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दिल्ली: ''तीन मूर्ति'' चौक बना ''तीन मूर्ति हाईफा'' चौक, इस वजह से बदला गया नाम

इजरायली पीएम बेंजमिन नेतन्याहू के भारत आते ही दिल्ली का तीन मूर्ति चौक अब ''तीन मूर्ती हाईफा'' चौक होने जा रहा है।

दिल्ली:

इजरायली पीएम बेंजमिन नेतन्याहू के भारत आते ही दिल्ली का तीन मूर्ति चौक अब 'तीन मूर्ती हाईफा' चौक होने जा रहा है। दिल्ली के तीन मूर्ति चौक का इजराइल के साथ ऐतिहासिक संबंध है। बता दें इस स्मारक की ये तीनों मूर्तियां भी दोनों देशों के बीच के संबंध की गवाह हैं।

तांबे की बनी ये मूर्तियां इजरायल में बच्चों को भारत का शौर्य समझातीं हैं। मूर्तियां (हैदराबाद, जोधपुर और मैसूर लेंसर्स को रि-प्रेजेंट करती हैं)। ये तीनों 15 इम्पिरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड का हिस्सा भी रह चुकीं हैं।

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बदला गया चौक का नाम

गौरतलब है कि इजराइली प्रधानमंत्री के आने के बाद ऐतिहासिक युद्ध के लिए तीन मूर्ति चौक अब इजरायल के शहर हाइफा के नाम पर तीन मूर्ति हाइफा चौक कहलाएगा।

लेंसर्स पर केन्द्रित मूर्तियां

तीन मूर्ति चौक का इजराइल के साथ ऐतिहासिक संबंध है। तीन मूर्ति स्मारक की तीनों मूर्तियां तांबे की बनी हैं, जो हैदराबाद, जोधपुर और मैसूर लेंसर्स को रि-प्रेजेंट करती हैं। ये तीनों 15 इम्पिरियल सर्विस कैवलरी ब्रिगेड का भी हिस्सा रह चुके हैं।

हाईफा शहर में लड़ी गई थी जंग

इजरायल के हाईफा शहर में 23 सितंबर 1918 को जंग लड़ी गई थी। हाइफा युद्ध में राजपूताने की सेना का नेतृत्व जोधपुर रियासत के सेनापति दलपत सिंह ने किया था। इस लड़ाई में जोधपुर की सेना के करीब 900 सैनिक शहीद हुए थे।

फ्लैग स्टाफ हाउस बनवाया

राठौड़ों की इस बहादुरी से प्रभावित होकर भारत में ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ ने फ्लैग-स्टाफ हाउस के नाम से अपने लिए एक रिहायसी भवन का निर्माण करवाया।

बहादुरी को यादगार बनाया

इस चौराहे के बीच में गोल चक्कर के बीचों बीच एक स्तंभ के किनारे तीन दिशाओं में मुंह किए हुए तीन सैनिकों की मूर्तियां लगी हुई हैं। ये मूर्तियां रणबांका राठौड़ों की बहादुरी को यादगार बनाने के लिए बनाई गई थी।

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हर साल मनाते हैं हाईफा दिवस

हर साल 23 सितंबर को भारतीय योद्धाओं को सम्मान देने के लिए हाइफा के मेयर, इजरायल की जनता और भारतीय दूतावास के लोग एकत्र होकर 'हाईफा दिवस' मनाते हैं। भारतीय सेना भी 23 सितंबर को 'हाईफा दिवस' मनाती है।

इजराइल करता है समाधियों की देखरेख

बता दें कि इजरायल की सरकार आज तक हाइफा, यरुशलम, रमल्लाह और ख्यात के समुद्री तटों पर बनी 900 भारतीय सैनिकों की समाधियों की अच्छी तरह देखरेख करती है।

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