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''असहमति'' पर राष्ट्रपति की कड़ी नसीहत जायज

मुखर्जी ने पहली बार अवॉर्ड वापस करने वाले साहित्यकारों इतिहासकारों और फिल्मकारों को कड़ी नसीहत दी है।

सहिष्णुता को लेकर देश में जारी बहस के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार को दो बार नसीहत देने वाले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पहली बार अवॉर्ड वापस करने वाले साहित्यकारों इतिहासकारों और फिल्मकारों को कड़ी नसीहत दी है। प्रणब ने कहा है कि देश में चिंता पैदा करने वाली घटनाओं पर बहस होनी चाहिए, अवॉर्ड वापसी नहीं। उन्होंने कहा कि अगर किसी मसले पर मतभेद है, तो उसे दूर करने के लिए चर्चा होनी चाहिए।
यही स्वस्थ लोकतांत्रिक तरीका है। जिन लोगों को भी सम्मान मिला है, वे खुद को मिले अवॉर्ड का सम्मान करें और उसे संजोकर रखें। अवॉर्ड किसी को उसके कार्य और उपलब्धियों को देखते हुए सम्मान के तौर पर दिया जाता है। कभी-कभी समाज में घट रही घटनाओं को लेकर संवेदनशील लोगों का परेशान होना लाजिमी है, लेकिन भावना में बहकर तर्क को नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि असहमति को बहस के जरिए दिखाना ज्यादा बेहतर लोकतांत्रिक तरीका होता है।
इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दो बार कह चुके हैं कि उनकी सरकार को किसी भी रूप में असहनशीलता स्वीकार नहीं है। सरकार संविधान के दायरे में काम कर रही है और संविधान हर किसी के अधिकार की रक्षा करता है। देश में कानून का राज है और किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं है। जो कोई भी कानून हाथ में लेने की कोशिश करेगा या कानून का उल्लंघन करेगा, उसे कानून संविधान सम्मत सजा देगा।
अब ये पुरस्कार लौटाने वालों पर निर्भर करता है कि वे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की बातों को कितनी अहमियत देते हैं। जहां तक असहनशीलता की बात है, तो जिस तरह बिहार चुनाव के समय अचानक से बुद्धिजीवियों ने पुरस्कार वापसी की घोषणाएं कीं और मीडिया के एक बड़े हिस्से में तेज बहस देखने को मिली व सोशल मीडिया पर असिहष्णुता के नाम पर सरकार के खिलाफ विरोध की बाढ़ देखने को मिली, अब बिहार चुनाव के नतीजे आने के बाद सब गायब है।
न तो कहीं पुरस्कार वापसी की चर्चा है, और न ही कहीं बहस दिख रही है, इससे संदेह पैदा होना लाजिमी है कि असहिष्णुता के नाम पर पुरस्कार वापसी के पीछे कहीं कोई निहित स्वार्थ तो नहीं था? क्योंकि देश के हालात में बिहार चुनाव के दौरान और अब कोई अंतर नहीं है। केंद्र मों वही सरकार है। पुरस्कार लौटाने वालों को इस बात पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि वैचारिक असहमति जताने के लिए क्या उनके पास केवल 'सम्मान वापसी' ही एक मात्र तरीका बचा था।
और क्या उन्हें अंदाजा है कि उनके इस कृत्य से ग्लोबल स्तर पर भारत की धर्मनिरपेक्ष व सहनशील समाज की छवि का कितना बड़ा नुकसान हुआ है? आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने ब्रिटेन दौरे पर दुनिया को जवाब देना पड़ा है। जब प्रधानमंत्री देश में आर्थिक सुधार को तेज करना चाहते हैं और उसके लिए विदेशी निवेश को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके परिप्रेक्ष्य में ही उनकी ब्रिटेन यात्रा थी, वहां भारत के रिफॉर्म के बारे में और बड़े करार के बारे में व्यापक स्तर पर चर्चा होनी चाहिए थी, तो असहिष्णुता की चर्चा हावी हो गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी देश की छवि को नुकसान पहुंचाने वाले अपने बयानवीर मंत्रियों और भाजपा नेताओं के खिलाफ कड़ा एक्शन लेकर ठोस संदेश देना चाहिए था। बात इतनी नहीं बिगड़ती। अब उम्मीद की जानी चाहिए कि राष्ट्रपति की नसीहत को नेता और बुद्धिजीवी दोनों समझेंगे।
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