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विश्लेषण : सामान्य वर्ग की जातियों को 10 फीसदी आरक्षण जायज या नाजायज, जानें

आर.के. सिन्हा | UPDATED Jan 10 2019 11:03AM IST
विश्लेषण : सामान्य वर्ग की जातियों को 10 फीसदी आरक्षण जायज या नाजायज, जानें

केन्द्र में नरेंद्र मोदी सरकार ने अंततः सामान्य वर्ग की जातियों को 10 फीसदी आरक्षण देकर एक पुरानी और जायज मांग को मान लिया है। मोदी सरकार के इस फैसले से उन करोड़ों सवर्ण जाति के लोगों को भी कुछ राहत मिल सकेगी जो पीढ़ियों से निर्धनता का जीवन जीने को अभिशप्त हैं। यह दस प्रतिशत का आरक्षण सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को दिया जाएगा।

उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छतीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान राज्यों के सुदूर इलाकों की पांच दशकों से खाक छानने के मैं अपने अनुभव के आधार पर यह बाद कह सकता हूं कि इनमें बड़ी संख्या में अगड़ी जातियों के लोग बेहद विषम हालात में जीवनयापन कर रहे हैं। इनकी जमीन की जोत निरंतर घटती ही जा रही है।

इनके हितों का कोई देखने वाला भी नहीं है। ये तो दूसरों की खेतों में भी जाकर मजदूरी कर सकते हैं, कर भी रहे हैं, लेकिन घर की महिलाएं लोकलाज की वजह से घर के बाहर मजदूरी भी नहीं कर सकतीं। आखिरकार ये गरीब कैसे करें अपने परिवार की परवरिश। बच्चों की उत्तम पढ़ाई, बूढ़ों की दवाई और बेटियों का विवाह कैसे हो? अब इन्हें भी जरूर कुछ हद तक राहत मिलेगी।

ये अपने को देश-समाज का ही अविभाज्य अंग मान सकेंगे। जब यह  देश सबका है, तो फिर यहां पर सबको बराबर के अवसर क्यों न मिलें, यह तो वाजिब सवाल है। निर्विवाद रूप से हिंदू समाज जाति के कोढ़ से घिरा है, पर भारतीय संविधान जाति पर आधारित तो नहीं है। वह तो सभी नागरिकों के साथ हर स्तर पर समान व्यवहार की बात करता है।

उसमें भेदभाव या असमानता के लिए कोई जगह ही नहीं है। संविधान धर्म, जाति, रंग, वगैरह के स्तर पर भेदभाव नहीं करता। इस आलोक में सवर्णों को आरक्षण देना एक सार्थक और सही कदम है ताकि उनके गरीब तबके की भी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार हो। लगातार आरक्षण के लाभ के चलते बुलंदियों को छूने वाले दलित-पिछड़े भी मिलते ही रहते हैं।

वे बताते हैं कि नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण मिलने से ही उनकी और उनके बाल-बच्चों की जिंदगी सुधर गई है। वे सामाजिक-आर्थिक रूप से अब खुशहाल हो गए हैं । यह वास्तव में एक सुखद स्थिति है कि सदियों से वंचित जातियां अब आगे आ रही हैं। इन्हें भी अवसर मिल रहे हैं। ये जीवन के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं।

इस पृष्ठभूमि में किसी को क्या दिक्कत होगी कि अगर किसी जरूरतमंद गरीब सवर्ण को भी आरक्षण का लाभ मिल जाए? क्या कोई मां अपनी उस संतान को घी से चुपड़ी रोटी नहीं देती जो पढ़ाई में शारीरिक दृष्टि से या किसी अन्य लिहाज से उसके अपने ही पैदा किए हुए दूसरे बच्चों से उन्नीस होता है? तो क्या भारत माता अपनी किसी संतान के साथ इस तरह का अन्याय को सहन करेगी? बेशक नहीं।

बाबा साहब अंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए बहुत साफ शब्दों में कहा था, ‘जाति तो राष्ट्र विरोधी है। जातियां राष्ट्र-विरोधी हैं। इनसे समाज बिखरता है। ये राष्ट्र-विरोधी इस मायने में हैं क्योंकि इनके (जातियों) चलते विभिन्न जातियों में एक-दूसरे को लेकर कटुता का भाव पैदा होता है।’

इसी तरह से राहुल गांधी के परनाना जवाहरलाल नेहरू ने भी 13 जून, 1951 को लोकसभा में एक बहस के दौरान कहा था, ‘भारत का संविधान तो एक जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की तरफ बढ़ने का वादा करता है। दरअसल सरकार का दायित्व है कि वो समाज के सबसे पिछड़े पायदान पर खड़े लोगों को ताकत दे।’

सवर्णों की आरक्षण का मांग करने वाले भी अपनी जगह सही थे कि आरक्षण का लाभ उन्हें ही मिले जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं।  जो भी आर्थिक रूप से कमजोर हो उसे लाभ दे दो। फिर जाति को मत देखो। हमारे दलित-पिछड़े समाज को आरक्षण की आवश्यकता से कहीं अधिक समाज में सम्मान की जरूरत ज्यादा थी।

अगर हमारे राजनीतिक नेताओं ने आरक्षण का शोर मचाने के स्थान पर इन्हें समाज में सम्मान दिलाने के लिए अपनी शक्ति लगाई होती।  अंतरजातीय-अंतर-प्रांतीय विवाहों को बढ़ावा दिया होता तो आज सामाजिक समरसता पर खतरा न मंडराया होता। हमारी वर्तमान राजनीतिक एवं कानून व्यवस्था आरक्षण तो देती है, मगर सम्मान की गारंटी नहीं देती।

वास्तव में वर्तमान भारत के कई राजनीतिक दल जातिवाद को दूर करने के बजाय उसे और भी ज्यादा सुदृढ़ करने के जुगाड़ में लगे रहते हैं। इन्हें हिंदू कहने के बजाय दलित कहने के लिए उकसाया जा रहा है। ये वास्तव में हिंदू समाज का वह आस्थावान वर्ग है जिसने मुगलों की चमचागिरी नहीं की, उनसे सुविधा नहीं ली, संघर्ष किया और यातनाएं सहीं पर धर्म परिवर्तन नहीं किया।

समाज को बांटने का जो काम पहले अंग्रेज करते थे वही जघन्य काम आज ये क्षुद्र प्रवृति के राजनीतिज्ञ कर रहे हैं। इसी जहरीली नीति का परिणाम है कि बीते दशकों से उपेक्षित सवर्ण जातियां भी अब मुखर होने लगी थीं। पिछले साल मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव से पहले सवर्ण आंदोलन शुरू हुआ था। वह भी समाज को बांटने की प्रक्रिया को बढ़ावा देने वाली बात थी।

यह तो कोई बात है कि समाज के कुछ लोग बहकाने में आकर भ्रमित हो जाएं तो उसका जबाब आप भी गैर-जिम्मेदारी पूर्ण समाज को बांटने वाले कम से करें? अनुसूचित जाति-जनजाति संशोधन अधिनियम के खिलाफ सवर्ण संगठनों ने विगत सितंबर में भारत बंद भी रखा था। इनके बंद का मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार वगैरह में तगड़ा असर देखा गया था।

बिहार के अलग-अलग जिलों में प्रदर्शन भी हुए थे। वहीं मध्य प्रदेश में स्कूल-कॉलेज और पेट्रोल पंपों को दिनभर के लिए बंद रखा गया था। उत्तर प्रदेश में भी एसएसी-एसटी एक्ट में बदलाव को लेकर प्रदर्शन भी हुए थे। सवर्णों के  उस विरोध के बाद यह सबके समझ आ रही थी कि अब इन जाति्ायों के हकों और मांगों को भी जानना होगा।

हालांकि निजी राय यह है कि अब नौजवानों को नौकरियों को करने के बजाय अपना कोई काम-काज करने के संबंध में सोचना होगा। आपको किसी नए आइडिया पर काम करना होगा। अगर आपके कोई नया आइडिया है तो आप भी दर्जनों-सैकड़ों को नौकरी दे सकते हैं। अब आपके प्रोजेक्ट में मदद करने वालों की भी कोई कमी नहीं है। आप लाइए तो सही, कोई नया आइडिया।

हां, अगर आपको हर साल एक मामूली इंक्रीमेंट वाली नौकरी ही करनी है तो फिर तो कोई बात नहीं है। शिव नाडार का उदाहरण आपके सामने है। वो पिछड़ी जाति से आते हैं। शिव नाडार  एचसीएल टेक्नॉलोजीज के अध्यक्ष हैं। पिछले तीन दशक में भारत में तकनीकी कंपनियों की बाढ़-सी आ गई है, लेकिन एचसीएल को उत्कर्ष तक ले जाने के पीछे शिव नाडार का नेतृत्व ही प्रमुख है।

नाडार की कंपनी में बड़े पद तक पहुंचना भी आसान नहीं होता। वे इसलिए ही आगे बढ़ते जा रहे हैं क्योंकि उनके पास नए आइडियाज हैं। बहरहाल, अभी तो सरकार के सवर्ण जातियों को रोजगार और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देने के मसले पर कुछ विरोधी के स्वर भी सुनाई दे सकते हैं। संभव है कि कुछ कथित बुद्धिजीवी सरकार के फैसले पर टीका-टिप्पणी भी करें, लेकिन यह फैसला अंततः समाज में अगड़ी-पिछड़ी जातियों को करीब ही लाएगा।


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