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धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

इस मामले की अगली सुनवाई 25 अक्टूबर को होगी।

धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को साफ किया कि धर्म और राजनीति को मिक्स नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगा जा सकता है और चुनावी लड़ाई के लिए धर्म का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में सात जजों की बेंच के सामने धर्म के नाम पर वोट मांगने से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा कि इस मामले में संसद ने पिछले 20 साल में कुछ नहीं किया है। चीफ जस्टिस ने कहा कि चुनावी लड़ाई के लिए धर्म का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। धर्म के आधार पर वोट नहीं मांगा जाना चाहिए। अगर चुनावी प्रक्रिया में धर्म को किसी भी तरह से इजाजत दी गई तो चुनाव से संबंधित कानून बेमतलब हो जाएगा।
अदालत ने कहा कि धर्म को परिभाषित करना कोर्ट के सामने मुद्दा नहीं है बल्कि हमारे सामने मुद्दा यह है कि क्या धर्म के नाम पर वोट मांगना जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत भ्रष्ट प्रैक्टिस माना जाएगा? इस दौरान अदालत ने सरकार के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि रेफरेंस 20 साल से पेंडिंग है लेकिन संसद ने इस मामले में कुछ नहीं किया। अदालत ने कहा कि यह भी हो सकता है कि सरकार इस बात का इंतजार कर रही हो कि सेक्सुअल हरैस्मन्ट मामले में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था वही इस मामले में भी हो जाए।
चीफ जस्टिस ने साफ किया कि इस मौके पर कोर्ट धर्म को परिभाषित नहीं करने जा रहा। पहले कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि हिंदुत्व जीवन शैली है। अदालत ने कहा कि धर्म को परिभाषित करना बेहद मुश्किल है। इसका कोई अंत नहीं है। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर तमाम सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य यह है कि धर्म का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। धर्म को राजनीतिक प्रक्रिया से अलग रखना चाहिए। अदालत ने कहा कि वह जानना चाहते हैं कि कानून को इस तरह से क्यों परिभाषित नहीं किया गया है कि धर्म के आधार पर वोट के लिए अपील न हो। चीफ जस्टिस ने कहा कि संविधान की मूल भावना सेक्युलरिज्म की बात करता है। धर्म और राजनीति को मिक्स नहीं किया जा सकता। चुनाव सेक्युलर ऐक्टिविटी है या नहीं? एक सेक्युलर स्टेट में क्या धर्म को सेक्युलर ऐक्टिविटी में लाया जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी उम्मीदवार का कोई समर्थक वोटरों से धर्म के नाम पर वोट की अपील करता है तो क्या ये भ्रष्ट प्रैक्टिस माना जाएगा। बीजेपी उम्मीदवार के वकील श्याम दिवान ने दलील दी कि जहां तक जन प्रतिनिधित्व कानून का सवाल है तो उसकी धारा 123 कहता है कि धर्म के नाम पर वोट मांगना या फिर वोट न देने का अनुरोध करने का मामला सिर्फ उम्मीदवार या फिर उसके विरोधी उम्मीदवार के लिए है यानी और किसी पर यह लागू नहीं होगा। हालांकि उम्मीदवार के समर्थक अगर ऐसा करता है तो भी यह गलत होगा। इस आधार पर विजयी उम्मीदवार का रिजल्ट रद्द हो सकता है। हालांकि समर्थक पर ऐसा करने के लिए किसी कार्रवाई का प्रावधान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि अगर कोई उम्मीदवार वोटर से उनके धर्म के नाम पर वोट मांगता है तो फिर क्या होगा? अदालत का अगला सवाल था कि अगर कोई ऐसा इलाका है जहां सिख वोटर ज्यादा हैं। लेकिन उम्मीदवार हिंदू हैं और कोई सिख नेता वोटरों से किसी उम्मीदवार के फेवर में वोटिंग के लिए धर्म के आधार पर अपील करता है तो फिर क्या होगा? क्या यह भ्रष्ट प्रैक्टिस होगा? कोर्ट ने सवाल किया कि अगर कोई उम्मीदवार अल्पसंख्यकों से वोट मांगता है और कहता है कि वह जीतने के बाद उनकी भलाई करेंगे तो क्या इसे भ्रष्ट प्रैक्टिस माना जाएगा?
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि अगर कोई ज्यूस अपने को अल्पसंख्यक बताते हुए उम्मीदवार को कहते हैं कि हम आपको वोट देंगे और आप हमारा ख्याल करेंगे तब क्या इसे भ्रष्ट प्रैक्टिस माना जाएगा? इस पर श्याम दिवान ने कहा कि ये भ्रष्ट प्रैक्टिस नहीं है। चीफ जस्टिस ने अगला सवाल किया कि अगर कोई उम्मीदवार या फिर उसका प्रचारक राम मंदिर के नाम पर वोट मांगता है तो फिर क्या होगा? अदालत ने टिप्पणी की कि क्या मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए फतवा जारी कर उसे हिंदू उम्मीदवार के फेवर में वोटिंग के लिए कहा जा सकता है? क्या कानून में इसकी इजाजत है? मामले की अगली सुनवाई अब मंगलवार को होगी।
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