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आजादी की पहली वीरांगना थीं रानी अवंती बाई लोधी, राजा विक्रमाजीत के साथ हुआ था विवाह

1857 की क्रांति की प्रणेताओं में रानी अवंती बाई लोधी अग्रणीं थीं लेकिन इतिहास में समुचित स्थान नहीं पा सकीं। राजा विक्रमाजीत का विवाह सिवनी जिले के मनकेहड़ी के जागीरदार राव जुझार सिंह की पुत्री अवंती बाई के साथ हुआ। अवन्ती बाई ने दिसंबर 1857 से फरवरी 1858 तक गढ़ मंडला पर शासन किया।

आजादी की पहली वीरांगना थीं रानी अवंती बाई लोधी, राजा विक्रमाजीत के साथ हुआ था विवाह

आजादी की लड़ाई में हजारों लोग कुर्बान हुए। उनके बलिदान के कारण हम आजाद हुए और खुली हवा में सांस ले रहे हैं। इन बलिदानियों में एक नाम रामगढ़ की रानी अवंती बाई लोधी का भी है। वे 1857 की क्रांति की प्रणेताओं में अग्रणीं थीं लेकिन इतिहास में समुचित स्थान नहीं पा सकीं। उल्लेखनीय है कि तत्कालीन रामगढ़ राज्य वर्तमान मध्य प्रदेश में मंडला जिले के अंतर्गत चार हजार वर्गमील में फैला हुआ है।

1857 की क्रांति ओर रानी अवंती बाई लोधी

इसमें 681 गांव थे। इसका विस्तार सुहागपुर अमरकंटक और कबीर चबूतरा तक था। इसकी स्थापना 1680 ईस्वी में गढ़ा मंडला के शासक नरेन्द्र शाह के सेनापति मोहन सिंह लोधी ने की थी। 1850 ईस्वी में मोहन सिंह के वंशज विक्रमाजीत रामगढ़ की गद्दी पर बैठे। राजा विक्रमाजीत का विवाह सिवनी जिले के मनकेहड़ी के जागीरदार राव जुझार सिंह की पुत्री अवंती बाई के साथ हुआ। विक्रमाजीत बहुत ही योग्य और कुशल शासक थे किन्तु अत्यधिक धार्मिक प्रवृत्ति के होने के कारण वह राजकाज में कम सत्संग एवं धार्मिक कार्यों में अधिक समय देते थे।

1857 की क्रांति ओर रानी अवंती बाई लोधी

उनके दो पुत्र शेरसिंह और अमान सिंह अभी नाबालिग ही थे कि विक्रमाजीत विक्षिप्त से हो गए और राज्य प्रबंध का पूरा भार रानी अवंती बाई के कंधों पर आ गया। अवंती बाई द्वारा राजकाज करने का समाचार पाकर गोरी सरकार ने 13 सितंबर 1851 को रामगढ़ राज्य को कोर्ट ऑफ वाइस के अधीन कर राज्य प्रबंध के लिए एक तहसीलदार नियुक्त कर दिया। अंग्रेजों की इसी नीति से क्षुब्ध राजा विक्रमाजीत की असामयिक मृत्यु हो गई।

1857 की क्रांति ओर रानी अवंती बाई लोधी

रानी अवंती बाई उस समय तो खून का घूंट पीकर रह गईं किन्तु उन्होंनें प्रतिज्ञा की कि वह इसका बदला लेकर रहेंगी और तब तक चैन से नहीं बैठेंगी जब तक देश की भूमि से अंग्रेजी शासन को न मिटा दिया जाए। लार्ड डलहौजी की हड़प नीति का कुचक्र जब संपूर्ण देश में तेजी से चलने लगा तो कई राजा रजवाड़े और जागीरदार अंग्रेजों के खिलाफ संगठित होने लगे।

1857 की क्रांति ओर रानी अवंती बाई लोधी

दिल्ली और मेरठ में भड़के विप्लव की आग मध्य भारत और बुंदेलखंड से होती हुई जब गोंडवाना क्षेत्र में पहुंची तो यह समूचा क्षेत्र क्रांति के लिए उठ खड़ा हुआ। रानी अवंती बाई ने आसपास के ठाकुरों, जागीरदारों और राजाओं से संपर्क किया और गढ़ मंडला के शासक शंकर शाह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के लिए दिन निश्चित किया।

1857 की क्रांति ओर रानी अवंती बाई लोधी

क्रांति का संदेश गांव-गांव तक पहुंचाने हेतु अवंती बाई ने अपने हाथ का लिखा यह पुर्जा भिजवाया, कि देश और आन के लिए मर मिटो अथवा चूड़ियां पहनो। तुम्हें धर्म, ईमान की सौगंध है, जो इस कागज का पता बैरी को दो। लेकिन गिरधारीदास नामक देशद्रोही ने इस योजना की सूचना मंडला के डिप्टी कमिश्नर को दे दी।

1857 की क्रांति ओर रानी अवंती बाई लोधी

उसने शीघ्र ही 18 सितंबर 1857 को राजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह को विद्रोह के आरोप में पकड़कर तोप के मुंह से बांधकर उड़वा दिया। इस घटना से क्षुब्ध नेटिव इन्फैन्ट्री के सैनिकों ने सूबेदार बल्देव तिवारी के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। विजयराघवगढ़ के राजा सरजूप्रसाद शाहपुर के मालगुजार ठा. जगत सिंह, शहपुरा के ठा. बहादुर सिंह लोधी एवं हीरापुर के मेहरबान सिंह लोधी भी रानी अवन्ती बाई से आ मिले।

1857 की क्रांति ओर रानी अवंती बाई लोधी

अंग्रेजी सेना से रानी की पहली भयंकर मुठभेड़ खैरी में हुई। रानी की तलवार के वार से अंग्रेजी सेनापति वाडिंगटन का घोड़ा दो टुकड़े हो गया और वाडिंगटन रानी से प्राणों की भीख मांगता हुआ जबलपुर भाग गया। इसके बाद अवन्ती बाई ने दिसंबर 1857 से फरवरी 1858 तक गढ़ मंडला पर शासन किया। वाडिंगटन लंबे समय से मण्डला जिले का डिप्टी कमिश्नर था।

1857 की क्रांति ओर रानी अवंती बाई लोधी

अंग्रेजी सैनिकों ने छापामार तरीके से युद्ध कर सर्वप्रथम विजयरागवगढ़ पर अधिकार कर लिया फिर 31 मार्च 1858 को घुघरी गांव को विद्रोहियों से छीन लिया। वे शीघ्र की पाटन, संग्रामपुर, स्लीमनाबाद और नारायणगंज को जीतते हुए 2 अप्रैल 1858 को रामगढ़ आ पहुंचे और एक साथ तेजी से रामगढ़ के किले पर आक्रमण कर दिया।

1857 की क्रांति ओर रानी अवंती बाई लोधी

अवंती बाई ने किले से बाहर निकलकर देवहरगढ़ के मैदान में युद्ध करना उिचत समझा। इसी समय रानी की सहायता के लिए शहपुरा का लोधी ठाकुर जो मण्डला जिले का सर्वाधिक वीर योद्धा था, अपने सैन्य बल के साथ आ पहुंचा। इसी अंग्रेजों के गुप्तचरों ने खबर दी कि देवहरगढ़ में विद्रोही बहुत भयभीत हो गए हैं। वाडिंगटन एक सप्ताह तक वहीं रुक कर रीवा नरेश की सेना का इंतजार करता रहा।

1857 की क्रांति ओर रानी अवंती बाई लोधी

रीवा से सेना पहुंचने पर देवहरगढ़ में भयंकर युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेजों को कई बार पूछे हटना पड़ा लेकिन उन्होंने शीघ्र ही अवनि्त बाई को चारों तरफ से घेर लिया। तब अपने को दुश्मनों के द्वारा पकड़े जाने से उन्होंने आत्म बलिदान करना ही श्रेयस्कर समझा और पलक झपकते ही तलवार अपने पेट में घोपकर शहीद हो गई।

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