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समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने वाले अपने फैसले पर पुनर्विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

शीर्ष अदालत ने अपने 2013 के फैसले में आपसी रजामंदी से दो वयस्क समलैंगिकों के यौन संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया था।

समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने वाले अपने फैसले पर पुनर्विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिक सेक्स को अपराध करार देने वाले अपने साल 2013 के फैसले पर पुनर्विचार करने पर आज सहमति जता दी और इस बारे में औपनिवेशिक काल के दंडात्मक प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका को वृहत पीठ को रेफर कर दिया। पीठ ने यह कहते हुए याचिका पर पुनर्विचार करने पर सहमति जताई कि सामाजिक नैतिकता समय के हिसाब से बदलती रहती है।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि ‘लोगों का एक हिस्सा या लोग जो अपनी पसंद का इस्तेमाल करते हैं उन्हें डर की स्थिति में नहीं रहना चाहिये।'

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शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी ने समलैंगिक और ट्रांसजेंडर समुदायों में उम्मीद की किरण जगाई है जो आईपीसी की धारा 377 को निरस्त करने की लंबे समय से मांग करते रहे हैं। आईपीसी की धारा 377 समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखती है।
साल 2013 के फैसले के खिलाफ उपचारात्मक याचिका के शीर्ष अदालत की पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास लंबित होने पर गौर करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि मौजूदा याचिका पर भी वही पीठ सुनवाई करेगी और इस बारे में अंतिम निर्णय हासिल किया जा सकता है कि आपसी रजामंदी से दो वयस्क समलैंगिकों के बीच यौन संबंध को क्या अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा सकता है।
ऑस्ट्रेलिया, माल्टा, जर्मनी, फिनलैंड, कोलंबिया, आयरलैंड, अमेरिका, ग्रीनलैंड, स्कॉटलैंड, लक्जमबर्ग, इंग्लैंड और वेल्स, ब्राजील, फ्रांस, न्यूजीलैंड, उरूग्वे, डेनमार्क, अर्जेंटीना, पुर्तगाल, आइसलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, कनाडा, बेल्जियम, नीदरलैंड जैसे 26 देशों ने समलैंगिक यौन संबंध को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है।
शीर्ष अदालत ने अपने 2013 के फैसले में आपसी रजामंदी से दो वयस्क समलैंगिकों के यौन संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया था।
राजीव धवन, कोलिन गोंजाल्विस, आनंद ग्रोवर, दुष्यंत दवे और कामिनी जायसवाल जैसे विधि विशेषज्ञों ने शीर्ष अदालत के इस आदेश का स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि यह मामला परम सामाजिक और कानूनी महत्व का है और अपने पिछले फैसले पर पुनर्विचार करने पर सहमति जताकर शीर्ष अदालत ने सकारात्मक पहल की है। उनके अनुसार शीर्ष अदालत को इस बारे में अपने पिछले फैसले पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविल्कर और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने यह कहते हुए आदेश दिया कि आईपीसी की धारा 377 की संवैधानिक वैधता को कायम रखने वाले फैसले पर वृहत पीठ द्वारा विचार किये जाने की आवश्यकता है।
पीठ ने यह आदेश रितु डालमिया, होटल कारोबारी अमन नाथ और डांसर एन एस जौहर समेत विभिन्न लोगों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि वृहत पीठ पशुओं और बच्चों के साथ शारीरिक संबंध के बारे में इस दंडात्मक प्रावधान पर विचार नहीं करेगी।
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