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कोहिनूर: प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाना सही नहीं

महाराजा रणजीत सिंह ने ''किस परिस्थिति'' में यह हीरा ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपा, इसके पीछे का सच इतिहास में ही दफ्न है।

कोहिनूर: प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाना सही नहीं
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बेशकीमती हीरों में से एक 'कोहिनूर' भारत का है, इसमें कोई शक नहीं है। यहां के खदान से निकलने से लेकर सैकड़ों वर्षों तक यह हीरा भारतीय शासकों के कब्जे में रहा, इसका भी प्रमाण है। 105 कैरेट का यह हीरा 1849 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिये ब्रिटेन पहुंचा, उस समय भारत रियासतों में बंटा हुआ था और ब्रिटिश समूचे भारत पर आधिपत्य जमाने की कोशिश में जुटे थे। महाराजा रणजीत सिंह ने 'किस परिस्थिति' में यह हीरा ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपा, इसके पीछे का सच इतिहास में ही दफ्न है। ज्ञात इतिहास के मुताबिक रणजीत सिंह ने 'तोहफे' में 20 करोड़ डॉलर की कीमत का यह बहुमूल्य हीरा ब्रिटेन को दिया। अब तोहफे में दी गई चीज वापस कैसे पाई जा सकती है। यह बड़ा सवाल है।

वैसे व्यापार के नाम पर भारत आई ईस्ट इंडिया कंपनी ने छल-कपट से किस तरह यहां हुकूमत कायम किया और भारत के संसाधन को लूटा और राजाओं की बेशुमार संपत्तियों पर कब्जा किया, यह इतिहास में वर्णित है। लेकिन अब स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्थिति बदल गई है। भारत और ब्रिटेन के अच्छे रिश्ते हैं। दोनों देशों के बीच कारोबारी संबंध भी प्रगाढ़ हैं।

कहने के लिए ब्रिटेन को चाहिए कि कोहिनूर भारत को लौटा दे। लेकिन ब्रिटेन के पीएम डेविड कैमरून कह चुके हैं कि कोहिनूर पर कई देशों का दावा है। इस पर भारत के अलावा पाकिस्तान अफगानिस्तान व ईरान का भी कथित दावा है। ऐसे में ब्रिटेन के लिए दुविधा की स्थिति है। अब जब भारत सरकार ने कहा है कि वह कोहिनूर हीरे को वापस लाने के लिए पूरा प्रयास करेगी।

हालांकि सरकार ने पहले सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि इसे ब्रिटिश शासकों द्वारा 'न तो चुराया गया था और न ही जबरन छीना' गया था, बल्कि पंजाब के शासकों ने इसे 'तोहफे' के रूप में दिया था। इसलिए इस पर दावा नहीं बनता है। लेकिन एक दिन बाद ही सरकार ने कहा कि उसने सुप्रीम कोर्ट में कोहिनूर के बारे में 'ऐतिहासिक तथ्य' को रखा था। इसका मतलब यह कत्तई नहीं था कि सरकार हीरा वापस लाने की कोशिश नहीं करेगी। वैसे देश के पहले पीएम पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी 1956 में कहा था कि कोहिनूर को वापस लाने का दावा करने का कोई आधार नहीं है। इसको वापस लाने के प्रयासों से मुकिश्लें पैदा होंगी। हालांकि यह मामला अभी भी शीर्ष अदालत में है। सरकार को दो हफ्ते में सुप्रीम कोर्ट को जवाब देना है।

इतिहास को देखें तो ब्रिटिश राजवंश के ताज का हिस्सा बनने से पहले यह हीरा भारत की खान से ही निकला व भारतीय शासकों के कब्जे में ही रहा। आंध्र प्रदेश की मशहूर कोल्लूर खान से निकलने के बाद कोहिनूर हीरा मुगलों के पास आया। मुगल से पर्शियन (ईरान) शासक नादिरशाह के पास गया। उनसे अफगानी शासक अहमद शाह अब्दाली के कब्जे में आया। अब्दाली से यह दूसरे अफगानी शासक शाह शुजा दुर्रानी के पास पहुंचा और उनसे पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के पास आया। उन्होंने इसे ईस्ट इंडिया कंपनी को दिया। इस तरह यह भारतीय हीरा कई हाथों से गुजरा है। कोहिनूर को न ही भावनात्मक मुद्दा बनाने की जरूरत है व न ही हमें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाना चाहिए। हम इतिहास बहुत आगे आ गए हैं।

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