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बीवी का कत्ल करने से बेहतर है ''तीन तलाक'': मुस्लिम बोर्ड

कुरान के मुताबिक तलाक अवांछनीय है, लेकिन जरूरत पड़ने पर दिया जा सकता है।

बीवी का कत्ल करने से बेहतर है
नई दिल्ली. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक के मामले में हलफनामा दाखिल किया है। हलफनामे में बोर्ड ने कहा कि पर्सनल लॉ को सामाजिक सुधार के नाम पर दोबारा नहीं लिखा जा सकता। तलाक की वैधता सुप्रीम कोर्ट तय नहीं कर सकता। तीन तलाक को सही ठहराते हुए बोर्ड ने कहा, "बीवी से छुटकारा पाने के लिए शौहर उसका कत्ल कर दे, इससे बेहतर है कि उसे तीन बार तलाक कहने दिया जाए।" सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 6 सितंबर को होनी है। इससे पहले बोर्ड ने शुक्रवार को पेश अपने हलफनामे तीन तलाक और चार शादी की व्यवस्था को सही ठहराया है।
ये हैं बोर्ड की दलीलें
मर्द को एक से ज्यादा शादी की इजाजत देने की व्यवस्था औरत के लिए फायदेमंद है। पत्नी के बीमार होने या किसी और बात को आधार बनाकर पति उसे तलाक दे सकता है, लेकिन पति को दूसरी शादी की इजाजत होने की वजह से महिला बच जाती है। तलाक के मामलों में अदालत में लंबा वक्त लगता है इसलिए तीन बार तलाक बोलने की व्यवस्था सही है। पत्नी के रहते दूसरी शादी की इजाजत से मर्द अवैध संबंध नहीं बनाता या रखैल नहीं रखता है। इस तरह के नाजायज रिश्ते समाज के लिए बुरे हैं। जायज तरीके से दूसरी शादी की इजाजत समाज के हित में है। इस्लाम में यह व्यवस्था है कि अगर दंपती के बीच में संबंध खराब हो चुके हैं तो शादी को खत्म कर दिया जाए। तीन तलाक को इजाजत है क्योंकि पति सही से निर्णय ले सकता है। वह जल्दबाजी में फैसला नहीं लेते हैं। तीन तलाक तभी इस्तेमाल किया जाता है जब वैध आधार हो। कुरान के मुताबिक तलाक अवांछनीय है, लेकिन जरूरत पड़ने पर दिया जा सकता है।
पर्सनल लॉ में नहीं होगा बदलाव
एनबीटी की खबर के मुताबिक, बोर्ड ने कोर्ट में चल रही सुनवाई का विरोध किया। बोर्ड ने कहा कि पर्सनल लॉ धार्मिक किताबों पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट इनमें बदलाव नहीं कर सकता। धार्मिक आधार पर बने नियमों को संविधान के आधार पर नहीं परखा जा सकता। हर नागरिक को मिले मौलिक अधिकार, पर्सनल लॉ में बदलाव का आधार नहीं बन सकते। हलफनामे में बोर्ड ने सुनवाई को खत्म करने की मांग की है। बोर्ड ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कोई कानून नहीं है जिसे चुनौती दी जा सके, बल्कि यह कुरान से लिया गया है। यह इस्लाम धर्म से संबंधित सांस्कृतिक मुद्दा है। तलाक, शादी और देखरेख अलग-अलग धर्म में अलग-अलग हैं। एक धर्म के अधिकार को लेकर कोर्ट फैसला नहीं दे सकता।
जल्द होगी समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम कानून के कुछ हिस्से की समीक्षा कर रहा है। मर्दों को हासिल 3 बार तलाक बोल कर शादी से अलग होने और एक पत्नी के रहते दूसरी शादी करने के हक पर कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस व्यवस्था के खिलाफ 6 मुस्लिम महिलाओं ने भी कोर्ट में याचिका दाखिल की है।
कोर्ट जानना चाहती है कि संविधान से हर नागरिक को मिले बराबरी और इज्जत के साथ जीने का हक मुस्लिम महिलाओं को मिल पा रहा है या नहीं। पर्सनल लॉ में मर्दों को हासिल विशेष अधिकार कहीं महिलाओं के मौलिक अधिकार का हनन तो नहीं करते?

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