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Swami Vivekananda Jayanti: स्वामी जी ने क्यों कहा था कि भारत के युवाओं को गीता पढ़ने के बजाय फुटबॉल खेलना चाहिए

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Jan 12 2019 12:53AM IST
Swami Vivekananda Jayanti: स्वामी जी ने क्यों कहा था कि भारत के युवाओं को गीता पढ़ने के बजाय फुटबॉल खेलना चाहिए

दुनिया में हिंदू धर्म और भारत की प्रतिष्ठा की बात आए तो स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद एक प्रेरणा के रूप में हैं। उन्होंने ने ही कहा था कि गर्व से कहो हम हिंदू हैं। दिल्ली के रामकृष्ण आश्रम के सचिव स्वामी शांतात्मानंद का कहना है कि स्वामी विवेकानंद ने देश में युवाओं को प्रेरित करने के लिए कई सारे काम किए हैं।

स्वामी जी का मानना था कि विश्व के मंच पर भारत की पुनर्प्रतिष्ठा में अगर कोई सबसे बड़ी भूमिका निभा सकता है तो वो हैं केवल 'युवा'। स्वामी विवेकानंद ने मेधा, तर्कशीलता जैसे गुण थे जो युवाओं को प्रेरणादायी है। नीलमणि दुबे के अनुसार स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था कि युवाओं को गीता पढ़ने के बजाय फुटबॉल खेलना चाहिए। क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही एक स्वस्थ मन रह सकता है। शांतात्मनानंद का यह भी मानना है कि आज कल के युवाओं को स्वामी जी के विचार भाते जरूर है।

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लेकिन ज्यादातर इनको जीवन में नहीं उतारते। लेकिन उन्हें उम्मीद है कि यह संख्या बढ़ेगी। स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता  में विश्वनाथ दत्ता के परिवार में 12 जनवरी 1863 को हुआ था। उनके पिता कलकत्ता हाई कोर्ट में अटॉर्नी थे। उनकी मां एक धार्मिक विचार वाली महिला थीं। विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र था। उन पर मां के धार्मिक और पिता के तर्कसंगत विचारों का काफी असर हुआ था। 

विवेकानंद पढ़ाई में बहुत ही ज्यादा तेज थे। स्कॉटिश चर्च कॉलेज के प्राचार्य डा. विलियम हस्टी ने स्वामी जी के बारे में लिखा है कि मैने कई जगहों पर भ्रमण किया है। लेकिन दर्शन शास्त्रों का ऐसा मेधावी और संभावनापूर्ण छाजत्र कभी नहीं मिला। यहां तक की जर्मन विश्वविद्यालय में भी नहीं। 
 
स्वामी विवेकानंद ने धर्मग्रंथों के अलावा विविध साहित्यों का भी काफी अध्ययन किया है। वह ब्रह्म समाज से थे लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा। एक दिन वह अपने मित्रों के साथ स्वामी रामकृष्ण परमहंस के आश्रम गए। जब वहां स्वामी जी ने भजन गाया तो परमहंस महराज काफी प्रसन्न हुए।
 
 
स्वामी जी ने पूछा कि क्या आप ईश्वर से मुझे मिला सकते हैं। तो परमहंस जी ने हां में जवाब दिया। विवेकानंद जी ने शुरुआत में परमहंस जी को अपना गुरू नहीं माना लेकिन बाद में वह उनके सबसे प्रिय शिष्य बन गए। कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद जैसे शिष्य के कारण ही रामकृष्ण परमहंस को प्रसिद्धि मिली। 
 
1893 का विश्व धर्म संसद में दिया गया उनका भाषण विश्व के मंच पर न केवल हिंदी धर्म बल्कि भारत की भी प्रतिष्ठा स्थापित हुई। ग्यारह सितंबर 1893 को इस संसद में जब उन्होंन अपना संबोधन ‘अमेरिका के भाइयों और बहनों’ से शुरू किया तो काफी देर तक पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा।
 
 
उनके तर्कपूर्ण भाषण से लोग अभिभूत हो गए। हर कोई उन्हें अपने घर बुलाना चाहता था। देश समेत पूरी दुनिया में उन्होंने धर्म प्रचार किया। वह नर सेवा को ही नारायण की सेवा बताते आए हैं। उन्होंने रामकृष्ण मिशन के नाम पर मठ की स्थापना की। चार जुलाई 1902 में बेल्लूर मठ में उन्होंने अपने गुरुभाई स्वामी प्रेमानंद को मठ के भविष्य के बारे में निर्देश दिया और महा समाधि ले ली। 

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