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चारा घोटाला: लालू को हुई साढ़े तीन साल की सजा, जानिए क्या है चारा घोटाला

दरसअसल यह सारा मामला बिहार सरकार के ख़ज़ाने से ग़लत ढंग से पैसे निकाले जाने का है. बिहार मे पशुपालन विभाग के अधिकारियों और ठेकेदारों ने राजनीतिक मिली-भगत से कई सालों में बिहार सरकार के खजाने से करोड़ों की रक़म साथ निकाली थी

चारा घोटाला: लालू को हुई साढ़े तीन साल की सजा, जानिए क्या है चारा घोटाला

दरअसल यह सारा मामला बिहार सरकार के ख़ज़ाने से ग़लत ढंग से पैसे निकाले जाने का है। बिहार मे पशुपालन विभाग के अधिकारियों और ठेकेदारों ने राजनीतिक मिली-भगत से कई सालों में बिहार सरकार के खजाने से करोड़ों की रक़म साथ निकाली थी इसे पशुपालन घोटाला ही कहा जा सकता है क्योंकि इसमें मामला सिर्फ़ चारे का नहीं है।

घोटाला की जानकारी धीरे-धीरे मिल रही थी लेकिन जांच के बाद पता चला कि ये सिलसिला तो वर्षों से चल रहा था। शुरुआती समय में छोटे-मोटे मामले सामने आये लेकिन बात बढ़ती गई और तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव तक जा पहुंची।

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इस घोटाले में यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि आखिर कितने करोड़ का है यह घोटला? क्योंकि शुरूआत में लगा कि मामला सिर्फ 100-200 करोड़ रुपये का है बाद में यह 900 करोड़ रूपये तक पहुंच गया चूंकि इसकी प्रकिया काफी लंबी है और बिहार में हिसाब रखने में भी काफी गड़बड़ियां हुई हैं।

घोटाला की खबर तब लगी जब बिहार पुलिस ने 1994 में राज्य के गुमला, रांची, पटना, डोरंडा और लोहरदगा जैसे कई कोषागारों से फर्ज़ी बिलों के आधार पर करोड़ों रुपए की कथित अवैध निकासी के मामले दर्ज किए।

इसके बाद गिरफ्तारी का सिलसिला तेजी से बढ़ा और सरकारी कोषागार और पशुपालन विभाग के कई सौ कर्मचारियों का गिरफ्तार कर लिया गया।कई सप्लायरों व ठेकेदारों को हिरासत में ले लिया गया और पूरे बिहार में दर्जन भर आपराधिक मुकदमे दर्ज किये गये।

घोटाले के आकार और राजनीतिक मिली-भगत को देखते हुए बाद में विपक्षी दलों ने इसकी सीबीआई जांच की मांग उठाई, सीबीआई ने इस मामले की जांच की कमान संयुक्त निदेशक यूएन विश्वास को सौंप दी और यहीं से जांच का रूप बदलने लगा।

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जांच के बाद सीबीआई ने बताया कि चारा घोटाले में सभी बड़े अभियुक्तों के संबंध राष्ट्रीय जनता दल और अन्य पार्टियों के शीर्ष नेताओं से रहे हैं।

सीबीआई के मुताबिक पैसा निकाले के लिये पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने चारे, पशुओं की दवा आदि की सप्लाई करने के लिये करोड़ों रूपये के फर्जी बिल बनवाये थे।

जांच के दौरन ज्ञात हुआ कि बिहार के मुख्य लेखा परीक्षक ने राज्य सरकार को समय पर इसकी जानकारी भेजी थी लेकिन बिहार सरकार ने इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया।

बिहार में सरकार की वित्तीय अनियमितताओं की स्थिति कमजोर है कई-कई वर्षों तक विधानसभा से बजट पारित नहीं होता था और राज्य का सारा काम लेखा अनुदान के सहारे ही चलता रहा है।

सीबीआई का दावा है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री को इस मामले की पूरी जानकारी थी और उन्होंने कई मौक़ों पर राज्य के वित्त मंत्रालय के प्रभारी के रूप में इन निकासियों की अनुमति दी थी उसके पास इस बात के दस्तावेज़ी सबूत हैं।

जांच के दौरान सीबीआई ने कहा कि इसको करने में व्यापक षडयंत्र रचा गया था जिसमें राज्य के कर्मचारी, नेता और व्यापारी वर्ग शामिल था।इस मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डॅा. जगन्नाथ मिश्र को भी हिरासत में लिया गया था।

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मामले की कमान सीबीआई के हाथों मे आते ही बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां हुईं और छापे मारे गए।सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाख़िल कर दिया जिसके बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था और बाद में सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिलने तक वे कई महीनों तक जेल में रहे।

मामले को सुळझाने में अनेक बाधाओँ का सामना करना पड़ा था पहले तो इसी पर लंबी क़ानूनी बहस चलती रही कि बिहार से झारखंड अलग हुआ है तो इसके मामलों की सुनवाई पटना हाई कोर्ट में होगी या रांची हाई कोर्ट में।

आखिरकार सीबीआई की अदालत फैसला आ ही गया और लालू प्रसाद यादव को साढ़े तीन साल की सजा सुनाई गई

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