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Google Trends 2018 / गूगल पर सबसे ज्यादा सर्च हुए धारा 377 को कितना जानते हैं आप

साल 2018 खत्म होने की ओर है। गूगल ने भी इस मौके पर बताया है कि आखिर पूरे साल लोगों ने किन-किन चीजों में अपनी रुचि जाहिर की है। गूगल का कहना है कि भारत में साल 2018 में सबसे ज्यादा धारा 377 के बारे में खोजा गया है। धारा 377 क्या है (What is section 377) गूगल पर सवाल के रूप में सबसे ज्यादा बार खोजा गया है।

Google Trends 2018 / गूगल पर सबसे ज्यादा सर्च हुए धारा 377 को कितना जानते हैं आप
साल 2018 खत्म होने की ओर है। गूगल ने भी इस मौके पर बताया है कि आखिर पूरे साल लोगों ने किन-किन चीजों में अपनी रुचि जाहिर की है। गूगल का कहना है कि भारत में साल 2018 में सबसे ज्यादा धारा 377 के बारे में खोजा गया है। धारा 377 क्या है (What is section 377) गूगल पर सवाल के रूप में सबसे ज्यादा बार खोजा गया है।
लेकिन आपको पता है कि धारा 377 को इतना ज्यादा सर्च क्यों किया गया? आज हम आपको बता रहे हैं धारा 377 के बारे में सबकुछ। सितंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया। समलैंगिकता अपराध है या नहीं, (Homosexuality) सुप्रीम कोर्ट (
Supreme Court
) ने इस मामले पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था।
समलैंगिकता यानी कि समान लिंग के बीच शारीरिक संबंध को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध न ठहराते हुए उसे जायज करार दे दिया। संविधान पीठ ने सहमति से दो वयस्कों के बीच बने समलैंगिक यौन संबंध को एक मत से अपराध के दायरे से बाहर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया था।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा (
IPC
) 377 के उस हिस्से को, जो सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध को अपराध बताता है, उसे तर्कहीन, बचाव नहीं करने वाला और मनमाना बताया। संविधान पीठ में तत्कालीन चीफ जस्‍ट‍िस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस रोंहिटन नरीमन, जस्टिस इंदु मल्होत्रा शामिल थे।

क्या था धारा 377

सुप्रीम कोर्ट के फैसला सुनाने तक आईपीसी की धारा 377 के समलैंगिकता अपराध की श्रेणी में आती थी। इसके तहत 10 साल या फिर जिंदगीभर जेल की सजा का प्रावधान था। वो भी बिना
जमानत के। मतलब अगर कोई महिला या पुरुष इस एक्ट के तहत अपराधी साबित होते हैं तो उन्हें जमानत नहीं मिलेगी।
समलैंगिकता की इस श्रेणी को LGBTQ (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीयर) के नाम से जाना जाता है। इस समुदाय से संबंध रखने वालों की काफी लंबे समय से मांग थी कि भारतीय दंड संहिता की इस धारा में बदलाव किया जाए। धारा 377 कब शुरू हुआ इस एक्ट की शुरुआत लॉर्ड मेकाले ने 1861 में इंडियन पीनल कोड ड्राफ्ट करते समय की थी।
जिसके बाद समलैंगिकता एक अपराध था। जैसे आपसी सहमति के बावजूद दो पुरुषों या दो महिलाओं के बीच यौन संबंध, पुरुष या महिला का जानवरों के साथ यौन संबंध बनाना, या किसी भी तरह की अप्राकृतिक हरकतों को इस श्रेणी में रखा गया था। इसमें गैरजमानती 10 साल या फिर आजीवन कारावास का प्रावधान था। धारा 377 अंग्रेजों के समय से है। 1862 में इसे लागू किया गया था।

धारा 377 को किसने बनाया

ब्रिटेन में 25 अक्टूबर सन् 1800 में जन्मे लॉर्ड मैकाले (Lord Maikale) एक राजनीतिज्ञ और इतिहासकार थे। सन् 1830 में वह ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्य चुने गए। वह 1834 में गवर्नर-जनरल के एक्जीक्यूटिव काउंसिल के पहले कानूनी सदस्य के रूप में भारत में आए थे।

भारत में आने के बाद वह सुप्रीम काउंसिल में लॉ मेंबर और लॉ कमीशन के प्रमुख बनाए गए। इस दौरान उन्हें IPC का ड्राफ्ट बनाने का काम सौंपा गया। जिसमें उन्होंने धारा 377 के तहत समलैंगिकता को अपराध बताया।

भारत में धारा 377 का विवाद

धारा 377 का मुद्दा पहली बार गैर सरकारी संगठन 'नाज फाउंडेशन' ने उठाया था। इस संगठन ने 2001 में दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। जिसके बाद सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे गैरकानूनी करार कर दिया।

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