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टैक्स बचाना है तो यहां करें निवेश, लॉक-इन अवधि सिर्फ तीन साल

टैक्स सेविंग में आयकर अधिनियम की धारा 80सी का सबसे अधिक लाभ उठाया जाता है

टैक्स बचाना है तो यहां करें निवेश, लॉक-इन अवधि सिर्फ तीन साल
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नई दिल्ली. जनवरी भी लगभग आधा बीतने को जा रहा है, ऐसे में लोगों को आयकर बचाने के लिए निवेश प्लान को अंतिम रूप दे देना चाहिए। वैसे टैैक्स बचाने के लिए सबसे लोकप्रिय निवेश विकल्प आयकर बचाने वाले म्यूचुअल फंड (ईएलएलएस) रहा है।
ईएलएलएस अपने फंड के बड़े हिस्से का निवेश इक्विटी या इक्विटी संबंधी प्रोडक्ट में करते हैं। इसकी लॉक-इन अवधि केवल तीन वर्षों की है साथ ही धारा 80सी के तहत कटौती का लाभ भी मिलता है। यह अकेला ऐसा प्रोडक्ट है जो टैक्स सेविंग के साथ-साथ इक्विटी में लांग टर्म निवेश का लाभ देता है।
टैक्स सेविंग में आयकर अधिनियम की धारा 80सी का सबसे अधिक लाभ उठाया जाता है। इस धारा के तहत आपको कुल आय में कटौती का लाभ मिलता है और इस प्रकार आप टैक्स सेविंग कर पाते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि धारा 80सी के तहत आप अधिकतम डेढ़ लाख रुपए का निवेश कर सकते हैं। वैसे तो धारा 80सी के तहत बचत और निवेश के विकल्पों की भरमार है लेकिन एछरर कई मायनों में अन्य विकल्पों से बेहतर है।
लंबी अवधि में रिटर्न भी अच्छा ऐतिहासिक तौर पर देखें तो एक एसेट क्लास के तौर पर इक्विटी अपेक्षाकृत ज्यादा रिटर्न अर्जित करने में सफल रहता है। यह एसेट क्लास निवेशकों के लिए पैसा बनाने का प्रमुख जरिया माना जाता रहा है।
इसलिए बेहतर
रिटर्न के नजरिए से देखा जाए तो ईएलएलएस का प्रदर्शन लंबी समयावधि में सबसे बेहतर रहा है। लॉक-इन अवधि के नजरिए से भी ईएलएलएस आकर्षक हैं। पीपीएफ की मैच्योरिटी अवधि 15 साल की है, यूलिप की लॉक-इन अवधि 5 साल की है जबकि ईएलएलएस के मामले में यह मात्र 3 साल है।
टैक्स सेविंग के विकल्प
कर-बचत के विभिन्न विकल्प बाजार में मौजूद हैं जिनके लॉक-इन अवधि, रिटर्न की दर और मैच्योरिटी पर टैक्सेशन के नियम भिन्न-भिन्न हैं। एक तरफ जहां ऐसे ज्यादातर विकल्प एक निश्चित रिटर्न की पेशकश करते हैं वहीं कुछ प्रोडक्ट्स मार्केट-लिंक्ड रिटर्न देते हैं। पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएा), नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट (एनएससी), फिक्स्ड डिपॉजिट (5 साल की अवधि वाले), वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (एससीएसएस), कर्मचारी भविष्य निधि (पीपीएफ), होम लोन के मूलधन का रीपेमेंट आदि टैक्स सेविंग के लोकप्रिय विकल्प हैं। इनमें से ज्यादातर विकल्प टैक्स सेविंग के पारंपरिक विकल्प हैं, जिनमें निवेश की अवधि लंबी होती है और ये निश्चित लेकिन कम ब्याज दर की पेशकश करते हैं। कुछ मामलों में इनमें तरलता का अभाव भी होता है साथ ही अर्जित ब्याज पर कर का भुगतान करना होता है।
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