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विमुद्रीकरण से जीडीपी की ग्रोथ पर सवाल उठाना गलत

कांग्रेसी चरित्र की हद हो गई है कि जो आंकड़े सामने आए हैं, उसके नेता उन्हें झुठलाने पर आमादा हैं।

विमुद्रीकरण से जीडीपी की ग्रोथ पर सवाल उठाना गलत
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विमुद्रीकरण के दौरान के कुछ आंकड़े सार्वजनिक किए गए हैं। वे मोदी सरकार के विरोधियों और खासकर कांग्रेस नेताओं की चीखा-चिल्ली को बेनकाब करते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ.

मनमोहन सिंह ने तो विमुद्रीकरण को ‘संगठित लूट' तक करार दिया था। पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम अब भी विमुद्रीकरण को जीडीपी के खिलाफ प्रचारित कर रहे हैं। नोबेल पुरस्कार

विजेता प्रो. अमर्त्य सेन ने भी विमुद्रीकरण को घातक करार देते हुए भविष्यवाणी की थी कि देश की अर्थव्यवस्था की विकास-दर 2-3 फीसदी तक कम हो सकती है।

कांग्रेसी चरित्र की हद हो गई है कि जो आंकड़े सामने आए हैं, उसके नेता उन्हें झुठलाने पर आमादा हैं। यूपीए सरकार में भी आंकड़े यही विभाग जारी करता था, क्या तब भी वे झूठ

के पुलिंदा थे? बहरहाल बीते साल की तीसरी तिमाही की विकास-दर के आंकड़े सामने हैं। जीडीपी में सात फीसदी विकास-दर का अनुमान है। पूरे वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान जीडीपी

की बढ़ोतरी दर 7.1 फीसदी आंकी गई है,जो बीते वर्ष 2015-16 के दौरान 7.9 फीसदी अनुमानित थी। गिरावट या कमी बेहद चौंकाने वाली या नकारात्मक नहीं है। विमुद्रीकरण के

बावजूद जीडीपी की विकास-दर सात फीसदी के करीब आंकी गई है।

जाहिर है कि विमुद्रीकरण ने देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत खतरनाक प्रभाव नहीं डाले हैं। हालांकि अर्थशास्त्रियों समेत आईएमएफ के आकलन थे कि विमुद्रीकरण के कारण भारतीय

जीडीपी की आर्थिक विकास दर 6.5 फीसदी के करीब तक लुढ़क सकती है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह भी आकलन किए गए थे कि कृषि और विनिर्माण के क्षेत्रों में, जहां लाखों लोग

काम करते हैं, भारी गिरावट देखने को मिल सकती है, लेकिन तीसरी तिमाही के आंकड़े कुछ और ही बयां करते हैं।

मसलन-इस कालखंड में कृषि की औसत दर 0.8 फीसदी से बढ़कर 4.4 फीसदी बताई जा रही है। मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में भी 10.6 से घटकर 7.7 फीसदी की दर हुई है। हालांकि

माइनिंग के क्षेत्र में भी गिरावट देखी गई है, लेकिन निर्माण 2.8 फीसदी से 3.1 फीसदी बढ़ता हुआ दिख रहा है। किसी भी अर्थव्यवस्था में ये क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। हालांकि

ऐसी रपटें आती रही हैं कि विमद्रीकरण के कारण करीब 2-3 करोड़ लोग बेरोजगार या बेकाम हो गए हैं।

उप्र में व्यापारियों और बुनकरों की शिकायतें रही हैं कि धंधा 40 से 70 फीसदी तक कम हो गया है। ऐसे ही कई आकलन देशभर के उद्योगों के सामने आए हैं, लेकिन कृषि जैसे क्षेत्र

पर करीब 70 फीसदी आबादी आश्रित है, उसकी विकास-दर 4.4 तक वाकई चौंकाने वाली है। इसी के साथ गौरतलब यह है कि आठ बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर जनवरी में 3.4

फीसदी रही है, जो पांच महीने का न्यूनतम स्तर है। इनकी वृद्धि दर जनवरी, 2016 में 5.7 फीसदी थी।

अब वृद्धि दर अगस्त, 2016 के बाद सबसे कम है। इसके बावजूद उद्योग जगत का मानना है कि अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही है। फिक्की वाले उद्योगपतियों का कहना है कि

आर्थिक वृद्धि के अगले वित्त वर्ष में पूरी तरह पटरी पर आने की उम्मीद है। केंद्रीय बजट ने जो संकेत दिए हैं, वे उत्साहजनक हैं और उससे घरेलू अर्थव्यवस्था और मजबूत होगी।

दरअसल सवाल विमुद्रीकरण का है। अर्थव्यवस्था के इन आंकड़ों के आधार पर आकलन किया जा रहा है कि विमुद्रीकरण का कारोबार और उद्योगों पर बहुत उलटा असर नहीं पड़ा है।

ये आकलन स्वीकार्य होने चाहिए।

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने वित्त वर्ष 2016-17 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसम्बर)का जो विकास दर (जीडीपी) आंकड़ा जारी किया, उससे सरकार की बांछे खिल गई

हैं। गत आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हजार और पांच सौ के नोटों पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके बाद जीडीपी की गति मंदी पड़ जाने की आशंका व्यक्त की जा रही

थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने तो अपनी अनुमानित जीडीपी दर में एक फीसदी की कटौती भी कर दी,लेकिन सीएसओ के ताजा

आंकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष में जीडीपी 7.1 प्रतिशत रहेगी और तीसरी तिमाही में सात फीसदी।

अब कहा जा रहा है कि अक्टूबर-दिसंबर की अवधि में जीडीपी पर इसलिए ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा, क्योंकि विमुद्रीकरण केवल 50 दिन लागू था। हालात का असली अंदाजा जनवरी-मार्च

की अंतिम तिमाही में चलेगा, जिसके बाद ही ठीक-ठीक बताया जा सकेगा कि पूरे वर्ष विकास दर क्या रहेगी। तीसरी तिमाही में जीडीपी को संभालने में कृषि और सरकारी खर्च का

योगदान सबसे अधिक था। खेतीमें 4.4 प्रतिशत तथा सरकारी खर्च में 11.2 प्रतिशत इजाफा हुआ, जो एक साल पहले के मुकाबले कहीं अधिक है। इसी प्रकार उर्जा और गैस तथा

निर्माण क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। इस अवधि में सरकारी सब्सिडी बिल घटा तथा अप्रत्यक्ष कर संग्रह में बढ़ोत्तरी हुई।

इन दोनों कारणों से भी विकास दर में गिरावट नहीं आई, लेकिन खनन, निर्माण, व्यापार-होटल तथा वित्त व रीयल एस्टेट में गिरावट दर्ज की गई, जो चिंता का विषय है, लेकिन

रोजगार का मोर्चा सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ है। निर्माण क्षेत्र की कमजोरी तथा नौकरियों में आदमी की जगह रोबोट के बढ़ते इस्तेमाल से विकास दर में वृद्धि के बावजूद

रोजगार बाजार ठंडा पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने रोजगार नापने का पैमाना एम्प्लॉयमेंट इलास्टिसिटी बना रखा है, जिससे पता चलता है कि विकास दर में इजाफा होने पर

रोजगार कितना बढ़ता है।

1999-2007 के बीच विकास दर में एक प्रतिशत वृद्धि होने पर रोजगार में 0.3 फीसदी का इजाफा होता था, जो अब गिरकर 0.15 प्रतिशत रह गया है। आज हालत यह है कि अरबों

रुपये का निवेश होने पर भी नौजवानों को नौकरी नहीं मिलती। हाल में रिलायंस उद्योग ने जियो के जरिये 25 अरब डाॅलर का निवेश किया, किंतु इस कारण संचार क्षेत्र में एक भी

नई नौकरी नहीं आई। उलटे स्पर्धा में बने रहने के लिए प्रतिद्वंदी कंपनियों ने अपने खर्चों में कटौती की, जिससे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा।

उद्योगों में रोबोट का बढ़ता प्रयोग अब विकसित देशों का ही सिरदर्द नहीं है, इससे भारत जैसा मुल्क भी प्रभावित हो रहा है। हमारे देश में रोबोट बनाने वाली ग्रे ऑरेंज जैसी कंपनी

तेजी से पैर पसार रही है। इसका असर साफ महसूस किया जा सकता है। सीएसओ रिपोर्ट इसका प्रमाण है कि 1994-95 में एक करोड़ रुपये कीमत का खनिज निकालने के लिए 25

श्रमिकों की जरूरत पड़ती थी, जबकि अब महज आठ मजदूर एक करोड़ का खनिज निकल लेते हैं। कड़वा सच यह है कि अधिकांश उद्योगों में आज उत्पादन भले ही बढ़ रहा है, किंतु

रोजगार घट रहा है। बेरोजगारी की समस्या सामाजिक तनाव को जन्म देती है, जो सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।

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