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बिल गेट्स फाउंडेशन के खिलाफ श्वेत-पत्र जारी करेगा SJM

इसमें उनकी भारत की स्वास्थ्य नीति में भूमिका को लेकर चिंता जाहिर की गई है और कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं।

बिल गेट्स फाउंडेशन के खिलाफ श्वेत-पत्र जारी करेगा SJM
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दुनियाभर में एक परोपकारी संस्था के रूप में चर्चित बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन (बीएमजीएफ) की भारत में चल रही गतिविधियों पर सवालिया निशान लगने शुरू हो गए हैं। इसमें ताजा चर्चा बीएमजीएफ की देश की स्वास्थ्य नीति में संदेहास्पद भूमिका को लेकर हो रही है।

इसका आगाज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के आनुषांगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) ने किया है और उनका कहना है कि वो जल्द ही इस पूरे मामले को लेकर एक श्वेतपत्र जारी करेंगे।

इसमें बीएमजीएफ का एक कल्याणकारी संस्था होने के बावजूद देश की स्वास्थ्य नीति में दखल देने की कोशिश व केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान में शामिल की जा रही कुछ दवा कंपनियों के साथ व्यावसायिक रिश्ते होने की पुख्ता संभावना जैसे मुद्दे मुख्य रूप से शामिल किए जाएंगे।

श्वेतपत्र के प्रारूप की खास बातें

स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक डॉ.अश्विनी महाजन ने हरिभूमि से बातचीत में कहा कि हमारा संगठन बीएमजीएफ के खिलाफ एक श्वेतपत्र तैयार कर रहा है। इसमें उनकी भारत की स्वास्थ्य नीति में भूमिका को लेकर चिंता जाहिर की गई है और कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं।

इसके अलावा एसजेएम को ज्ञात हुआ है कि बीएमजीएफ के कुछ दवा बनाने वाली उन कंपनियों के साथ व्यावसायिक रिश्ते भी हैं, जिन्हें सरकार देश में चलाए जाने वाले राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान में शामिल करने की योजना बना रही है।

श्वेतपत्र लाने का उद्देश्य

इस श्वेतपत्र को लाने के पीछे एसजेएम का उद्देश्य सरकार को आमजन के स्वास्थ्य से संबंधित मामले में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध कराना है। इससे उन्हें सही निर्णय लेने में आसानी होगी।

एसजेएम के विशेषज्ञों ने सरकार के टीकाकरण अभियान के तहत बच्चों को डायरिया के लिए लगाए जाने वाले रोटावायरस और डिपथिरिया, टिटनेस, वूपिंग कफ, हेपेटाइटस-बी, हीमोफिलस इनफ्लूएंजा जैसी पांच बीमारियों से बचाने के लिए लगाए जाने वाले एक संयुक्त पेंटावेंलेट वैक्सिन के परीक्षणों को लेकर भी चिंता जाहिर की है।

डॉ.महाजन का कहना है कि जल्द जारी किए जाने वाले श्वेतपत्र के जरिए हम सरकार से अपील करेंगे कि वो अलग-अलग मामलों के साथ रोटावायरस के फील्ड परीक्षणों के डेटा की जानकारी सार्वजनिक करे। इसमें खासकर वेल्लौर के मामलों पर जोर रहेगा।

इस बाबत रोटोवैक क्लिनिकल परीक्षणों की शुरूआत वर्ष 2011 से 2013 के बीच में हुई थी। तब दिल्ली, पुणे और वेल्लौर में कुल 6 हजार 799 नवजात बच्चों पर परीक्षण किए गए थे। इन दोनों वैक्सिन से बच्चों पर कुछ दुष्प्रभाव भी हुए हैं, जिसमें उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता पर गंभीर असर पड़ने की बात कही गई है। मंच का कहना है कि बिना जांच-पड़ताल के किसी दवा को देश में जारी नहीं चाहिए।

बीएमजीएफ ने साधी चुप्पी

इस मामले पर जब हरिभूमि ने बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन का पक्ष जानना चाहा, तो उनकी भारत की मुख्य प्रवक्ता अर्चना व्यास ने कहा कि हमें इस तरह के किसी श्वेतपत्र में बीएमजीएफ को लेकर दी गई जानकारी के बारे में कुछ भी पता नहीं है। इसलिए हम ऐसे किसी विचार या अनुमान पर कुछ भी टिप्पणी नहीं करना चाहेंगे।

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