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शिक्षक दिवस 2018: सिन्हा बोले- मेरे माता-पिता ने मुझे मजदूरी करके पढ़ाया, मैं सभी चुनौतियों को पार करके मंजिल तक पहुंचा

शिक्षक दिवस के अवसर पर यहां बुधवार को राजधानी में आयोजित एक समारोह में छत्तीसगढ़ के दो शिक्षकों को उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने ‘राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2017’ से सम्मानित किया है।

शिक्षक दिवस 2018: सिन्हा बोले- मेरे माता-पिता ने मुझे मजदूरी करके पढ़ाया, मैं सभी चुनौतियों को पार करके मंजिल तक पहुंचा

शिक्षक दिवस के अवसर पर यहां बुधवार को राजधानी में आयोजित एक समारोह में छत्तीसगढ़ के दो शिक्षकों को उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने ‘राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2017’ से सम्मानित किया है। इसमें बालोद के शासकीय प्राथमिक शाला (चिटोर विकासखंडगुरु) में सहायक शिक्षक ईश्वरी कुमार सिन्हा और बिलासपुर के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (मिट्टुनवागांव) में प्रिंसिपल नरेंद्र कुमार तिवारी शामिल हैं।

हरिभूमि से बातचीत में दोनों शिक्षकों ने कहा कि इतने बड़े मंच पर इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित होना उनके लिए बेहद खुशी और गर्व का पल है। बच्चों को पढ़ाने को लेकर हमारा एक मात्र लक्ष्य मार्ग में आने वाली तमाम बाधाओं को अवसरों में बदलकर केवल आगे बढ़ना ही रहा। इसी की वजह से आज हमें यह ख्याति और सम्मान मिला है। साथ ही शिक्षण कार्य के लिए हमने तकनीक का भी समावेश किया।

इसमें ग्रामीण पृष्ठभूमि और बच्चों का माहौल कभी आड़े नहीं आया। पुरस्कार के रुप में दोनों शिक्षकों को राष्ट्रपति पुरस्कार का एक प्रमाण पत्र, एक रजत पदक और 50 हजार रुपए की धनराशि प्रदान की गई है। कार्यक्रम में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, मंत्रालय में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा, विभागीय सचिव रीना रे और मंत्रालय के तमाम वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

मजदूरी के पैसों से पढ़ा, बनाया मुकाम

बालोद के ईश्वरी कुमार सिन्हा ने कहा, यह पुरस्कार मुझे केवल व्यक्तिगत खुशी प्रदान करने के लिए नहीं है। बल्कि मैं चाहता हूं कि इसके जरिए मेरे काम और स्कूल दोनों की देश में ख्याति बढ़े। मैं खुद एक ग्रामीण पृष्ठभूमि से संबंध रखता हूं। मेरे माता-पिता ने मुझे मजदूरी करके पढ़ाया है। लेकिन मैंने सभी चुनौतियों को पार करके मंजिल को पाया।

आज स्थिति यह है कि हमारे स्कूल में निजी स्कूल में अपने बच्चों को भेजने वाले माता-पिता भी आकर अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए भेजने का अनुरोध करते हैं। इस स्कूल में मैं बीते करीब एक दशक से कार्यरत हूं। इसके लिए मैंने गांव में ही रहने का निर्णय लिया। यहां की परंपरा-संस्कृति, तीज-त्यौहार, बोली को समझा।

आज मैं यहां के प्रत्येक परिवार को जानता हूं, उनके कार्यक्रमों में शामिल होता हूं। इससे मुझे बच्चों और उनके अभिभावकों के मन में स्कूल के प्रति जागरुकता और आकर्षण बढ़ाने में मदद मिलती है। साथ ही उन्हें शिक्षा का महत्व समझाना भी आसान हो जाता है। इसका परिणाम यह हुआ कि मेरी मुलाकात के कुछ समय बाद बच्चों ने काफी बड़ी तादाद में स्कूल आना शुरु कर दिया।

तीसरी से पांचवीं तक बच्चे चलाते कंप्युटर

उन्होंने कहा, तकनीक को सीखने के लिए प्रशिक्षण की बहुत ज्यादा जरुरत नहीं होती है। केवल अपने आप पर भरोसा होना चाहिए। इस स्कूल में कुल 203 बच्चे पढ़ते हैं। इनमें तीसरी से पांचवीं कक्षा तक के बच्चे हिंदी में धड़ल्ले से कंप्युटर पर टाइपिंग कर लेते हैं। बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाने, उच्चारण सुधारने के लिए हमारी रोजाना होने वाली प्रार्थना सभा अहम भूमिका निभाती है।

यह एक प्रकार से बच्चों के लिए मोटिवेश्नल क्लास की तरह है। इसमें करीब 40 बच्चे बुक रीडिंग के तौर पर भाग लेते हैं। यह सारी चीजें माइक और साउंड सिस्टम पर होती हैं। इस प्रक्रिया में पहली से पांचवीं तक का बच्चा एक साथ बैठता है। आज स्थिति यह है कि हमारा छह साल का बच्चा भी 200 बच्चों को लीड कर लेता है। सभी को आसानी से प्रार्थना, खेलकूद करा सकता है। हमारे स्कूल में लैपटॉप, प्रोजेक्टर, एलईडी, टैबलेट से लेकर 3 कंप्युटर भी हैं।

बच्चे बने डॉक्टर, इंजीनियर

बिलासपुर के नरेंद्र कुमार तिवारी ने कहा, मैं पुरस्कार की खुशी के अलावा अपने भावी लक्ष्यों के बारे में बताना चाहूंगा। अभी यह स्कूल 9वीं से 11वीं तक है। लेकिन मेरा लक्ष्य यह है कि अगले वर्ष 2019 से यहां 12वीं की भी कक्षा शुरु हो जाए। उसके बाद मेरे स्कूल के बच्चे भी डॉक्टर, इंजीनियर और राज्य लोकसेवा आयोग जैसी तमाम प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में भाग लें और चयन के बाद विद्यालय और क्षेत्र दोनों का नाम रोशन करें।

इसके लिए दसवीं से आगे की पढ़ाई के दौरान बच्चों के लिए गेस्ट लेक्चर्स और कोचिंग क्लासेज की व्यवस्था की जाएगी। इसमें बच्चों को पढ़ाने के लिए विषय से जुड़े हुए विशेषज्ञों को स्कूल में लेक्चर देने के लिए बुलाया जाएगा। हमारे 530 बच्चों के इस स्कूल की एक और खास बात यह है कि यहां बच्चों में किताबी ज्ञान को समझाने के अलावा नैतिक गुणों को बढ़ावा देने पर पूरा जोर दिया जाता है।

स्कूल में हमने पुस्तकालय के अलावा खेलकूद, स्थानीय लोकगीत-नृत्य कार्यक्रम कराना व हर्बल गार्डन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देने पर खासा जोर दिया है।

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