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कॉलेजियम: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछे तीखे सवाल

कॉलेजियम ने 37 न्यायाधीशों के नाम सरकार के पास वापस भेजे हैं।

कॉलेजियम: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछे तीखे सवाल
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नई दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को केंद्र सरकार से सवाल किया कि कॉलेजियम की सिफारिशों के बावजूद वह उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों का तबादला क्यों नहीं कर रहा है। न्यायालय ने लंबित तबादलों के बारे में विस्तार से दो सप्ताह के भीतर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश भी केंद्र को दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि उसी उच्च न्यायालय में ऐसे न्यायाधीशों का निरंतर बने रहना ‘अटकलों और भ्रम’ को जन्म देता है। न्यायालय ने कहा कि इन सिफारिशों पर बैठे रहने की बजाय केंद्र को इन पर पुनर्विचार के लिये इन्हें कॉलेजियम को लौटा देना चाहिए। प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी से कहा कि तबादला होने के बावजूद ऐसे न्यायाधीशों का उन्हीं उच्च न्यायालयों में बने रहना अटकलों और भ्रम को जन्म देता है। यदि आपको (केंद्र) इन सिफारिशों से किसी प्रकार की परेशानी है, तो उन्हें हमें वापस भेज दीजिए। हम उन पर गौर करेंगे।
37 न्यायाधीशों के नाम सरकार के पास
इन सिफारिशों पर बैठे रहने का कोई औचित्य नहीं है। न्यायमूर्ति ठाकुर मंगलवार को प्रधान न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हो रहे हैं। वह उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्तियों को लेकर लगातार केंद्र सरकार से सवाल करते रहे हैं और इस मुद्दे पर दोनों (न्यायपालिका और केंद्र) में टकराव की स्थिति बनी हुुई है। अटार्नी जनरल ने कहा कि कॉलेजियम ने 37 न्यायाधीशों के नाम सरकार के पास वापस भेजे है, जिन पर गौर किया जा रहा है। इस पर पीठ ने सवाल किया कि न्यायाधीशों के तबादले का क्या हुआ, जिनके बारे में कॉलेजियम ने सिफारिश की थी? आप इन पर दस महीने से भी अधिक समय से बैठे हैं। रोहतगी ने कहा कि उन्हें तबादलों की सिफारिशें लंबित होने के बारे में आवश्यक निर्देश प्राप्त करने की आवश्यकता है और इसके लिए तीन सप्ताह का वक्त चाहिए। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने कहा कि सरकार के सर्वोच्च विधि अधिकारी के पास ये सारी सूचनाएं होनी चाहिए थीं।
केंद्र की क्या दिलचस्पी है?
जेठमलानी ने कहा कि गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एमआर शाह के तबादले का मामला फरवरी 2016 से लंबित है। उन्होंने कहा कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि सरकार की इस व्यक्ति को वहीं पर रखने में क्या दिलचस्पी है? इससे पहले सुनवाई शुरू होते ही वरिष्ठ अधिवक्ता यतीन ओझा ने कहा कि स्थिति वास्तव में खराब है। मैं खुली अदालत में पत्रकारों और मीडिया की मौजूदगी में बहुत सी बातें नहीं कह सकता। उन्होंने कहा कि न्यायालय को न्याय और इस संस्थान के हित में कोई न कोई आदेश देना चाहिए। पीठ ने अटार्नी जनरल से कहा कि दो सप्ताह के भीतर विस्तृत स्थिति रिपोर्ट दायर की जाए। शीर्ष अदालत ने पिछले साल 18 नवंबर को कहा था कि उसने उच्चतम न्यायालय की कॉलेजियम द्वारा विभिन्न उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए 43 नामों की सिफारिश अस्वीकार करने के केंद्र के दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया है और इनमें से अधिकांश नाम दुबारा विचार के लिए भेजे गए हैं।
34 नामों को मंजूरी दी गई
केंद्र ने न्यायालय से कहा था कि उसने विभिन्न उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के लिए जिन 77 नामों की सिफारिश की गई थी, उनमें से 34 को मंजूरी दे दी है। रोहतगी ने 11 नवंबर को कहा था कि केंद्र पहले ही कोलेजियम के पास पिछले साल तीन अगस्त को प्रक्रिया ज्ञापन का नया मसौदा भेज चुका है, लेकिन अभी तक सरकार को उसका कोई जवाब नहीं मिला है। न्यायालय ने कहा था कि प्रक्रिया ज्ञापन को अंतिम रूप नहीं दिए जाने के कारण नियुक्ति प्रक्रिया रोकी नहीं जा सकती है। न्यायालय ने न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित फाइलों की धीमी प्रगति के लिए सरकार को आड़े हाथ लिया था। यही नहीं, न्यायालय ने चेतावनी दी थी कि वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिये वह प्रधान मंत्री कार्यालय और कानून मंत्रालय के सचिवों को तलब कर सकता है। न्यायालय का कहना था कि यदि सरकार को किसी नाम पर आपत्ति है तो वह कभी भी कोलेजियम के पास आ सकती है।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं के मनोनयन पर सुनवाई करेगी शीर्ष अदालत
उच्चतम न्यायालय ने वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता मनोनीत करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और संपूर्ण प्रणाली में आमूलचूल बदलाव के लिए दायर याचिका पर नए सिरे से सुनवाई करने का निश्चय किया। प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को पहले से ही दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित याचिका के साथ संलग्न कर दिया जिसमें वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता मनोनीत करने संबंधी अधिवक्ता कानून के प्रावधानों को चुनौती दी गई है। इस पीठ ने पिछले साल 21 अक्टूबर को इस मामले में सुनवाई पूरी करके अपना आदेश सुरक्षित रखा था। पीठ ने कहा कि यह अधिक उचित होगा कि इस मामले को उच्च न्यायालय में लंबित याचिका के साथ ही नए सिरे से पूरी तरह सुना जाए। पीठ ने कहा कि इस मामले में फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद कुछ वकीलों ने इस मामले में हस्तक्षेप के लिये शीर्ष अदालत से संपर्क किया और कहा कि सभी को सही तरीके से सुना नहीं गया है। उच्च न्यायालय में लंबित याचिका में अधिवक्ता कानून की धारा 16 और 23 (5) की संवैधानिकता को चुनौती दी गयी है। इसमें वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता बनाने के विधायी आधार का प्रावधान है। पीठ ने कहा कि अब, जबकि ऐसे पद के स्रोत को ही चुनौती दी गई है, तो यह अधिक उचित होगा कि उच्च न्यायालय में लंबित याचिका को भी इस न्यायालय में स्थानांतरित करके इन पर एकसाथ सुनवाई की जाएं।
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