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World Earth Day 2019 : विश्व पृथ्वी दिवस पर निबंध, जानें विश्व पृथ्वी दिवस का महत्व

हमारे सौरमंडल में केवल धरती ही ऐसा ग्रह है, जहां जीवन है, जहां नदी, झरने, पहाड़, वन, अनेक जंतु प्रजातियां हैं और जहां हम सब मनुष्य भी हैं।

World Earth Day 2019 : विश्व पृथ्वी दिवस पर निबंध, जानें विश्व पृथ्वी दिवस का महत्व
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World Earth Day 2019 : 22 अप्रैल को वर्ल्ड अर्थ डे 2019 मनाया जाएगा। ऐसे में आप विश्व पृथ्वी दिवस पर निबंध (Essay on World Earth Day in hindi) लिखने की तैयारी कर रहे हैं तो आपको बता दें कि विश्व पृथ्वी दिवस का महत्व (World Earth Day Importance) बहुत अधिक है क्योंकि पृथ्वी जीवन का सार है। अगर आपको आपको वर्ल्ड अर्थ डे पर निबंध (World Earth Day Essay in Hindi) लिखना है या विश्व पृथ्वी दिवस पर भाषण (World Earth Day Speech in Hindi) देना है तो हम आपके लिए लाए हैं बेस्ट वर्ल्ड अर्थ डे पर भाषण, जिसे आप स्कूल या किसी मंच से पढ़ सकते हैं।

हमारे सौरमंडल में केवल धरती ही ऐसा ग्रह है, जहां जीवन है, जहां नदी, झरने, पहाड़, वन, अनेक जंतु प्रजातियां हैं और जहां हम सब मनुष्य भी हैं। लेकिन हम सब की लालच और लापरवाही ने ना केवल दूसरी जीव प्रजातियों के लिए बल्कि खुद अपने लिए और संपूर्ण धरती के लिए संकट पैदा कर दिया है। ऐसे में पृथ्वी दिवस जैसे आयोजन हमें जागरूक करने के लिए जरूरी हैं। आइए इस पृथ्वी दिवस पर हम धरती की पुकार सुनें और इसे स्वच्छ-सुरक्षित बनाए रखने में अपना भरपूर योगदान दें।

भारतीय पौराणिक ग्रंथों में पृथ्वी को मां के समतुल्य माना गया है। यह हम सबकी आश्रयदाता है। इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। इस पर मौजूद बेशुमार संसाधन, उपहार के रूप में हम सबको मिले हैं। प्रकृति ने इस पर जल, नदियां, पहाड़, हरे-भरे वन और धरती के नीचे छिपी हुई खनिज संपदा धरोहर के रूप में हमारे जीवन को सहज बनाने के लिए प्रदान किए हैं। हम अपनी मेहनत से धन तो कमा सकते हैं लेकिन प्रकृति की इन धरोहरों को अथक प्रयास करने के पश्चात भी बढ़ा नहीं सकते। इसलिए हम सबको इन धरोहरों को संजोने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। हमारी धरती बहुत ही सुंदर है। इसका एक बड़ा भाग पानी से ढंका हुआ है। पानी की अधिकता के कारण ही इसे ब्ल्यू प्लेनेट के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन हम सबकी ही लापरवाही के चलते ग्लोबल वार्मिंग और पॉल्यूशन की वजह से यह सुंदर ग्रह अब खतरे में नजर आ रहा है। इसको बचाने के लिए पृथ्वी दिवस जैसे जागरुकता बढ़ाने वाले आयोजनों और अभियानों की आवश्यकता है।

यह भी पढ़ें: World Earth Day 2020 : विश्व पृथ्वी दिवस पर निबंध, जानें विश्व पृथ्वी दिवस थीम

पृथ्वी दिवस की परिकल्पना

पृथ्वी को संरक्षण प्रदान करने के लिए और सारी दुनिया से इसमें सहयोग और समर्थन करने के लिए पृथ्वी दिवस प्रतिवर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाता है। इस दिन को 193 देशों ने अपना समर्थन प्रदान किया है। इस दिन विश्व स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कई समुदाय और एनजीओ, पृथ्वी सप्ताह का समर्थन करते हुए पूरे सप्ताह विश्व के पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर पृथ्वी को बचाने के लिए अनुकरणीय कदम उठा रहे हैं। पृथ्वी दिवस की परिकल्पना में हम उस दुनिया का ख्वाब साकार होना देखते हैं, जिसमें दुनिया भर की हवा और पानी प्रदूषणमुक्त होगा। नदियां अपने बदहाल पर आंसू नहीं बहाएंगी। मिट्टी, बीमारियां नहीं वरन सोना उगलेगी। धरती रहने के काबिल होगी। इस तरह समाज स्वस्थ और खुशहाल होगा। तभी ऐसे दिनों को मनाने की सार्थकता है।

ऐसे आरंभ हुई परंपरा

जब पहला पृथ्वी दिवस मनाया गया, तब यूनाइटेड स्टेट्स के दो हजार से अधिक कॉलेज, यूनिवर्सिटी और हजारों प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल के अनेक समुदायों ने इसमें भाग लिया और शांतिपूर्ण ढंग से पर्यावरण की गिरावट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था। 1970 में पहला पृथ्वी दिवस मनाया गया। तब से 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिवस की परिकल्पना अमेरिकी सीनेटर, जेराल्ड नेल्सन ने की थी। पृथ्वी दिवस एक बहुत ही सफल अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक पहल योजना साबित हुआ है, जिसे भरपूर समर्थन मिला है। जिनमें रिपब्लिकन, डेमोक्रेट, अमीर-गरीब, बड़े-छोटे व्यवसायी, सांसद, मजदूर किसान सभी शामिल हुए। इसके साथ ही स्वच्छ वायु, स्वच्छ पानी और लुप्त हो रही प्रजातियों को संरक्षित करने का अधिनियम पारित किया गया।

वर्तमान दौर में पृथ्वी दिवस को एक पर्व की तरह दुनिया भर में मनाया जाने लगा है। यह हर साल एक अरब से अधिक लोगों के द्वारा मनाया जाता है और एक दिन के दिनचर्या को पर्यावरण के कार्य के लिए समर्पित किया जाता है। वर्तमान में स्वच्छ वातावरण का मुद्दा गंभीर होता जा रहा है, क्योंकि जलवायु में परिवर्तन विनाशकारी रूप धारण करता जा रहा है।

बढ़ रहा है संकट

हमें इस बात को समझना होगा कि ग्लोबल वार्मिंग से पर्यावरण पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में जीवन संपदा को बचाने के लिए पर्यावरण को ठीक रखने के बारे में जागरूक रहना आवश्यक है। जनसंख्या की बढ़ोतरी ने प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक बोझ बढ़ा दिया है। इसलिए इसके संसाधनों के उचित प्रयोग के लिए पृथ्वी दिवस जैसे कार्यक्रमों का महत्व बढ़ गया है। आईपीसीसी अर्थात जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल के मुताबिक 1880 के बाद से समुद्र स्तर 20 प्रतिशत बढ़ गया है, और यह लगातार बढ़ता ही जा रहा है। यह 2100 तक बढ़कर 58 से 92 सेंटीमीटर तक हो सकता है, जो पृथ्वी के लिए बहुत ही खतरनाक है। इसका मुख्य कारण है ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियरों का पिघलना, जिसके करण पृथ्वी जलमग्न हो सकती है। आईपीसीसी के पर्यावरणविदों के अनुसार 2085 तक मालदीव पूरी तरह से जलमग्न हो सकता है।

पृथ्वी दिवस की महत्ता

पृथ्वी दिवस का महत्व मानवता के संरक्षण के लिए बढ़ जाता है, यह हमें जीवाश्म ईंधन के उत्कृष्ट उपयोग के लिए प्रेरित करता है। इसको मनाने से ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरुकता के प्रचार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जो हमारे जीवन स्तर में सुधार के लिए प्रेरित करता है। ऐसे आयोजन ऊर्जा के भंडारण और उसके महत्व को बताते हुए उसके अनावश्यक उपयोग के लिए भी हमें सावधान करता है। 1960 के दशक में कीटनाशकों और तेल के फैलाव को लेकर जिस तरह से जनता ने जागरुकता दिखाई थी, उस जागरुकता की वजह से नई स्वच्छ वायु योजना बनी थी। इस वजह से अब जो भी नया विद्युत संयंत्र शुरू होता है, उसमें कार्बन डाइऑक्साइड को कम मात्रा में उत्सर्जित करने के लिए अलग यंत्र लगाया जाता है, जिससे पर्यावरण में इसका कम फैलाव हो और नुकसान कम हो।

पृथ्वी दिवस का आयोजन

इस दिन पूरी दुनिया में लोग पेड़-पौधे लगाते हैं, स्वच्छता कार्यक्रम में भाग लेते हैं और पृथ्वी को पर्यावरण के माध्यम से सुरक्षित रखने वाले विषय से संबंधित सम्मलेन में भाग लेते हैं। सामान्यतः पृथ्वी दिवस के दिन लोगों के द्वारा पेड़ों को लगाकर आस-पास की सफाई करके इसे उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

(विश्व पृथ्वी दिवस की थीम 2019) World Earth Day Theme 2019

हर वर्ष पृथ्वी दिवस की कोई एक थीम निर्धारित की जाती है। इस साल यानी 2019 में पृथ्वी दिवस की थीम है-संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण। देखा जाए तो इस वर्ष पृथ्वी दिवस की थीम में जो कुछ निहित है, वह भारतीय विरासत का ही एक हिस्सा है। इतिहास गवाह है कि सम्राट अशोक ने अपने सभी शिलालेखों पर जीवों पर दया करने की बात लिखवाई थी। जैन, बौद्ध समेत कई धर्मों में प्राणियों पर दया करने का संदेश दिया गया है। धार्मिक निर्देशों के कवच ने ही वन्य जीवों को लंबी अवधि तक बचाए रखा। लेकिन आधुनिक हथियारों का आविष्कार होते ही वन्य जीवों को अपना अस्तित्व बनाए रखना भी कठिन हो गया। हालांकि ब्रिटिश सरकार ने वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए प्रथम कानून वर्ष 1879 में 'वाइल्ड एलीफेंट प्रोटेक्शन एक्ट' नाम से पारित किया था। स्वाधीनता के बाद भी अपने देश में अवैध शिकार और विलुप्त हो रही प्रजातियों की रक्षा के लिए कई कानून बनाए गए। बहरहाल, जैव विविधता विलोपन के भविष्य के सारे अनुमान इस गणित पर आधारित हैं कि यदि किसी वन्य जीव के प्राकृतिक वास को 70 प्रतिशत कम कर दिया जाए तो वहां निवास करने वाली 50 प्रतिशत प्रजातियां विलोपन की स्थिति में पहुंच जाएंगी। विलोपन के इसी भूगोल से ज्ञात होता है कि यदि विनाश की गति यथावत रही तो आने वाले 25 वर्षों में 10 प्रतिशत प्रजातियां पृथ्वी से विलुप्त हो जाएंगी। भारतीय उपमहाद्वीप में वन्य जीवों की कुछ ऐसी दुर्लभ प्रजातियां हैं, जो विश्व में अन्यत्र नहीं पाई जाती हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि पर्यावरण संतुलन में वन्य जीवों की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण होती है।

अपने देश में बढ़ा संकट

भारतवर्ष जैव संपदा की दृष्टि से समृद्धतम देशों में से एक है। विश्व में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों के लगभग 40 प्रतिशत जीव-जंतु भारत में पाए जाते हैं। लेकिन इंसानी लालच और वनों के कटाव की वजह से उक्त प्रजातियों में बड़ी तेजी से गिरावट आने लगी और कालांतर में कुछ प्रजातियों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। यद्यपि विलोपन एक जैविक प्रक्रिया है लेकिन असमय विलोपन का कारण पर्यावरणीय परिस्थितियों में अवांछनीय परिवर्तन, वन्य जीवों के प्राकृतिक वासों का विनाश, वनों का कटाव और तीव्र गति से बढ़ता औद्योगिकीकरण है।

'राष्ट्रीय प्राकृतिक संग्रहालय', नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तिका 'वर्ल्ड ऑफ मैमल्स' के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इस पुस्तिका के अनुसार भारत में स्तनपायी वन्य जीवों की 81 प्रजातियां संकटग्रस्त हैं। कश्मीरी हिरणों की संख्या घटकर 350 रह गई है। भारतीय गैंडों की संख्या 8,000 से भी कम रह गई है। संपूर्ण विश्व में शेरों की कुल सात नस्लें पाई जाती हैं। हमारे देश में इस शताब्दी के पूर्वार्द्ध में 10,000 शेर थे, जो घटकर आज 2,000 रह गए हैं। बंदर प्रजाति के वन्य प्राणी लुप्तप्राय जीवों की सूची में अंकित किए जा चुके हैं। काले और सफेद तेंदुओं के अस्तित्व पर संकट ज्यादा गहराया है। तो आइए हम सब मिलकर अपनी प्यारी धरती को सुजलाम-सुफलाम बनाने के साथ ही अन्य प्राजतियों के प्राणियों को बचाए रखने का भी संकल्प लें।

पूर्व वर्षों में पृथ्वी दिवस की थीम

हर वर्ष पृथ्वी दिवस की एक अलग थीम होती है और उस थीम के आधार पर ही उस वर्ष उस बिंदु पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। 2007 की पृथ्वी दिवस की थीम का विषय था - संसाधनों को बचाकर इसका इस्तेमाल करना चाहिए, इस तरह आप धरती को सुरक्षित रखने में सहयोग करेंगे। 2008 का थीम था- कृपया पेड़ों को लगाएं और धरती को बचाएं। 2009 का थीम था-पृथ्वी को अगर सुरक्षित नहीं किया तो हम ही नहीं रहेंगे? 2010 का विषय था- अधीन करना इसका अर्थ हुआ कि जो भी संसाधन हमें उपलब्ध हो रहे हैं, उसके अधीन ही रह कर संसाधनों का इस्तेमाल करें। 2011 का विषय था-हवा को स्वच्छ रखें। इसका अर्थ यह हुआ कि जो भी वायू प्रदूषण फैलाने वाले यंत्र हैं, उनको सही तरीके से इस्तेमाल करें ताकि प्रदूषण जनित हवा कम बाहर निकलें। 2012 का विषय था- पृथ्वी को जुटाना अर्थात सभी देश मिलकर पृथ्वी के समक्ष विपदा से बचने के लिए एकजुट होकर प्रयास करें। 2013 का विषय था- जलवायु का परिवर्तित होता चेहरा। 2014 का विषय था-ग्रीन सिटीज। इसका तात्पर्य शहरों को भी हरियाली से जोड़ें। 2015 का विषय था- साफ पृथ्वी और हरियाली से भरी हुई पृथ्वी। 2016 का विषय था- धरती को सुरक्षित रखने के लिए पेड़ बहुत जरूरी हैं, इसलिए इसके बचाव पर जोर देना चाहिए। 2017 में पृथ्वी दिवस की थीम थी-पर्यावरण और जलवायु साक्षरता। 2018 में विश्व पृथ्वी दिवस के लिए थीम था-प्लास्टिक प्रदूषण का अंत। हालांकि ये उद्देश्य बीते वर्षों के हैं लेकिन इन पर अब भी निरंतर प्रयास किए जाने की जरूरत है।

भारत में संकटग्रस्त प्रजातियां

भारत में जो जंतु प्रजातियां संकटग्रस्त हैं उनमें शेर, बाघ, सफेद तेंदुआ, गैंडा, जंगली भैंसा, गंगीय डॉलफिन, लाल पांडा, मालाबार सिवेट, कस्तूरी हिरन, संगाई हिरन, बारहसिंघा, कश्मीरी हिरन, सिंह पूंछ बंदर, नीलगिरि लंगूर, लघु पूंछ बंदर, बबून, चिंपैंजी, औरेंग ऊटैन, कछुआ, पैंगोलिन, सुनहरा सूअर, जंगली गधा, पिगमी सूअर, चित्तीदार लिनसैग, सुनहरी बिल्ली, डुगोंग, सोन चिड़िया, जार्डेन घोड़ा, पहाड़ी बटेर, गुलाबी सिर बत्तख, श्वेतपूंछ बत्तख, टेंगोपान, मगरमच्छ, घड़ियाल, जलीय छिपकली, अजगर, भूरा बारहसिंघा, चौसिंघा हिरन, दलदली हिरन, मास्क हिरन, नीलगिरी हिरन शामिल हैं।

इसे बॉटम बॉक्स बना सकते हैं

छोटे प्रयास-बड़ा महत्व

आज हमारी पृथ्वी अगर रहने के काबिल है तो इसे संरक्षित रखने में उन लोगों का योगदान सर्वोपरि है, जिन्होंने इसके रखवाले बनकर अपना महती योगदान दिया है। सुंदर लाल बहुगुणा ने बरसों पहले इसके संरक्षण की महत्ता को समझते हुए चिपको आंदोलन चलाया था। आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो धरती के रखवाले बनकर इस प्राकृतिक विरासत को संरक्षित कर रहे हैं। इनमें से कुछ लोग अब भी अपने छोटे-छोटे प्रयासों से इस दिशा में सक्रिय हैं।

मालिनी लक्ष्मण सिंह गौड़

इंदौर की महापौर मालिनी लक्ष्मण सिंह को यह गौरव हासिल है कि उन्होंने अपने परिश्रम दृढ़ संकल्प और शहर के सफाई कर्मियों, जिन्हें अब सफाई मित्र कहा जाता है, के सहयोग और नगर वासियों के समर्थन से इंदौर को लगातार 3 वर्षों तक भारत का सबसे स्वच्छ शहर बनाने का कमाल कर दिखाया है।

इंदौर का ट्रैचिंग ग्राउंड जिसकी गंध और वहां जलाए जाने वाले कूड़े के धुएं से कभी आस-पास की कॉलोनियों के लोगों का जीना दूभर था, आज वह पिकनिक स्थल ही नहीं नव विवाहित दंपतियों के लिए प्री-वेडिंग डेस्टिनेशन भी बन गया है। आज शहर की स्वच्छता को देखने देश-विदेश से लोग आ रहे हैं। स्वच्छता की यह सौगात हमारी पृथ्वी की सेहत को दुरुस्त रखने के लिए एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। इंदौर में सफाई रहने का परिणाम यह हुआ है कि यहां हर साल डेंगू और मलेरिया के रोगियों की संख्या धटती जा रही है। निश्चित ही मालिनी गौड़ का योगदान प्रशंसनीय है।

डॉ. प्रकाश छजलानी

इंदौर के प्लास्टिक सर्जन डॉक्टर प्रकाश छजलानी निःशुल्क शल्य चिकित्सा के लिए जाने जाते हैं। लेकिन डॉक्टर छजलानी की एक पहचान यह भी है कि वह मौन रूप से पृथ्वी को हरा-भरा बनाने में अपना विशिष्ट योगदान दे रहे हैं। उनके क्लिनिक पर आने वाले मरीज जब उनसे परामर्श लेकर लौट रहा होता है तो वह उससे कहते हैं कि वह फीस की रसीद के साथ एक पौधा अवश्य ले जाए और अपने घर में उसे जरूर लगाए। अभी तक वह हजारों पौधे निःशुल्क बांट चुके हैं, जो अनेक घरों के प्रांगण में वृक्ष बनकर पृथ्वी के संरक्षण में योगदान दे रहे हैं।

जैकी श्रॉफ

फिल्म अभिनेता जैकी श्रॉफ किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। हाल ही में उनकी एक नई पहचान सबके सामने आई है। वह धरती और धरती पर जीवन को बचाने में अपना योगदान मिशन के रूप में कर रहे हैं। वह रोजाना एक पौधा जरूर लगाते हैं। उन्होंने तुलसी के हजारों पौधे लगाने का काम किया है। फिल्मों के साथ ही उन्हें पौधों की बहुत अच्छी जानकारी है। हर मिलने वालों से वह पौधा खासकर एरिका पॉम और तुलसी लगाने का अनुरोध करते हैं। उनका कहना है कि लोगों को शायद पता नहीं कि सजावटी एरिका पॉम दिन और रात दोनों समय ऑक्सीजन छोड़ता है।

लेखक - अशोक जोशी

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