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संपादकीय लेख : एलएसी पर शांति कायम रखने का संकल्प जरूरी

। भारत बातचीत के जरिये सीमा पर विवाद का समाधान चाहता है, लेकिन दुर्भाग्य से चीन की तरफ से नए दौर की वार्ता में दिचलस्पी नहीं दिखाई जा रही है। चीन के इस रवैये पर भारत का आश्चर्यचकित होना लाजिमी है। दोनों देशों में सैन्य कमांडर स्तर की आखिरी वार्ता इस साल नौ अप्रैल को हुई थी। फरवरी मध्य में जब दोनों देशों की सेनाएं पैंगोंग इलाके से पीछे हटी थीं तो यह तय हुआ था कि शेष स्थानों पर सामान्य स्थिति बहाली को लेकर अगली बैठकों में निर्णय किए जाएंगे। उसके बाद दो बैठकें हुई हैं, लेकिन उनमें कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है।

संपादकीय लेख : एलएसी पर शांति कायम रखने का संकल्प जरूरी
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : आज राष्ट्र गलवान घाटी के शहीदों को नमन कर रहा है। पूर्वी लद्दाख की गलवान नदी घाटी में 15 जून 2020 को भारत व चीन के सैनिकों के बीच हिंसा हुई थी, जिसमें 20 भारतीय जवान शहीद हो गए थे। चीन के केवल अपने चार सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि की, लेकिन अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक 40 से 45 चीनी सैनिक मारे गए थे। जवानों का अत्यधिक ऊंचाई वाले सबसे कठिन इलाके में दुश्मन से लड़ते हुए दिया गया यह सर्वोच्च बलिदान राष्ट्र की स्मृति में सदैव अंकित रहेगा। एक साल में लद्दाख में चीन सीमा पर बहुत कुछ बदला है, 11 दौर की वार्ता के बाद चीनी सैनिक लद्दाख सीमा पर पीछे हटने को मजबूर तो हुए, लेकिन अभी कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां चीनी सैनिकों की मौजूदगी भारत की परेशानी का सबब है।

पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर एक साल के बाद भी 5 अप्रैल 2020 से पूर्व की स्थिति बहाल नहीं हो पाई है। भारतीय विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव अरिंदम बागची के इस साल के 3 जून के बयान के मुताबिक, 'सैनिकों को वापस बुलाने की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हुई है।' पैंगोंग लेक इलाके से चीनी व भारतीय सेनाओं के पीछे हटने के बावजूद कई स्थानों पर दोनों देशों की सेनाएं अभी भी आमने-सामने हैं। भारत बातचीत के जरिये सीमा पर विवाद का समाधान चाहता है, लेकिन दुर्भाग्य से चीन की तरफ से नए दौर की वार्ता में दिचलस्पी नहीं दिखाई जा रही है। चीन के इस रवैये पर भारत का आश्चर्यचकित होना लाजिमी है। दोनों देशों में सैन्य कमांडर स्तर की आखिरी वार्ता इस साल नौ अप्रैल को हुई थी। फरवरी मध्य में जब दोनों देशों की सेनाएं पैंगोंग इलाके से पीछे हटी थीं तो यह तय हुआ था कि शेष स्थानों पर सामान्य स्थिति बहाली को लेकर अगली बैठकों में निर्णय किए जाएंगे। उसके बाद दो बैठकें हुई हैं, लेकिन उनमें कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है।

पैंगोंग इलाके से सेनाएं हट चुकी हैं, लेकिन डेप्सांग, हाट स्िप्रंग, गोगरा क्षेत्र में चीनी सेना की मौजूदगी उन स्थानों पर है जहां नहीं होनी चाहिए। भारत का रुख यह रहा है कि इन सभी स्थानों पर अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति बहाली हो। पूर्व की स्थिति बहाली नहीं होने के कारण इस इलाके में संयुक्त पेट्रोलिंग भी नहीं हो पा रही है। दरअसल, पेट्रोलिंग होना इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि जहां-जहा तक भारत पेट्रोलिंग करता है, वहां तक उसकी सीमा की दावेदारी बनती है। जब भी सीमा को लेकर निर्णय होगा, पेट्रोलिंग का दावा अहम माना जा जाएगा। इसलिए भारत की कोशिश यह है कि एलएसी पर मई से पूर्व की स्थिति बहाली में देरी नहीं हो। गलवान घटना के बाद से भात व चीन के रिश्ते तल्ख बने हुए हैं। भारत ने ट्रेड के मोर्चे पर चीन को तगड़ा झटका भी दिया है। सरकार ने चीन के साथ ट्रेड कम किया तो 43 फीसदी भारतीयों ने एक साल में चीनी सामान नहीं खरीदे। इस एक साल में भारत ने चीन सीमा पर अपनी सैन्य ताकत बेहद मजबूत कर ली है। कूटनीतिक रूप से भी भारत ने जहां अमेरिका, फ्रांस, इजराइल, रूस के साथ सैन्य संबंध मजबूत किए, वहीं अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया व जापान के साथ क्वाड आइडिया को आगे बढ़ाया है।

अभी जी-7 की बैठक में भी भारत ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा कर चीन को महत्वपूर्ण संदेश दिया है। भारत जानता है कि चीन भरोसे के लायक नहीं है और वह अपनी विस्तारवादी नीति के अंध सोच में आसक्त है। चीन को एक भरोसेमंद पड़ोसी की तरह व्यवहार करना ही होगा व समझना होगा कि शांति के मार्ग पर चलकर ही भारत के साथ बेहतर संबंध कायम हो सकेगा। इसके लिए चीन को ही पहल करनी होगी। भारत चीन की किसी भी हिमाकत का जवाब देने के लिए सामरिक व कूटनीतिक रूप से हमेशा तैयार है। आज के दिन भारत व चीन को संकल्प करना चाहिए कि दोनों मुल्कों के बीच गलवान जैसी हिंसक घटना फिर कभी नहीं दोहराई जाएगी।

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