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ट्रिपल तलाकः PM से मिलेंगी पीड़ित महिलाएं

एमआरएम की अगुवाई में अगले सप्ताह करीब 150 मुस्लिम समाज की महिलाओं का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेगा।

ट्रिपल तलाकः PM से मिलेंगी पीड़ित महिलाएं

तीन तलाक के मामले पर देश में जारी गंभीर उथल-पुथल के बीच राट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के आनुषांगिक संगठन मुस्लिम राट्रीय मंच (एमआरएम) की अगुवाई में अगले सप्ताह करीब 150 मुस्लिम समाज की महिलाओं का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेगा।

इसमें वो पीएम से लोस व उत्तर-प्रदेश विस चुनावों के दौरान भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में दोनों स्तरों पर सरकार बनने के बाद एक साथ तीन तलाक की प्रथा को समाप्त किए जाने के वादे की याद दिलाते हुए मुसलमानों में दशकों से चली आ रही इस कट्टू रिवायत को जल्द से जल्द खत्म करने के लिए कानून बनाने की अपील करेंगी।

ये सभी महिलाएं किसी न किसी रूप में तीन तलाक से पीड़ित रही हैं। महिलाओं को इस बात का पूरा विश्वास है कि उन्हें पीएम व यूपी के सीएम से इस मामले में जरूर न्याय मिलेगा।

24 अप्रैल को सुको वकीलों संग मंथन

मुस्लिम राट्रीय मंच के राट्रीय संयोजक मोहम्मद अफजाल ने हरिभूमि से बातचीत में कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि तीन तलाक के मामले पर हमारे संगठन की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में पक्ष रखा जाएगा।

24 अप्रैल को एमआरएम के मार्गदर्शक और संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय के मामले से जुड़े अधिवक्ताआें के साथ एक अहम बैठक भी करेंगे। इसमें 11 मई से तीन तलाक पर शुरू हो रही सुनवाई की शुरूआत से ही मंच द्वारा दखल दिए जाने के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्नों पर व्यापक चर्चा की जाएगी।

इसके बाद मंच की 4 से 6 मई तक हरिद्वार में होने वाले अखिल भारतीय राट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी तीन तलाक पर किए गए कार्यों की समीक्षा की जाएगी।

एमआरएम ने इस मामले को लेकर देश में लंबे समय से जनजागरण अभियान चला रहा है। ऐसे में हम चाहेंगे कि यह मामला जल्द से जल्द सुलझे और मुस्लिम महिलाओं को इससे राहत मिले।

बेनकाब होगा दोहरा मापदंड

एमआरएम के अलावा इस मामले में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी एक पक्षकार होगा। हम कुछ तीखे सवालों के जरिए उनके दोहरे मापदंड को बेनकाब करेंगे। इसमें सबसे पहले कोर्ट को दिए एक हालिया हलफनामे पर तर्क होगा।

जिसमें बोर्ड ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम धर्म मेंं निर्णय लेने का अधिकार नहीं होता है। इसके जवाब में एमआरएम पूछेगा कि निकाह करते हुए मुस्लिम महिला को अपनी रजामंदी देने का अधिकार होता है, उसकी हां के बिना शादी नहीं हो सकती है।

तो शौहर द्वारा तीन तलाक देते वक्त वो सवाल क्यों नहीं उठा सकती है? यह बोर्ड का कैसा दोहरा मापदंड है, जिसमें वो शादी के वक्त तो औरत को हामी भरने या न भरने का पूरा अधिकार देता है।

लेकिन जब उसका पति वॉट्सऐप, फोनकॉल, फेसबुक, ट्विटर पर तीन तलाक देकर उसकी जिदंगी को बबार्द कर देता है, तो उसे उफ तक करने का भी अधिकार न दिया जाए।

दूसरा सवाल-बोर्ड द्वारा कुरान शरीफ का हवाला दिया जाना गलत है। कुरान में शुरे बरका आयत में भी यह कहा गया है कि किसी महिला को एक साथ तीन तलाक नहीं दिया जा सकता है।

मुसलमानों के धर्मगुरू हजरत मोहम्मद ने 11 शादियां की थीं। लेकिन उन्होंने अपनी किसी भी पत्नी को तलाक नहीं दिया था। हजरत उमर के जमाने में यह चलन था कि जो व्यक्ति तीन तलाक देगा। उसे सजा के तौर पर 100 कौड़े मारे जाते थे।

बोर्ड से प्रश्न है कि तीन तलाक के बाद वो किन मर्दों को 100 कौड़े मारने का फैसला सुनाएगा व तलाक से बेसहारा हुए बच्चों की देखभाल की क्या बोर्ड जिम्मेदारी लेगा? या सिर्फ उसे इस मामले पर बोलने का अधिकार है, बच्चों की देखभाल करने का नहीं।

तीसरा प्रश्न- शरीयत में दखल कैसे व न्याय के लिए सरकार, कोर्ट के पास क्यों न जाएं महिलाएं? मंच पूछेगा कि शरीयत में तीन तलाक पीड़िता को राहत क्यों नहीं दी गई? जब राहत नहीं दी तो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश मेंकोई भी नागरिक अपना हक लेने के लिए सरकार और कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। इस मामले में भी मुस्लिम महिलाओं ने यही किया है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट व सरकार दोनों को इस प्रकरण में दखल देने का पूरा अधिकार है।

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