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वाराणसी: टूटी सदियों पुरानी परंपरा, पहली बार किन्नरों ने किया पिंडदान

महाभारत काल के बाद किन्‍नरों द्वारा पिंडदान का कोई पुख्‍ता प्रमाण नहीं है।

वाराणसी: टूटी सदियों पुरानी परंपरा, पहली बार किन्नरों ने किया पिंडदान
बनारस. उत्तर प्रदेश के बनारस शहर के पिशाचमोचन कुंड पर शनिवार को देश भर के किन्नरों का जमावड़ा लगा हुआ है। जहां देश भर से काशी आए किन्नर बाबा भोले की इस नगरी में अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के पिंडदान कर रहे हैं। उज्जैन किन्नर अखाड़े के महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के नेतृत्व में पिंडदान किया जा रहा है। आज तक भारत समेत पूरी दुनिया में जितने भी किन्नरों का निधन हुआ है, उनका न श्राद्ध और पिंडदान कभी नहीं कराया गया. इसके चलते उनके पूर्वजों की आत्मा धरती पर भटक रही है। यही वजह है कि किन्नर अखाड़े ने ये सामूहिक पिंडदान का फैसला लिया। इस पिंडदान की प्रक्रिया में 21 ब्राह्मण शामिल हुए।
इस मौके पर उज्जैन किन्नर अखाड़े के लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने कहा कि देश के इतिहास में पहली बार किन्नर समाज ने काशी के पिशाचमोचन कुंड पर अपने पूर्वजों का सामूहिक पिंडदान किया है। काशी में चर्चा का विषय बने रहे किन्‍नरों के इस पिंडदान कार्यक्रम को लेकर आचार्य लक्ष्‍मीनारायण त्रिपाठी ने बताया कि महाभारत काल में शिखंडी ने अपने पितरों का पिंडदान किया था। तब के बाद आज सामाजिक रूप से हमने अपने पितरों का पिंडदान किया है। हमारी कोशिश है, कि हम हर पांचवे साल यहीं आकर अपने पितरों की आत्‍मा की शांति के लिए पिंडदान करें।
बता दें कि महाभारत काल के बाद किन्‍नरों द्वारा पिंडदान का कोई पुख्‍ता प्रमाण नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि मुगलकाल में कुछ किन्‍नरों ने पिंडदान किया था। आज हमने पिशाच मोचन पर जो पिंडदान किया है उससे हमारे पितृ काफी प्रसन्‍न हुए हैं। इसका प्रमाण है इस कार्यक्रम के दौरान लगातार बारिश का होना। मान्‍यता है कि जब पितृ प्रसन्‍न होते हैं तो पानी बरसता है।
त्रिपाठी ने यह भी बताया कि समाज में हमारे बारे में लोग सोचते हैं कि सभी किन्‍नरों का अंतिम संस्‍कार इस्‍लाम धर्म के अनुसार ही होता है, लेकिन ऐसा नही है। हमारी कोशिश होती है कि जो किन्‍नर जिस धर्म का रहा हो, उसका अंतिम संस्‍कार भी उसी के अनुसार किया जाए और हम ऐसा करते भी हैं।

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