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50 हजार से अधिक शाखाओं की बुनियाद पर खड़ा है संघ, ये है RSS की पूरी जानकारी

जवाहरलाल नेहरू ने सन 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया था।

50 हजार से अधिक शाखाओं की बुनियाद पर खड़ा है संघ, ये है RSS की पूरी जानकारी

अपनी शाखाओं के बुनियाद पर खड़े राष्ट्रीय स्वयं संघ की ख्याति हिन्दुस्तान की सीमा से निकल कर दुनिया के लगभग 80 से अधिक देशों तक फैली हुई है।

अकेले भारत में ही 50 हजार से ज्यादा शाखाएं है। संघ का मानना है कि भारत यदि धर्मनिरपेक्ष है,तो इसकी एक वजह है कि यहां पर हिन्दू बहुमत है। हालांकि उसकी हिन्दूत्व को लेकर उसकी अपनी अलग ही परिभाषा है।

संघ की मान्यता है कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति का नाम है, किसी विशेष पूजा पद्धति को मानने वालों को हिन्दू कहते हों ऐसा नहीं है। हर वह व्यक्ति जो भारत को अपनी जन्म-भूमि मानता है, मातृ-भूमि, पितृ-भूमि मानता है तथा उसे पुण्य भूमि भी मानता है वह हिन्दू है।

हिन्दू संस्कृति वापस लाना मूल उद्देश्य

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भारत को विश्व शक्ति नहीं,अपितु विश्वगुरु बनाने का भाव रखता है और वह भारत में परम वैभव की स्थिति लाना चाहता है।

संघ हमारे खोए हुए हिन्दू संस्कार को वापस लाना इनका मूल उद्देश्य को लेकर काम कर रहा है। वर्ष 1925 में संघ की नींव रखने के बाद से अब तक उसकी उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है

शाखाओं से बना विशाल संगठन

देश में महानगरों से लेकर शहरो कस्बों और गांवों के किसी एक सार्वजनिक स्थानों पर सुबह या शाम के समय एक घंटे के लिये स्वयंसेवकों का परस्पर मिलन होता है। जिसे शाखा कहा जाता है।

कहा जाता है कि शाखा ही संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर आज इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है। शाखाओं की सामान्य गतिविधियों में खेल, योग, वंदना और भारत एवं विश्व के सांस्कृतिक पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा-परिचर्चा शामिल है।

जिससे लोग आपस में वैचारिक और पारस्परिक मेल-जोल बढ़ाते है। संघ में संगठनात्मक रूप से सबसे ऊपर सरसंघ चालक का स्थान होता है जो पूरे संघ का दिशा-निर्देशन करते हैं। सरसंघचालक की नियुक्ति मनोनयन द्वारा होती है।

प्रत्येक सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। संघ के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखा के माध्यम से ही होता है।

संघ की रचनात्मक व्यवस्था

केंद्र

क्षेत्र

प्रान्त

विभाग

जिला

तालुका(तहसील)

नगर

मण्डल

शाखा

अब तक के सरसंघचालक यानी संघ प्रमुख

डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार प्रसिद्ध नाम डाक्टर साब (1925 - 1940)

माधव सदाशिवराव गोलवलकर प्रसिद्ध नाम गुरूजी (1940- - 1973)

मधुकर दत्तात्रय देवरस प्रसिद्ध नाम बालासाहेब देवरस (1973 - 1993)

प्रोफेसर राजेंद्र सिंह प्रसिद्ध नाम रज्जू भैया (1993- 2000)

कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन विख्यात नाम सुदर्शनजी (2000 - 2009)

डॉ मोहनराव मधुकरराव भागवत (2009 से अब तक -)

शाखाओं के प्रकार

शाखा में व्यायाम, खेल, सूर्य नमस्कार, समता (परेड), गीत और प्रार्थना होती है। सामान्यत: शाखा प्रतिदिन एक घंटे की ही लगती है। शाखाएं कई प्रकार से लगाई जाती है।

प्रभात शाखा: सुबह लगने वाली शाखा को प्रभात शाखा कहते है।

सायं शाखा: शाम को लगने वाली शाखा को सायं शाखा कहते है।

रात्रि शाखा: रात्रि को लगने वाली शाखा को रात्रि शाखा कहते है।

मिलन: सप्ताह में एक या दो बार लगने वाली शाखा को मिलन शाखा कहते है।

संघ-मण्डली: महीने में एक या दो बार लगने वाली शाखा को संघ-मण्डली कहते है।

विदेशों में भी लगती है शाखाएं

विश्व के अन्य देशों में भी शाखाओं का कार्य चलता है, किन्तु यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से संचालित नहीं होता। कहीं भारतीय स्वयंसेवक संघ, तो कहीं हिन्दू स्वयंसेवक संघ के माध्यम से शाखाएं संचालित की जा रही है।

कार्यवाह की देखरेख में लगती है शाखाएं

शाखा में कार्यवाह का पद सबसे बड़ा होता है,जिनकी देखरेख में शाखाओं का संचालन किया जाता है। उसके बाद शाखाओं का दैनिक कार्य सुचारू रूप से चलने के लिए मुख्य शिक्षक का पद होता है।

शाखा में बौद्धिक व शारीरिक क्रियाओं के साथ स्वयंसेवकों का पूर्ण विकास किया जाता है। शाखा में आने वाले स्वयंसेवक कहलाते हैं।

संघ परिवार :

संघ परिवार में ऐसे अनेक संगठन है,जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित है और वे अपने आपको संघ परिवार का सदस्य बताते है। इन संगठनों के शुरूआती वर्षों में इनके प्रारम्भ और प्रबन्धन हेतु प्रचारकों (संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक) को नियुक्त किया जाता था।

संघ के लगभग 50 से ज्यादा संगठन राष्ट्रीय ओर अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है ओर लगभग 200 से अधिक संगठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं। जिसमे कुछ प्रमुख संगठन है जो संघ की विचारधारा को आधार मानकर राष्ट्र और सामाज के बीच सक्रिय है।

जिनमे कुछ राष्ट्रवादी, सामाजिक, राजनैतिक, युवा वर्गों के बीच में कार्य करने वाले, शिक्षा के क्षेत्र में, सेवा के क्षेत्र में, सुरक्षा के क्षेत्र में, धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में, संतो के बीच में, विदेशो में, अन्य कई क्षेत्रों में संघ परिवार के संगठन सक्रिय रहते हैं।

संघ के प्रमुख संगठन

भारतीय किसान संघ

भारतीय मजदूर संघ

सेवा भारती

राष्ट्र सेविका समिति

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद

शिक्षा भारती

विश्व हिन्दू परिषद

हिन्दू स्वयंसेवक संघ

स्वदेशी जागरण मंच

सरस्वती शिशु मंदिर

विद्या भारती

वनवासी कल्याण आश्रम

राष्ट्रीय मुस्लिम मंच

बजरंग दल

अनुसूचित जाति-जनजाति आरक्षण बचाओ परिषद

लघु उद्योग भारती

भारतीय विचार केन्द्र

विश्व संवाद केन्द्र

राष्ट्रीय सिख संगत

विवेकानन्द केन्द्र

संघ शिक्षण वर्ग यानी प्रशिक्षण शिविर

ये वर्ग बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी तो देते ही हैं साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा भी देते हैं। इनके भी प्रकार होते है।

दीपावली वर्ग - ये वर्ग तीन दिनों का होता है। ये वर्ग तालुका(तहसील) या नगर स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दीपावली के आस पास आयोजित होता है।

शीत शिविर या (हेमंत शिविर) - ये वर्ग तीन दिनों का होता है, जो जिला या विभाग स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दिसंबर में आयोजित होता है।

निवासी वर्ग - ये वर्ग शाम से सुबह तक होता है। ये वर्ग हर महीने होता है। ये वर्ग शाखा, नगर या तालुका(तहसील) द्वारा आयोजित होता है।

संघ शिक्षा वर्ग : प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष - कुल चार प्रकार के संघ शिक्षा वर्ग होते हैं। प्राथमिक वर्ग एक सप्ताह का होता है, प्रथम और द्वितीय वर्ग 20-20 दिन के होते हैं, जबकि तृतीय वर्ग 25 दिनों का होता है।

प्राथमिक वर्ग का आयोजन सामान्यत: जिला करता है, प्रथम संघ शिक्षा वर्ग का आयोजन सामान्यत: प्रान्त करता है, द्वितीय संघ शिक्षा वर्ग का आयोजन सामान्यत: क्षेत्र करता है। परन्तु तृतीय संघ शिक्षा वर्ग हर साल नागपुर में ही होता है।

बौद्धिक वर्ग - ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका(तहसील) आयोजित करता है।

शारीरिक वर्ग - ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है।

सामाजिक सेवा और सुधार हिन्दू धर्म में सामाजिक समानता के लिये संघ ने दलितों व पिछड़े वर्गों को मन्दिर में पुजारी पद के प्रशिक्षण का पक्ष लिया है। उनके अनुसार सामाजिक वर्गीकरण ही हिन्दू मूल्यों के हनन का कारण है।

नेहरु भी थे संघ के मुरीद

सन 1962 के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को सन 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया।

सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहां उपस्थित हो गये।

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