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''तीन तलाक'' पर मुस्लिम महिलाओं को मिलेगा न्याय!

देश में मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम-1939 के अनुसार मुस्लिम महिला(पत्नी) को कई आधारों पर तलाक पाने का अधिकार दिया गया है।

नई दिल्ली. देश में मुस्लिम समाज में पति-पत्नी के बीच संबन्ध विच्छेद करने वाली परंपरा ‘तलाक-तलाक-तलाक’ को लेकर भले ही सुप्रीम कोर्ट संवैधानिकता को लेकर अध्ययन कर रहा हो, लेकिन देश की करीब 92 फीसदी मुस्लिम महिलाएं इस मौखिक तलाक के खिलाफ है। वहीं केंद्र सरकार की धार्मिक समुदाय और सेक्स जनगणना की वैवाहिक स्थिति पर जारी रिपोर्ट भी चिंताजनक है, जिसमें 67 प्रतिशत महिलाएं तलाक के बाद अलग रहने का जिक्र किया गया है। दरअसल एक दिन पहले ही शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यी बैंच ने तीन बार तलाक को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नोटिस जारी करके केंद्र सरकार और आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से फिर इस मामले में उनकी प्रतिक्रिया मांगी है। हालांकि उन्होंने संकेत दिये हैं कि बिना तलाक लिए मुस्लिम समाज में कई-कई शादियों के मामले की भी अदालत जांच करके किसी ठोस निर्णय लेगा।
निम्नलिखित रूपों में तलाक
हालांकि सीजेआइ ने देश में मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम-1939 के अनुसार मुस्लिम महिला(पत्नी) को कई आधारों पर तलाक पाने का अधिकार दिया गया है, जिसमें पति द्वारा तीन साल से अपने वैवाहिक दायित्वों का निर्वाह न करना, पति द्वारा क्रूरता का व्यवहार करना या चार साल से गायब रहना अथवा सात साल से ज्यादा जेल में रहने के अलावा दो साल तक भरण-पोषण न करना जैसे कई कारण शामिल हैं। अदालत भी मानती है कि मुस्लिम समुदाय के विवाह से संबंधित प्रचलित मुस्लिम कानून ही लागू होते है। जहां तक उनके तलाक का संबंध है, मुस्लिम पत्नी को तलाक के बहुत सीमित अधिकार प्राप्त हैं। अलिखित और पारंपरिक कानूनों में निम्नलिखित रूपों में तलाक के बहुत सीमित अधिकार प्राप्त हैं।

मौखिक तलाक के खिलाफ महिलाएं
पिछले दिनों एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में देश की करीब 92 फीसदी महिलाओं ने मौखिक रूप से तीन बार तलाक बोलने से पति-पत्नी का रिश्ता खत्म होने के नियम एकतरफा करार दिया है, जिस पर प्रतिबंध लगाने की मांग तक की गई। है। यही नहीं मुस्लिम समुदाय में स्काइपी, ईमेल, मेसेज और वाट्सऐप के जरिये तीन बार तलाक बोलने की नई तकनीक ने महिलाओं की इन चिंताओं में इजाफा किया है। यह सर्वे मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक, शादी की उम्र, परिवार की आए, भरण-पोषण तथा घरेलू हिंसा जैसे पहलुओं के आधार किया गया है। इस अध्ययन में यह तथ्य भी सामने आए कि महिला शरिया अदालत में विचाराधीन तलाक के मामलों में 80 फीसदी मामले मौखिक तलाक वाले शामिल हैं।
पुरुषो से आगे महिलाएं
केंद्र सरकार की धार्मिक समुदाय और सेक्स जनगणना-2011 पर नजर डाली जाए, तो देश में शादी के बाद तलाक लेने के बाद 48.97 लाख लोगों में से अकेले 67 फीसदी यानि 32.82 लाख महिलाएं हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार देश में 35.35 लाख लोग शादी के बाद अलग रह रहे हैं, जबकि 16.62 लाख लोग तलाक ले चुके हैं। देश में 23.72 लाख महिलाएं शादी के बावजूद अपने पति से अलग रह रही हैं, तो वहीं 11.62 लाख पुरुष शादी के बाद अपनी पात्नियों से अलग रह रहे हैं। जनगणना रिपोर्ट में मुस्लिम समाज की स्थिति बेहत चिंताजनक बताई गई है। मसलन मुस्लिमों की 17.22 करोड़ की आबादी में 22 फीसदी (3.84 लाख) लोग शादी के बाद अलग-अलग रह रहे हैं। जबकि 15 फीसदी (2.69 लाख) लोगों ने तलाक लिया है।
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