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महिलाओं द्वारा मैला ढ़ोने की प्रथा हो बंद, मना करने पर मिलती है धमकियां: ह्यूमन राइट वॉच

प्रमुख ठाकुर जाति के लोग अपने घरों से निष्कासित करने की धमकी भी दी।

महिलाओं द्वारा मैला ढ़ोने की प्रथा हो बंद, मना करने पर मिलती है धमकियां: ह्यूमन राइट वॉच
नई दिल्ली. सोमवार को मानवाधिकार ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें कहा गया है कि देश के कुछ हिस्सों में हिंसा की हुई घटनाओं में महिलाओं द्वारा मैला ढ़ोने की परंपरा बंद होनी चाहिए। 'मानव मल की सफाई, भारत में मैला ढ़ोने की परंपरा और जाति की भेदभाव' नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी। जिसमें भारत में सिर पर मैला ढ़ोने की परंपरा को लेकर रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। सन् 2012 में भोपाल में जब एक रिपोर्ट प्रकाशित किया गया था तब कहा गया कि उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में परिगमा गांव में गंगाश्री 12 अन्य महिलाओं के साथ स्वेच्छा से शुष्क शौचालयों की सफाई करना बंद कर दिया। उसमें कहा गया कि प्रमुख ठाकुर जाति के लोग अपने घरों से निष्कासित करने की धमकी भी दी।

मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी रिपोर्ट में भारत सरकार से सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने को कहा है। उत्तर प्रदेश के कसेला गांव की गंगाश्री जैसी महिलाएं शौचालयों से मैला उठाती हैं जबकि उनके पुरुष सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफ़ाई करते हैं। कसेला गांव में मैला ढोने की प्रथा सदियों से चली आ रही है और इस काम में लगे लोगों को अब भी अछूत माना जाता है। यह रिपोर्ट गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, और उत्तर प्रदेश में नवंबर 2013 और जुलाई 2014 के बीच किए गए ह्यूमन राइट्स वॉच के शोध पर आधारित है और 135 से अधिक साक्षात्कार आयोजित किए गए।

यूपी के ही एटा ज़िले की मुन्नीदेवी का कहना है कि उन्हें इस काम के लिए कोई पैसा नहीं मिलता है। उन्होंने कहा कि कभी वे मुझे दो रोटी देते हैं और कभी एक। एक घर से तो मुझे दो-तीन दिन से कुछ भी नहीं मिला तो मैंने वहां जाना छोड़ दिया। जब वे मुझे कुछ भी नहीं देते हैं तो मैं वहां क्यों जाऊं? उन्होंने आकर मुझे धमकी दी कि अगर तुम नहीं आई तो हम तुम्हें अपनी ज़मीन पर नहीं रहने देंगे। तुम्हें अपने जानवरों के लिए चारा कहां से मिलेगा। तुम्हारी भैंसें के मालिक हम हैं। मुझे जाना पड़ा क्योंकि मेरे पास कोई चारा नहीं था।

नीचे की स्लाइड्स में पढ़िए, भारत में मैला ढ़ोने की प्रथा पर अन्य जानकारी-
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