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LGBT Case: धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

सीजेआई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीश बेंच ने सोमवार को कहा है कि धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार और जांच करेगा।

LGBT Case: धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

सीजेआई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीश बेंच ने सोमवार को कहा है कि धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार और जांच करेगा। आपको बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बदलते हुए साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने बालिग समलैंगिकों के शारीरिक संबंध को अवैध करार दिया था।

LGBT Case: Three-judge bench of Supreme Court, headed by CJI said, it would reconsider and examine the Constitutional validity of section 377. pic.twitter.com/vyqOnNY2c1

— ANI (@ANI) January 8, 2018

दो व्यस्कों के बीच होने वाले शारीरिक संबंध क्या अपराध हैं, इस पर बहस जरूरी है। अपनी इच्छा से किसी को चुनने वालों को डर के माहौल में नहीं रहना चाहिए। अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार के तहत कानून के दायरे में रहने का अधिकार है।

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सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस ने की ने फैसला देते हुए कहा कि संवैधानिक पीठ आईपीसी की धारा 377 के तहत समलैंगिकता को जुर्म मानने के इस फैसले पर पुनर्विचार और जांच करेगा।

धारा 377 क्या है

आपको बता दें कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377, अध्याय XVI, को भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान 1860 में पेश किया गया था।

इसमें 'प्रकृति के आदेश के खिलाफ' यौन गतिविधियों को आपराध की श्रेणी में रखा गया है। इसमें कहा गया है कि कोई भी स्वेच्छा से प्रकृति के आदेश के खिलाफ किसी भी पुरुष, महिला या पशु के साथ शारीरिक संबंध करता है तो उसे आजीविन कारावास की सजा दी जाएगी।

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इसके साथ ही उसकी कारावास की सजा को बढ़ाया जा सकता है। उसे जुर्माना भी देना होगा। धारा 377 के दायरे में किसी भी प्रकार के यौन शिश्न प्रविष्टि संघ भी आते है।

धारा 377 निरस्त

गौरतलब है कि धारा 377 को निरस्त करने वाले आंदोलन की शुरुआत 1991 में एड्स भावभेद विरोधी आंदोलन के साथ शुरु किया गया था।

2 जुलाई 2009 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने वयस्कों के बीच आम सहमति से की जाने वाली समलैंगिक गतिविधियों को वैध करार दिया और 150 साल पुरानी धारा को बदल दिया।

धारा 377 को खत्म करने की वजह बताते हुए अदालत ने कहा कि धारा का सार संविधान में दिए नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।

बता दें कि 11 दिसंबर 2013 को दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया और परिणामस्वरुप धारा 377 को फिर से पूरी तरह बहाल कर दिया था

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