडा का दर्द एक सरफरोश समझौताहीन क्रांतिकारी को इतना साहसी बना सकता है कि जेल में फांसी का रस्सा जिसकी गर्दन का बेसब्री से इंतजार कर रहा था और वह दासता की बेडियों को तोड़ने के लिए पुर्नजन्म की आशा से काल की कोठरी में पसीना बहाते हुए व्यायाम कर रहा था। ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने आम जनता में दहशत का भय पैदा करने के लिए किसी को फांसी पर चढा दिया तो किसी को गोलियों से भून दिया। मोतीलाल को तो आरे से ही चीर दिया तो किसी को शिकंजे में कसकर मार दिया गया। किसी को तोप का गोला नसीब हुआ तो किसी को मरने के लिए लंबी-लंबी यातनाएं दी गई और काले पानी तक भेज दिया। कोई माफी मांगकर वापस आ पाया तो किसी से जुल्म सहकर शहादत को मंजूर किया।

स्वतंत्रता के लिए शोषण और दमन का विरोध करने वालों का इतिहास लिखा गया और जुल्म करने वाली ताकत वक्त के अंधकार में डूबकर समाप्त हो गई। ऐतिहासिक जन्मदिन के अवसर पर महान क्रांतिकारी शहीद राजेंद्र नाथ लाहडी को देश की प्रबुद्ध जनता पूरे आदर और सम्मान के साथ उनके योगदान की पूरी सराहना करती है।

राजेंद्र नाथ लाहडी का जन्म 29 जून 1901 को बंगाल के पबना जिले के गांव मोहनपुर में हुआ था। अब ये बांग्लादेश में है। उनके पिता का नाम क्षितिमोहन लाहिडी और मां का नाम बसंत कुमारी था। उनके पिता ने बंग-भंग आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया था और अनुशीलन दल के क्रांतिकारियों को खुले दिल से धन देते थे। राजेंद्रनाथ के जन्म के समय तो वे जेल में बंद थे। प्रारंभिक तीन वर्ष की शिक्षा राजेंद्रनाथ ने गांव के स्कूल से प्राप्त की और उसके बाद पिता ने बडे बेटे साथ उसे पढाई के लिए बनारस भेज दिया। उस समय उनकी आयु 9 वर्ष थी। यहीं पर उनका सारा अध्ययन सुचारू रूप से चलता रहा। 1922 में राजेंद्रनाथ लाहिडी का संपर्क शचीन्द्रनाथ सान्याल से बनारस में हुआ और पूरी उत्सुकता से क्रांतिकारी साहित्य पढना शुरू किया।

अनुशीलन दल हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन-एचआरए में मिल गया। राजेंद्रनाथ एचआरए के जिला संगठक, बनारस और स्टेट कमेटी के सदस्य चुने गए। संगठन के काम को आगे बढाने के लिए खूब अध्ययन कर दिन रात अनथक होकर काम किया। शिक्षा के प्रचार प्रसार का महत्व समझ अपनी मां बसंत कुमारी की याद में एक पुस्तकालय खोल दिया और वहां बच्चों व नवयुवकों को आने के लिए प्रेरित किया ताकि वे अपने विवेक से भौतिक परिस्थितियों को समझ सकें। अनेक पत्र पत्रिकाओं में उनके मूल्यवान लेख भी छपे। वे बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में एमए इतिहास विषय के होनहार विद्यार्थी थे। उनका सरल और मिलनसार स्वभाव साहस से लबालब भरा था। शोषकों के प्रति उनके कोमल दिल में बहुत नफरत थी।

रामप्रसाद बिस्मिल की पहल पर शाहजहांपुर में क्रांतिकारियों की जो बैठक 7 अगस्त 1925 को हुई उसमें राजेंद्रनाथ लाहिडी भी शामिल थे। लंबी बहस के बाद सर्वसम्मति से 9 अगस्त 1925 को सहारनपुर से लखनऊ जाने वाली रेलगाडी से सरकारी खजाना लूट लेने का प्रस्ताव पास किया गया था। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्रनाथ लाहडी, चंद्रशेखर आजाद, शचींद्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्ता, मुकुंदलाल, केशवचंद्र ,मुरारी लाल और बनवारी लाल सबसे योजना के अनुसार काम किया। गाडी को निश्चित स्थान पर जंजीर खींचकर रोकने की जिम्मेदारी राजेंद्रनाथ लाहिडी ने पूरी की और सरकारी खजाने के 8600 रुपये काकोरी रेलवे स्टेशन के पास लूट लिए। काकोरी के पास ट्रेन लूट जाने की घटना का पता लगाने के लिए पुलिस ने मुखबिरों का जाल चप्पे-चप्पे पर फैला दिया। गिरफ्तार होते ही बनवारी लाल के बयान देने से पुलिस का मुकदमा मजबूत हो गया और उसने काकोरी डकैती में अपना सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया।

26 सितंबर 1925 को राजेंद्रनाथ लाहिडी को गिरफ्तार करने के लिए उकने बनारस ठिकाने पर पुलिस ने अचानक छापा मारा लेकिन वे पहले ही कलकत्ता जा चुके थे। कलकत्ता दक्षिणेश्वर में बम बनाने की कला में दक्ष हो गए लेकिन पुलिस को सुराग मिल जाने से 10 नवंबर 1925 को बम बनाने के स्थान से राजेंद्र नाथ को अन्य साथियों के साथ पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उस मकान से पुलिस ने बम बनाने का सामान, एक बम, सात रिवाल्वर व क्रांतिकारी साहित्य भी बरामद किया। राजेंद्र नाथ लाहिडी को इस केस में दस वर्ष की सजा मिली। कलकता जेल में वे पुस्तकें पढते और नियमित व्यायाम करते। बाद में पुलिस को पता चला कि राजेंद्र नाथ लाहिडी तो काकोरी कांड डकैती में भी शामिल थे तो फिर उनके पांवों में बेडियां, हाथों में हथकडी और गले में लोहे का छल्ला डालकर कलकता से लखनऊ लाया गया। लखनऊ में कोर्ट की बजाय जेल के थियेटर को अदालत बनाकर सुनवाई की गई। 18 महीने तक चली केस सुनवाई की नौटंकी के बाद फैसला सुनाया गया।

6 अप्रैल 1927 के दिन जज ने रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र नाथ लाहिडी, अश्फाक उल्ला खां और रोशन सिंह को फांसी की सजा का फैसला सुनाया। बाकी अभियुक्तों को लंबा कारावास दिया गया। क्रांतिकारियों की सजा कम कराने के लिए जनता ने व्यापक स्तर पर प्रयास किया। प्रिवी कौंसिल तक पहुंचे लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला। अंतत: चारों क्रांतिकारियों को 19 दिसंबर 1927 को फांसी देने की तारीख मुकर्रर की गई। रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर, अश्फाक उल्ला खान को फैजाबाद, रोशन सिंह को इलाहाबाद और राजेंद्रनाथ लाहिडी को पहले बाराबंकी जेल में रखा गया और इसके बाद गोंडा जेल में भेजा गया। लखनऊ जेल में राजेंद्रनाथ लाहिडी की बहन दो बार मिलने आई और एक बार बडा भाई उनसे मिला तो राजेंद्रनाथ ने जन्म-मृत्यु का रहस्य बताकर पुर्नजन्म के बारे में बातें की।

अंग्रेज सरकार भयभीत थी कि कहीं जेल पर हमला कर राजेंद्रनाथ लाहडी को छुडाकर ना ले जाया जाए इसलिए राजेंद्र नाथ को गोंडा की जेल में 19 के स्थान पर 17 को ही फांसी पर चढा दिया गया। राजेंद्रनाथ लाहिडी ने फांसी के तख्ते पर चढने से पहले भी व्यायाम किया और कहा कि पुर्नजन्म के बाद पूरी ताकत से गुलामी की जंजीरों को अवश्य ही तोड दूंगा। वंदे मातरम और भारत माता की जयकारे के साथ वह महान विचारक पुर्नजन्म की आस में शोषण से मुक्त आजादी की चाहत में शहीद हो गया। गोंडा की आम जनता की उमडी भीड के साथ बडे भाई और बहन ने शव लेकर पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया।

सरदार भगतसिंह उनकी शहादत से इतने प्रभावित थे कि अपने छोटे भाई जिसका जन्म 1927 में हुआ था, का नाम राजेंद्र सिंह रखा। राजेंद्रनाथ वैचारिक स्तर पर अपने साथियों से काफी आगे थे और समाजवाद और साम्यवाद से गहरे प्रभावित थे। भारत की आजादी के इतिहास में वे सदा आदर और सम्मान के साथ याद किए जाएंगे।

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