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2 जांबाज CBI अधिकारियों ने ढहा दिया राम रहीम का किला

15 साल पहले डेरा के अंदर साध्वियों के साथ हुए यौन उत्पीड़न को पत्रकार राम चंदेर छत्रपति ने उजागर किया था।

2 जांबाज CBI अधिकारियों ने ढहा दिया राम रहीम का किला

बाबा राम रहीम की हकीकत सामने लाने के लिए और रेप मामले में सजा दिलाने में जांबाज सीबीआई अधिकारी सतीश डागर और मुलिंजा नारायणन ने अहम भूमिका निभाई। इन दोनों अधिकारियों ने राम रहीम का पूरा का पूरा किला ही ढहा दिया। और आज उन्हें सजा दिलाने में कामयाब हो गए।

बता दें कि साल 2002 यानि 15 साल पहले डेरा के अंदर साध्वियों के साथ हुए यौन उत्पीड़न को पत्रकार राम चंदेर छत्रपति ने उजागर किया था। 'पूरा सच' नाम का अखबार निकाले वाले छत्रपति ने डेरा का पूरा सच और एक गुमनाम पत्र को अपने अखबार में छाप दिया जिसमें दो साध्वियों के साथ बलात्कार और यौन हिंसा की बात लिखी थी।

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यह गुमनाम पत्र उस वक्त भारत के पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा गया था। अखबार में छापने के कुछ ही समय के बाद पत्रकार राम चंदेर छत्रपति जी पर हमला हुआ और उनकी मौत हो गई। जिसके बाद दो साध्वियों के भाई रंजीत की भी हत्या हो गई।

जिसके बाद सीबीआई के अधिकारी ने अपनी जान को जोखिम में डालकर इस केस को अपने हाथ में लेने का फैसला लिया। आरोप लगाने वाली साध्वियों को बयान दर्ज कराने के लिए सामने लाने सबसे बड़ी चुनौती थी। इस चुनौती को सीबीआई अफसर सतीश डागर ने अपने हाथ में लिया और पीड़ित साध्वियों को खोज निकाला।

पत्रकार राम चंदेर छत्रपति के बेटे अंशुल ने बताया कि एक बार जब लड़ने का फैसला कर घर से निकले तो रास्ते में बहुत से अच्छे लोग मिले। तमाम दबावों के बाद भी कुछ लोगों ने हमारा और साध्वियों का ही साथ दिया था।

यही नहीं सीबीआई के जाबांज़ डीएसपी सतीश डागर न होते तो यह केस अपने मुकाम पर नहीं पहुंच पाता, सतीश डागर ने ही साध्वियों को मानसिक रूप से तैयार किया।

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जबकि एक लड़की का ससुराल डेरा का समर्थक था, जब उसे पता चला कि उसने गवाही दी हो तो उसे घर से निकाल दिया गया। इसके बाद भी लड़कियां तमाम तरह के दबावों और भीड़ के खौफ का सामना करती रहीं।

अंशुल ने बताया कि सतीश डागर पर भी बहुत दबाव पड़ा, मगर वे नहीं झुके, अंशुल ने बताया कि पहले पंचकूला से सीबीआई की कोर्ट अंबाला में थी। जब ये लोग वहां सुनवाई के लिए जाते थे तब वहां भी बाबा के समर्थकों की भीड़ आतंक पैदा कर देती थी।

2007 में सीबीआई के तत्कालीन डीआईजी मुलिंजा नारायणन को राम रहीम का केस बंद करने के लिए सौंपा गया था। मुलिंजा ने बताया कि जिस दिन उन्हें केस सौंपा गया था, उसी दिन उनके वरिष्ठ अधिकारी उनके कमरे में आए और साफ कहा कि यह केस तुम्हें जांच करने के लिए नहीं, बंद करने के लिए सौंपा गया है।

मुलिंजा नारायणन पर केस को बंद करने के लिए काफी दबाव था, लेकिन उन्होंने बिना किसी डर के मामले की जांच की और इस केस को आखिरी अंजाम तक पहुंचाया। मुलिंजा ने बताया कि उन्हें यह केस अदालत ने सौंपा था इसलिए झुकने का कोई सवाल ही था।

सीबीआई ने इस मामले में 2002 में एफआईआर दर्ज की थी। मुलिंजा ने कहा, 5 साल तक मामले में कुछ नहीं हुआ तो कोर्ट ने केस ऐसे अधिकारी को सौंपने को कहा, जो किसी अफसर या नेता के दबाव में न आए।

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जब केस मेरे पास आया, तो मैंने अपने अधिकारियों से कह दिया कि मैं उनकी बात नहीं मानूंगा और केस की तह तक जाऊंगा। बड़े नेताओं और हरियाणा के सांसदों तक ने मुझे फोन कर केस बंद करने के लिए कहा। लेकिन मैं नहीं झुका।

मुलिंजा नारायणन ने बताया, 'मुझे पीड़िता के परिवार के लोगों को मैजिस्ट्रेट के सामने बयान देने के लिए समझाना पड़ा, क्योंकि पीड़िता और उसके परिवार के लोगों को डेरा की ओर से धमकी मिल रही थी।

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