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'तलाकशुदा महिलाओं की जिंदगी राम भरोसे'

देश में तीन तलाक के मुद्दे पर छिड़ी बहस के बीच सियासत भी गरमाई हुई है।

देश में तीन तलाक के मुद्दे पर छिड़ी बहस के बीच सियासत भी गरमाई हुई है। ऐसे में सामने आए एक सर्वे में प्रमुख रूप से चार धर्मो हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समाज में तलाकशुदा महिलाओं के हालात को पेश किया गया है, जिसमें खासकर तलाकशुदा 91 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी बेहद कठिन बताई गई है, जिनकी संख्या पुरुषों के मुकाबले 3.5 गुणा ज्यादा है।

देश में एक समान कानून लागू करने की दिशा में आगे बढ़ती मोदी सरकार के सामने समान नागरिक संहिता और तीन तलाक के मुद्दे पर गरमाती राजनीति के बीच एक बहस छिड़ी हुई है और सुप्रीम कोर्ट भी खासकर तीन तलाक को लेकर गंभीर नजर आ रही है।

हालांकि वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि मुस्लिमों से ज्यादा हिंदू महिलाएं तीन गुणा तलाकशुदा जिंदगी जीने को मजबूर हैं, लेकिन देश में कुछ तथाकथित सेक्युलर सियासी दल इस मुद्दे पर मुस्लिमों की राजनीति करने से कोई हिचक नहीं कर रहे हैं।

जब तीन तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट, केंद्र सरकार और सियासी दलों के अलावा मुस्लिम संगठन आए दिन अपनी दलील देने में लगे हैं तो ऐसे में एक निजी संस्था के सामने आए सर्वे रिपोर्ट में तलाक को लेकर हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय में जो खुलासा किया गया है वह चौंकाने वाला है।

राष्ट्रीय स्तर पर पेश हुई इस सर्वे रिपोर्ट में पुरुषों की तुलना में तलाकशुदा महिलाओं की संख्या कहीं जयादा है। यानि एक हजार में 3.1 विवाहित महिलाएं तलाकशुदा हैं तो पुरुष 1.6 की संख्या में आते हैं। मसलन यह आंकड़ा इस बात की पुष्टि करता है कि पुरुषों के पास दूसरी शादी करने के ज्यादा विकल्प हैं।

ये है तलाकशुदा जिंदगी

जहां तक तलाकशुदा संख्या का सवाल है उसमें शादी के बाद 3.44 लाख हिंदू पुरुष और उससे कहीं ज्यादा 6.18

लाख हिंदू महिलाएं अलग-अलग रह रही हैं। जबकि तलाक के बाद 57,537 मुस्लिम पुरुष अलग रह रहे है तो 2.12 लाख मुस्लिम महिलाएं तलाक के कारण अलग रहकर अपनी कठिन जिंदगी जीने को मजबूर हैं।

जबकि ईसाई धर्म में इस श्रेणी में 18,449 पुरुष और 37,406 महिलाएं शामिल हैं। जबकि सिख समाज में 13,732 महिलाओं की तुलना में 19,155 पुरुष तलाकशुदा हैं। मसलन सिख समुदाय ही ऐसा है जहां महिलाओं की तुलना में पुरुष तलाकशुदा जिंदगी जीने को मजबूर हैं, जबकि बाकी तीन समुदाय में पुरुषों के मुकाबले तलाकशुदा महिलाओं की संख्या कई गुणा ज्यादा है।

ऐसे टूट रही हैं जोड़ियां

देश में चार प्रमुख धर्माे के आधार पर पुरुषों और महिलाओं में तलाक लेने की दर में बढ़ोतरी देखी गई है। रिपोर्ट के अनुसार प्रति एक हजार विवाहित लोगों के हिसाब से हिंदू पुरुष 1.5 और महिला 2.6, तो मुस्लिमों में पुरुष 1.6 तोमहिला 5.6 की दर से तलाकशुदा हैं। इसी प्रकार ईसाई धर्म में यह आंकड़ा 2.9 पुरुष और 5.7 महिला का है। जबकिसिख समुदाय में बाकी तीनों धर्मो के मुकाबले यह आंकड़ा विपरीत है,

जिसमें प्रति एक हजार में 2.9 पुरुष और 5.7 महिलाएं बताई गई हैं। मुस्लिम और ईसाई महिलाओं में तलाक लेने की दर कमोबेश एक समान है, लेकिन मुस्लिम पुरुषों की तुलना में मुस्लिम महिलाओं की तलाक लेने की दर 3.5 गुणा ज्यादा है, जबकि ईसाई धर्म में पुरुषों कीतुलना ईसाई महिलाओं की तलाक लेने की दर 1.9 गुणा ही अधिक है।

मौखिक तलाक बड़ा कारण

इस सर्वे रिपोर्ट में खासकर मुस्लिम समाज में तलाक के कारण 91 फिसदी महिलाएं कठिन जिंदगी जीने को मजबूर है,तो इसका सबसे बड़ा कारण मौखिक तलाक है। रिपोर्ट के अनुसार देश में मुस्लिम समुदाय में मौखिक रूप से 65.9 फीसदी तलाक लिया जा रहा है,

जबकि पत्र के जरिए केवल 7.6 फीसदी तलाक के मामले सामने आए हैं। फोन के जरिए 3.4 और ईमेल व एसएमएस के जरिए 0.8 फीसदी तलाक लिये गये हैं। मुस्लिम समाज में शरई कानून जैसे अन्य तरीकों के जरिए तलाक लेने की दर 22.3 फीसदी रही है।

शादीशुदा लोगों की आबादी

देश के इन चार प्रमुख धर्मो के आधार पर विवाहित लोगों की संख्या में शादीशुदा 23.4 करोड़ हिंदू पुरुषों के मुकाबले 23.8 करोड़ हिंदू महिलाएं विवाहित है। जबकि मुसलमान पुरषों में 3.6 और महिलाएं 3.8 करोड़ विवाहित हैं। इसी प्रकार ईसाई धर्म में 60 लाख पुरुष और 70 लाख महिलाएं शादीशुदा हैं,

तो सिख समुदाय में यह आंकड़ा 50-50 लाख का दर्शाया गया है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने पिछले दिनो 2011 की जनगणना के आंकडों ने मोदी सरकार की चिंता बढ़ाई थी, जिसमें तलाकशुदा महिलाओं में 68 फीसदी हिन्दू और 23.3 फीसदी मुस्लिम शामिल थी।

सुप्रीम कोर्ट में मामला

सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक को प्रतिबंधित किये जाने की मांग को लेकर दायर की गयी याचिका के बाद राष्ट्रीय मुस्लिम पर्सनला लॉ बोर्ड और प्रमुख मुस्लिम संगठनों ने भी सर्वे किया है, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राष्ट्रीय विधि आयोग को सर्वे का ब्यौरा सौंपा है,

लेकिन तीन तलाक को शरई कानून के तहत जरूरी बताया है तो समान नागरिक संहिता का विरोध किया है। मोदी सरकार तीन तलाक और समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर गंभीर है और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को अपने जवाब में एक देश-एक कानून का हवाला देते हुए अपनी दलील पेश की है।

क्या कहते हैं आंकड़े

देश की मुस्लिम आबादी वाले इलाकों की करीब 16 फैमिली कोर्ट के आंकड़ों पर गौर की जाए तो इसी माह वर्ष 2011 से 2015 की मई तक सामने आए तथ्य भी चौंकाने वाले रहे। इस रिपोर्ट के मुताबिक इन जिलों में जहां 1307 तलाक के मामले मुसलमानों के यहां पेश आए,

वहीं हिंदुओं में ये संख्या 16,505 थी। ईसाइयों के यहां 4827 हैं, जबकिसिख के यहां 8 मामले मिले हैं। इस रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया था कि हाल के कुछ सालों में तीन तलाक के मुद्दे को जानबूझकर राजनीतिक रंग दिया गया है, जब कि देश में महिलाओं से जुड़े अनेक मुद्दों में दहेज, घरेलू हिंसा, बाल विवाह और भूर्ण हत्या जैसे संगीत मुद्दे भी हैं जिनके कारण तलाक की नौबत आ जाती है।

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