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WORLD BOOK DAY: शब्दों से ही नहीं, जीवन से जोड़ती हैं किताबें, ‘शेयर अ स्टोरी’ आधारित है इस वर्ष की थीम

किताबों में एक खूबसूरत-मोहक संसार बसा होता है। जिनमें मौजूद शब्दों की पगडंडियों पर चलते हुए हम जीवन के बहुत से जरूरी पाठ सीखते हैं, जीवन को देखने का हमारा नजरिया बदलता है।

WORLD BOOK DAY: शब्दों से ही नहीं, जीवन से जोड़ती हैं किताबें, ‘शेयर अ स्टोरी’ आधारित है इस वर्ष की थीम

किताबों में एक खूबसूरत-मोहक संसार बसा होता है। जिनमें मौजूद शब्दों की पगडंडियों पर चलते हुए हम जीवन के बहुत से जरूरी पाठ सीखते हैं, जीवन को देखने का हमारा नजरिया बदलता है।

लेकिन आधुनिक जीवनशैली में किताबें हमसे छूट-सी गई हैं। ना चाहते हुए भी हम किताबों के साथी नहीं रहे। ऐसा क्यों, कैसे हुआ और किस तरह हम किताबों से अपना रिश्ता फिर से जोड़ सकते हैं, यह जानना जरूरी है।

एक दौर था, जब पढ़ने के शौकीन लोगों की सबसे अच्छी दोस्त किताबें हुआ करती थीं। लेकिन अब लोग किताबों से दूर होते जा रहे हैं। क्या आप भी किताबों से बढ़ती दूरी की इसी उलझन का सामना कर रहे हैं?
शब्दों का साथ पसंद है पर मन स्क्रीन में झांकने में व्यस्त रहता है? बुक्स पढ़ना चाहते हैं, पर पढ़ नहीं पाते? किताबें पढ़ने की शुरुआत तो करते हैं पर चंद पन्नों से आगे नहीं बढ़ पाते? अगर इन सवालों का जवाब हां है तो किताबों से फिर जुड़ने के लिए इन बातों पर गौर कीजिए।

वर्चुअल वर्ल्ड से दूरी

सोशल मीडिया हमारी पढ़ने की आदत को खत्म कर रहा है। स्क्रीन पर आंखें गड़ाए स्क्रॉलिंग करते हुए समय बिताना अब हमारी आदत में शुमार हो चला है। घंटों लैपटॉप या स्मार्टफोन में झांकते हुए हम, इस मायावी जाल में इतना फंस चुके हैं कि समय कब कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता।
हालात ऐसे हो रहे हैं कि किताबें हमारा मुंह ताकती हैं और हम स्क्रीन में झांकते रहते हैं। सबसे पहले वर्चुअल दुनिया में बीत रहे समय और अपने बदलते व्यवहार से जुड़ीं इन सभी बातों को गहराई से समझना होगा।
गौर कीजिए क्योंकि सोशल मीडिया अब जिंदगी का हिस्सा भर नहीं रहा, जिंदगी इसका हिस्सा बनकर रह गई है। तभी तो समय और ऊर्जा दोनों को सोख लेने वाला माध्यम साबित हो रहा है वर्चुअल वर्ल्ड। इससे बाहर आना किताबों की ओर लौटने का पहला कदम साबित होगा।

नियम बनाएं

किसी काम को करते हुए किताबें पढ़ने से बचिए। किताब पढ़ना अपने आप में एक काम है। हां सफर करते हुए या कहीं इंतजार करते हुए समय बिताना हो तो किताबें अच्छी साथी हैं। इसीलिए अपने शेड्यूल में कुछ समय बुक्स पढ़ने के लिए भी तय करें। समय मिलने पर किताब पढ़ लेने वाली सोच से निकलें और किताबों के लिए समय निकालने पर विचार करें।
रात को सोने से पहले या वीकेंड पर कोई किताब पढ़ने का नियम ही बना लें। कुछ दिन इस रूल को फॉलो किया जाए तो यह आदत में शुमार हो जाएगा। जो जिंदगी की कुछ बेहतरीन आदतों में से होगा।
दरअसल, कुछ पढ़ने का मतलब सिर्फ एकेडेमिक बुक्स पढ़ना ही समझा जाता है। किताबों को सिर्फ पढ़ाई का हिस्सा ही मान लिया जाने का यह कॉन्सेप्ट सीखने और समझने की राह में एक बड़ी गलती है। क्योंकि कोर्स से इतर पढ़ी जाने वाली किताबें ही तो हमारी सोच को समृद्ध बनाती हैं। जिन्हें पढ़ना विवशता नहीं होती।
ऑस्कर वाइल्ड का कहना है, ‘जब पढ़ने की मजबूरी ना हो तब आप क्या पढ़ते हैं, यही निर्धारित करेगा कि आप, जब आपके बस में ना हो, तब आप क्या बनेंगे?’ इसीलिए नियत समय दीजिए उन किताबों को पढ़ने के लिए भी, जिन्हें पढ़ना आपको मजबूरी नहीं बल्कि जरूरी लगे।

शेयर करें किताबें

अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और कलीग्स से किताबें शेयर कर सकते हैं। ऐसा करने से पढ़ी जाने वाली किताबों की संख्या भी बढ़ेगी और बुक्स साझा करने के फेर में आपसी संवाद भी बढ़ेगा। इतना ही नहीं पढ़ी गई कॉमन किताब को लेकर आपस में चर्चा भी होगी।

सच यह भी है कि किसी से ली गई किताब को लौटाने की जल्दी हो, तो वो किताब पढ़ी भी जाती है। ‘किताबें मांगने, गिरने, उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे। उनका क्या होगा? वो शायद अब नहीं होंगे।’ ये पंक्तियां गुलजार की एक नज्म का हिस्सा है, जो कि आज के दौर का बड़ा सच है।
ऐसे में किताबों की शेयरिंग रिश्तों में केयरिंग, कम्युनिकेशन और जुड़ाव भी लौटाएगी। यूं भी सभी किताबें खरीदना मुश्किल तो है ही घर में उन्हें सहेजने के लिए जगह बनाना भी आसान नहीं है। ऐसे में बुक शेयरिंग की आदत किताबें पढ़ने की राह खोलेगी ही।
इतना ही नहीं शब्दों का यह साझा संसार अपने साथ और बहुत कुछ लेकर आएगा, जो जिंदगी को खुशनुमा बनाने में मददगार साबित होगा। गुस्ताव फ्लौबेर्ट के मुताबिक, ‘ऐसे मत पढ़ो, जैसे बच्चे पढ़ते हैं, मजे के लिए। या जैसे महत्त्वाकांक्षी पढ़ते हैं, निर्देश के लिए। पढ़ो, जीने के लिए पढ़ो।’

बदलेंगे विचार-व्यवहार

एक शोध के मुताबिक लगभग 60 प्रतिशत लोगों ने यह माना है कि उनके जीवन में अगर कोई बदलाव हुआ है तो वह किताब पढ़ने की वजह से हुआ है। किताब पढ़ने से उनके मन में कुछ बेहतर करने की भावना पैदा हुई और वे खुद में बहुत बड़ा बदलाव देख पाए।
यह सच भी है कि किताबें वैचारिक बदलाव का माध्यम हैं और सही व्यवहार की सीख भी देती हैं। ऐसे में आप भी किताबों को पढ़कर आपके व्यक्तित्व में आए पॉजिटिव बदलावों को नोटिस कर सकते हैं। इससे आपको और किताबें पढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। स्मार्ट गैजेट्स की दुनिया से निकल शब्दों का हाथ थाम खुद को बदलते देखिए।
कहते भी हैं कि किताबें अपने आप में ऐसी पावरफुल तकनीक हैं, जो आपके माइंड को अपग्रेड करती हैं। यूं भी बुक्स को ‘फूड फॉर थॉट्स’ कहा गया है। जॉर्ज आर. आर. मार्टिन के मुताबिक, ‘अपनी धार बनाए रखने के लिए जिस तरह तलवार को पत्थर की जरूरत होती है, उसी तरह दिमाग को किताबों की जरूरत होती है।’

वर्ल्ड बुक-डे का उद्देश्य

  • 23 अप्रैल को यूनेस्को हर साल वर्ल्ड बुक-डे मनाता है। यह खास दिन पहली बार 23 अप्रैल 1995 को मनाया गया था। वर्ल्ड बुक-डे एक उत्सव-सा है, जो इंसान और किताबों के बीच की दूरी को कम करने के लिए मनाया जाता है।
  • बच्चों के साथ ही हर उम्र के लोगों में पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने, रीडिंग, पब्लिशिंग और कॉपीराइट को लोगों के बीच प्रमोट करने के लिए दुनियाभर में बुक-डे मनाने की शुरुआत हुई।
  • किताबें पढ़ने को प्रमोट करने वाला यह सेलिब्रेशन 100 से ज्यादा देशों में उत्साह से मनाया जाता है। हर साल वर्ल्ड बुक-डे के लिए एक खास थीम भी होती है।
  • इस वर्ष यह थीम है ‘शेयर अ स्टोरी’। जो बच्चों, बड़ों, पैरेंट्स यहां तक कि भाई-बहनों को भी आपस में कहानियां शेयर करने और पढ़ने को प्रमोट करने के लिए रखी गई है।

पढ़ने के फायदे

  • आती है सुकून भरी नींद
  • बढ़ती है एकाग्रता और अच्छी याद्दाश्त
  • सुधरती है दिमागी सेहत
  • बदलता है व्यवहार
  • होती है बेहतर भाषा शैली
  • बढ़ती है एनालिटिकल स्किल्स
  • विकसित होती है पॉजिटिव सोच
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