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प्रो. रणबीर सिंह का लेख : 1989 के लोकसभा चुनाव और हरियाणा की राजनीति

इस चुनाव में फरीदाबाद से चौधरी भजनलाल, महेंद्रगढ से राव विरेंद्र सिंह, करनाल से पंडित चिरंजीलाल शर्मा, भिवानी से चौधरी बंसीलाल और अंबाला आरक्षित से चौधरी रामप्रकाश विजयी रहे। जनता दल ने भी पांच सीटें जीती, जिनमें रोहतक से चौधरी देवीलाल, सोनीपत से कपिल देव, हिसार से जयप्रकाश जेपी और सिरसा आरक्षित से हेतराम ने विजय हासिल की।

हरियाणा की कहानी: प्रोफेसर रणबीर सिंह।
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हरियाणा की कहानी: प्रोफेसर रणबीर सिंह।

प्रो. रणबीर सिंह

1989 के लोकसभा चुनाव ने राष्ट्रीय राजनीति के साथ साथ हरियाणा की राजनीति को भी प्रभावित किया। कांग्रेस और जनता दल दोनों ने पांच-पांच सीटों पर जीत हासिल की। लोकदल और भाजपा की गठबंधन वाली सरकार की कार्यशैली ने कांग्रेस को अपना खोया जनाधार वापस पाने में मदद की। फरीदाबाद से चौधरी भजनलाल, महेंद्रगढ से राव विरेंद्र सिंह, करनाल से पंडित चिरंजीलाल शर्मा, भिवानी से चौधरी बंसीलाल और अंबाला आरक्षित से चौधरी रामप्रकाश विजयी रहे। जनता दल ने भी पांच सीटें जीती, जिनमें रोहतक से चौधरी देवीलाल, सोनीपत से कपिल देव, हिसार से जयप्रकाश जेपी और सिरसा आरक्षित से हेतराम ने विजय हासिल की।

भाजपा को इन चुनावों में एक भी स्थान पर जीत हासिल नहीं हुई। इसका सबसे बडा कारण ये रहा कि चौधरी देवीलाल ने हरियाणा की बजाय राष्ट्रीय राजनीति को अधिक समय देना शुरू कर दिया था। जनता दल के गठन में वीपी सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनवाने में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही। हरियाणा की सरकार अब उनके बड़े बेटे चौधरी ओमप्रकाश चौटाला और छोटे बेटे चौधरी रणजीत सिंह के द्वारा चलाई जा रही थी। दूसरे जयप्रकाश उर्फ जेपी के नेतृत्व में ग्रीन ब्रिगेड की संदिग्ध गतिविधियां और भूमिका ने भाजपा के शहरी, व्यापारी और पंजाबी जनाधार को कमजोर करने का काम किया था।

चुनाव के बाद चौधरी देवीलाल उपप्रधानमंत्री बने और अपने स्थान पर वरिष्ठता के आधार पर चौधरी ओमप्रकाश चौटाला को मुख्यमंत्री बना दिया। भाजपा ने इस सरकार में शामिल नहीं होने का फैसला लिया। चौधरी रणजीत सिंह से समर्थक भी इस बात से नाराज हुए कि उनकी अनदेखी हुई है। परिणाम स्वरूप यह सरकार बनने के बाद ही कमजोर होना शुरू हो गई थी। इसे पहला आघात महम उपचुनाव में लगा। चौधरी देवीलाल के विधानसभा से त्यागपत्र देने के बाद महम सीट खाली हो गई थी। इस चुनाव में जमकर राजनीतिक हिंसा हुई और चुनाव को रद्द करार कर दिया गया। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने चौटाला साहब को त्यागपत्र देने पर भी मजबूर कर दिया। उनके स्थान पर अपने विश्वासपात्र बाबू बनारसी दास गुप्ता को मुख्यमंत्री बनवा दिया। इसके बावजूद चौटाला साहब हार मानने को तैयार नहीं थे और कुछ ही दिन बाद बाबू बनारसी दास गुप्ता को त्यागपत्र देना पडा और फिर से चौटाला साहब हरियाणा के मुख्यमंत्री बन गए। एक बार फिर केंद्र के दबाव में उन्हें पद से त्यागपत्र देना पडा तो उन्होंने अपने एक अन्य विश्वासपात्र मास्टर हुकम सिंह को हरियाणा प्रदेश के मुख्यमंत्री की शपथ दिलवा दी। इसी बीच 1990 में जनता दल का ही विभाजन हो गया और वीपी सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार भरभराकर गिर गई और लोकसभा में बहुमत गंवा दिया। उनके स्थान पर चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और कांग्रेस का उन्हें बाहर से समर्थन प्राप्त था। चौधरी देवीलाल इस सरकार में भी उपप्रधानमंत्री थे।

इस राजनीतिक फेरबदल हरियाणा की राजनीति पर भी प्रभाव पडा और ओमप्रकाश चौटाला ने मौके का फायदा उठाते हुए मास्टर हुकम सिंह का इस्तीफा दिलवाकर एक बार फिर से हरियाणा प्रदेश की कमान संभाल ली। हरियाणा में चंद्रशेखर के जनता दल जिसे अब समाजवादी जनता पार्टी का नाम दे दिया गया था, का हरियाणा विधानसभा में जनता दल के विभाजन के बाद बहुमत नहीं रहा। ऐसे हालात में राज्यपाल धनिक लाल मंडल ने चौटाला साहब को बुलाकर विधानसभा में बहुमत साबित करने का आदेश दिया। उनके द्वारा ऐसा नहीं करने पर राज्यपाल ने मंत्रीमंडल को बर्खास्त कर दिया और विधानसभा भंग करने की सिफारिश और राष्ट्रपित शासन लागू करवा दिया। इसके फलस्वरूप हरियाणा की राजनीति का वह युग जो पंजाब समझौते के विरूद्ध चौधरी देवीलाल की हरियाणा की संघर्ष समिति के न्याय युद्ध के रूप में शुरू किया था, समाप्त हो गया। भाजपा ने भी अकेले चलने का फैसला किया और कांग्रेस पार्टी द्वारा हाशिए पर डाले गए चौधरी बंसीलाल ने भी हरियाणा विकास मंच बनाकर उसे हरियाणा विकास पार्टी में बदलने का फैसला लिया। जनता दल में चौधरी ओमप्रकाश चौटाला के विरोधी जनता दल में ही रह गए वहीं चौधरी देवीलाल के समाजवादी जनता पार्टी में चले जाने के बाद हरियाणा में जनता दल का आधार सिकुड गया था। इन राजनीति परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए चौधरी भजनलाल एक बार फिर से हरियाणा में कांग्रेस के सर्वोच्च नेता बन गए। दूसरे दलों की कमजोरी का फायदा उठाते हुए खासतौर पर जनता दल में विभाजन का तथा चौटाला साहब और उनके द्वारा मनोनीत मुख्यमंत्रियों की सरकारों की कार्यशैली ने कांग्रेस को प्रदेश में अपना खोया जनाधार वापस हासिल करने में सहायता की।

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