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पर्दे में या पर्दे के बाहर जानिए क्या है मुस्लिम महिला की जिंदगी का मतलब!

दुनिया के अलग अलग देशों में पर्दे में या पर्दे के बाहर एक मुस्लिम महिला की जिंदगी का क्या मतलब है

पर्दे में या पर्दे के बाहर जानिए क्या है मुस्लिम महिला की जिंदगी का मतलब!

दुनिया के अलग अलग देशों में पर्दे में या पर्दे के बाहर एक मुस्लिम महिला की जिंदगी का क्या मतलब है, इस पर नॅार्वे की लेखिका और पत्रकार बिर्गिटे सी हुईफेल्ड्ट ने किताब लिखी है जिसमें वह विभिन्न देशों से मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को दिखाया गया हैं।

मिस्त्र में असल आजादी कि जरूरत

मिस्त्र में असल आजादी कि जरूरत किताब शुरू होती है नवल ए सादावी के साथ जो डॅाक्टर, लेखिका और महिला अधिकारों की जानी मानी पेरोकार हैं।

मध्य़पूर्व की महिलाएं अपनी लड़ाई में ब़़ड़ा मुकाम हासिल करने में अब तक क्यों नाकाम रही हैं इस पर वो कहती हैं कि जो पित्रसतात्मक साम्राज्यवादी और सैन्य तंत्र हमारी जिंदगी को तय करता है उसमें महिलाओं को आजादी नहीं मिल सकती। हम पर ताकत और झूठे लोकतंत्र से शासन होता है, न्याय और असल आजादी से नहीं।

अरब समाज में बदलाव को इंकार

फेल्ड्ट की किताब में वह कहती हैं कि अरब समाज में बदलाव को इंकार किया जाता है क्योंकि जो भीड़ का हिस्सा नहीं हैं उसे नास्तिक या असामान्य मान लिया जाता है।

सरकार और पुलिस को खतरा माना

लोगो की इच्छा है लोकतंत्र ईरानी वकील शिरीन एबादी ने अपना जीवन महिलाओं, बच्चों और शरणार्थियों के अधिकारों की लड़ाई में लगा दिया है। अपने देश में वो सरकार और पुलिस के लिए खतरा मानी जाती हैं।

2003 में उन्हें शंति का नोबेल पुरस्कार मिला। वह कहती हैं लोकतंत्र पूर्व और पश्चिम को नहीं जानता, लोकतंत्र लोगों की इच्छा है इसलिए मैं लोकतंत्र के अलग अलग मॅाडल को नहीं मानती ।

निश्चित रूप से कब्जा जो है वो पुरूषों का

इस्त्राएल और फलस्तीन के बीच शांति निश्चित रूप से कब्जा जो है वो पुरूषों का है खासतौर से सैन्य कब्जा इजरायल और फलस्तीन के बीच जो विवाद है वह परूषों का बनाया है और हम महिलाओं को इसे खत्म करना है।

यहूदी शरणाआर्थियों के बारे में कुछ विवादित बयान देने के बावजूद अशरावी ने इजरायल और फलस्तीन के बीच शांति के लिए अहम योगदान दिया है

यमन में महिलाओं से डरते पुरूष

महिलाओं अधिकारों की पैरोकार अमाल बाशा यमन कि हैं। उनके देश को 2016 में संयुक्त राष्ट्र के लैंगिक समानता सूचकांक में सबसे नीचे रखा गया था।

वह कहती हैं कि महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक और सांस्र्कृतिक अधिकारों पर शरियत कानून के जरिए रोक क्यों लगाई जाती है। उनका कहना है कि पुरूष डरते हैं क्योंकि महिलाएं शांति की आवाज हैं, उनकी जंग में कोई दिलचस्पी नहीं है।

महिला-पुरूष दोनों को अपना रवैया बदलना होगा

लीबिया की हाजर शरीफ संयुक्त राष्ट्र की सलाहकार समिति और कोफी अन्नान फाउंडेशन की सदस्य है कि लीबिया में गृह युद्ध को खत्म करने के लिए महिला पुरूष , दोनों को अपना रवैया बदलना होगा।

उनका कहना है कि अगर आप घरों पर नज़र डालेंगे तो मांएं अपने बेटों को जंग में भेजती दिखेंगी। अगर वे खुद हथियार लेकर नहीं चल रहीं तो भी निश्चित रूप से वे लीबिया में जो हिंसा का चक्र है उसमें योगदान दे रही हैं।

जॅार्डन में इज्जत के नाम पर हत्या

जॅार्डन की राना हुसैन एक महिला अधिकारवादी, मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और एक खोजी पत्रकार भी हैं। जिनकी रिपोर्टों ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर रोशनी डाली है।

इज्जत के नाम पर हत्या के बारे में उनका कहना है, कि समाज हर चीज के लिए महिलाओं को जिम्मेदार बताता है, बलात्कार के लिए, उत्पीड़न के लिए, लड़कियों को जन्म देने के लिए और यहां तक कि पुरूषों के व्यभिचार और धोखेबाजी के लिए भी।

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