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Swami Vivekananda Jayanti : जब स्वामी विवेकानंद ने अपनी गलती मान कर सजा ले ली, पढ़िए उनकी कहानी

रजनी अरोड़ा | UPDATED Jan 11 2019 7:12PM IST
Swami Vivekananda Jayanti : जब स्वामी विवेकानंद ने अपनी गलती मान कर सजा ले ली, पढ़िए उनकी कहानी
जब भारत देश अंग्रेजों का गुलाम था, उस दौर में भी एक ऐसे महापुरुष हुए, जिन्होंने पूरी दुनिया में भारत का मान बढ़ाया। वे महापुरुष थे- स्वामी विवेकानंद (swami vivekananda)। 12 जनवरी को हर साल उनका जन्म दिवस मनाया जाता है। स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन (Swami Vivekananda Jayanti) राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनका जीवन हम सभी को प्रेरणा देने वाला है। छात्र जीवन में उनका नाम नरेंद्र (Narendra) था। वह बचपन से ही बहुत प्रखर बुद्धिमान, निडर और सत्यवादी थे। उनके जीवन से जुड़ी कई घटनाएं इस बात को प्रमाणित करती हैं। उनके जीवन से जुड़ी अनेक घटनाएं, बच्चों ही नहीं बड़े लोगों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत हैं। यहां हम दे रहे हैं उनके कुछ प्रेरक प्रसंग। 

Swami Vivekananda Jayanti

कभी किसी से नहीं डरे

नन्हे नरेंद्र (swami vivekananda) निडर होने के साथ झूठी बात पर भरोसा भी नहीं करते थे। जब वह आठ साल के थे तो वह अकसर अपने एक दोस्त के घर खेलने जाते थे। अपने दोस्त के घर में लगे एक पुराने पेड़ पर लटक कर झूलना, आस-पास खेलना उन्हें बहुत पसंद था।
 
लेकिन दोस्त के दादा जी को उनके गिरने, चोट लगने का डर लगा रहता था। इसलिए उन्होंने दोनों बच्चों को डराने के लिए एक कहानी गढ़ी कि पेड़ पर एक राक्षस रहता है, जो पेड़ पर चढ़ने वालों को पकड़ लेता है। नन्हे नरेंद्र, दादाजी की बात मानने के लिए उस समय पेड़ से उतर तो गए।
 
लेकिन उनके वहां से जाते ही फिर से पेड़ पर झूलने लगे। उनका दोस्त उन्हें पेड़ से उतरने के लिए कहने लगा। इस पर नरेंद्र बोले, ‘डरो मत दोस्त! अगर इस पेड़ पर राक्षस होता तो मुझे कब का पकड़ लिया होता।’ नरेंद्र की निडरता देखकर कुछ देर बाद उनका दोस्त भी उनके साथ खेलने लगा। 
 

Swami Vivekananda Jayanti

हमेशा सच बोला स्वामी जी ने

स्वामी विवेकानंद (swami vivekananda) बचपन से ही प्रभावी वक्ता भी थे। वह अपनी बातों से लोगों को प्रभावित कर लेते थे। एक बार वह अपने दोस्तों को लंच-ब्रेक में धीमी आवाज में कोई कहानी सुना रहे थे। उन्हें पता ही नहीं चला कि ब्रेक कब खत्म हो गया और टीचर क्लास में आकर पढ़ाने लगे।
 
टीचर ने जब क्लास की एक सीट पर कुछ बच्चों की धीमी आवाज सुनी तो उन सभी को बुलाकर पढ़ाए गए पाठ से प्रश्न पूछने लगे। उनके दोस्त तो कोई जवाब नहीं दे पाए, लेकिन मेधावी नरेंद्र ने सभी सवालों के सही जवाब दिए। इस पर टीचर ने नरेंद्र को छोड़कर उनके साथ के सभी बच्चों को बेंच पर खड़े होने की सजा दी।
 
लेकिन दोस्तों के साथ नरेंद्र (swami vivekananda) भी बेंच पर खड़े होने लगे। टीचर के मना करने पर उन्होंने बिना किसी झिझक के सच बोला कि वे ही तो कहानी सुना रहे थे, उनके दोस्त तो केवल सुन रहे थे। इसलिए सजा उन्हें भी मिलनी चाहिए। 

Swami Vivekananda Jayanti

दृढ़ निश्चयी 

एक बार स्कूल में भूगोल के अध्यापक को यह लगा कि नरेंद्र (Narendra) ने किसी सवाल का गलत जवाब लिखा है। लेकिन नरेंद्र अपने जवाब पर अटल रहे। उनके बार-बार सही जवाब का दावा करने पर भी अध्यापक ने उनकी एक न सुनी। गुस्से में आकर उन्होंने नरेंद्र को सजा दे दी। इस पर भी नरेंद्र ने बगैर कुछ कहे सजा स्वीकार कर ली। बाद में अध्यापक को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने नरेंद्र (swami vivekananda) से माफी भी मांगी।

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