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चढ़ता जा रहा है उत्तर प्रदेश में सियासी पारा

राज्य के चुनावी मैदान में चार अहम पार्टियां अपनी-अपनी ताकत झोंकेंगी।

चढ़ता जा रहा है उत्तर प्रदेश में सियासी पारा
उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव करीब आते जा रहे हैं, वहां का सियासी पारा सातवें आसमान पर चढ़ता जा रहा है। 27 साल से सत्ता से बाहर कांग्रेस हर चुनाव से पहले जमीन पर उतरकर मतदाताओं को यह भरोसा दिलाने की चेष्टा करती रही है कि वही उनके हितों की रक्षा कर सकती है। हर बार मतदाता उसे नकार रहे हैं। इस बार भी कांग्रेस अपने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की अगुआई में पसीना बहा रही है। बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती जगह-जगह रैलियां करके समाजवादी पार्टी और केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार पर वार करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहीं। हालांकि सबसे ज्यादा टूट-फूट उन्हीं की पार्टी में देखने को मिल रही है।
उनकी पार्टी के विधायक दल के नेता भाजपा में शामिल हो गए। एक पूर्व मंत्री ने भी इस्तीफा दे दिया। कई विधायक और पूर्व विधायक भाजपा का रुख कर चुके हैं। कांग्रेस में भी विघटन हुआ है। भाजपा काफी समय से सत्ता से बाहर है। लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की अगुआई में पार्टी ने अस्सी में से 73 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जनादेश हासिल किया था। तभी से पार्टी नेतृत्व को लगता है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में उसे सत्ता में वापसी का मौका मिल सकता है। अमित शाह की सरपरस्ती में पार्टी राज्य में हर स्तर पर ताकत झौंके हुए है।
भाजपा के आलोचकों का तो यहां तक कहना है कि बसपा में तोड़फोड़ एक खास रणनीति के तहत कराई जा रही है क्योंकि भाजपा को लगता है कि बसपा कमजोर नहीं हुई तो उसका वापसी का रास्ता कठिन हो सकता है। अब तक होता यही आया है कि सपा से लोगों का मोहभंग होता है तो बसपा को चुन लेते हैं। मायावती से नाराजगी बढ़ती है तो मुलायम की पार्टी को सत्ता सौंप देते हैं। लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता तक नहीं खुल पाया था। इससे उत्साहित भाजपा को यकीन है कि इस बार कायदे से चुनाव लड़ा गया तो उसे जनादेश मिल सकता है। लोकसभा चुनाव में हालांकि सपा को भी बड़ा झटका लगा था।
केवल मुलायम सिंह यादव के परिजन ही चुनाव जीत सके थे। वह भी अपने अभेद्य गढ़ में, परन्तु उसके बाद से लगातार सपा नेतृत्व लोगों का भरोसा जीतने का यत्न कर रहा है। खासकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी निजी छवि को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं। वे ऐसे नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाने में लगे हैं, जिनकी छवि अच्छी नहीं है। या जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। दो दिन पहले ही मुख्यमंत्री ने दो मंत्रियों को अचानक बर्खास्त कर दिया। उन पर खनन में भ्रष्टाचार के आरोप हैं। ये दोनों मुलायम के विश्वास पात्र समझे जाते हैं।
इसके अगले ही दिन मंगलवार को अखिलेश यादव ने मुख्य सचिव दीपक सिंघल को हटाकर पूरी नौकरशाही में खलबली मचा दी है। सिंघल की छवि भी अच्छी नहीं रही है और उन्हें शिवपाल यादव का करीबी माना जाता है। पिछले कुछ महीनों में अखिलेश और चाचा शिवपाल यादव के बीच तनाव लगातार बढ़ता रहा है। शिवपाल के कुछ बड़े फैसलों को बदलवाकर अखिलेश ने साफ कर दिया है कि वे ही मुख्यमंत्री हैं और उनकी अनदेखी करके सपा में कोई भी बड़ा फैसला संभव नहीं है।
हालांकि इस पारिवारिक झगड़े में मुलायम बीच-बचाव करते देखे गए हैं परन्तु घटनाक्रम से साफ होता जा रहा है कि मुख्यमंत्री झुकने को तैयार नहीं हैं। भाजपा को लग रहा है कि मुलायम के कुनबे में छिड़ी यह जंग समाजवादी पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित करेगी। चूंकि बसपा लोकसभा चुनाव में काफी कमजोर हुई है और कांग्रेस की जमीन खिसक चुकी है, इसलिए वह अगर लोगों का भरोसा जीतने में कामयाब रही तो उसके लिए वापसी का मौका है।
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